Climate Change: चिंताजनक गति से बदल रहा है हिमालय का मिज़ाज

 जनवरी, 2026 के अंतिम सप्ताह में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के पर्यटन स्थलों में सैलानियों का हुजूम उमड़ पड़ा था। देर से हुई वर्षा और बर्फबारी देखने वाली की सभी जगहों पर इतनी भीड़ थी कि सैलानियों सहित स्थानीय लोगों को सड़कजाम और पार्किंग की असुविधाओं का सामना करना पड़ा था। अभी दो सप्ताह भी नहीं बीते कि एकाएक गर्मी पड़ने लग गई। यह स्थिति जलवायु परिवर्तन (climate change) के कारण मौसम में तेजी से हो रहे बदलावों को रेखांकित करती है।

यह स्थिति अकेले पर्वतीय क्षेत्रों की नहीं है। जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुका है, पर्वतीय क्षेत्रों में यह परिवर्तन और भी तेजी से हो रहा है। एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के अनुसार पर्वतीय इलाकों का तापमान आसपास के मैदानी इलाकों की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस असमान रूप से गर्म होना अरबों लोगों के लिए खतरा बन सकता है, जो पर्वतीय क्षेत्रों पर निर्भर हैं।


नेचर रिव्यु अर्थ एंड एनवायरमेंट में प्रकाशित इस अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है कि जैसे-जैसे ऊंचाई बढ़ती है, पर्यावरणीय बदलाव भी तेजी से होते हैं। यह प्रभाव दुनिया के पर्वतीय क्षेत्रों में 
जलवायु को पूरी तरह से बदल रहा है। अध्ययन में दुनिया के प्रमुख पर्वत श्रृंखलाओं - रॉकी माउंटेंस, आल्प्स, एंडीज और तिब्बत पठार पर तापमान, बारिश और हिमपात में हो रहे बदलावों का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं की टीम ने वैश्विक जलवायु आंकड़े और कई केस स्टडी का उपयोग किया।

शोधकर्ताओं ने 1980 से 2020 तक के आंकड़ों के हवाले से कहा गया है कि पर्वतीय इलाकों का तापमान आसपास के क्षेत्रों की तुलना में औसतन 0.21 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक तेजी से बढ़ा। बारिश के पैटर्न अस्थिर हो रहे हैं और अधिक गर्म मौसम के कारण बर्फ की बजाय बारिश होने लगी है। पर्वत और आर्कटिक क्षेत्रों में समान रूप से तेजी से बदलाव हो रहे हैं। दोनों क्षेत्रों में बर्फ और ग्लेशियर तेजी से घट रहे हैं और पारिस्थितिकी प्रणालियों में गहरा बदलाव आ रहा है

हिमालय में सैटेलाइट मॉनिटरिंग से मिले मुख्य नतीजे

भारत हिमालय के संबंध में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान (ISRO) की रिपोर्ट काफी महत्वपूर्ण है। इसरो द्वारा 1984 से 2023 तक के डेटा का इस्तेमाल करके की गई सैटेलाइट-आधारित स्टडीज़ से पता चलता है कि भारतीय हिमालय में 601 ग्लेशियर झीलें अपने आकार से दोगुनी से ज़्यादा बड़ी हो गई हैं। स्पेस एप्लीकेशन सेंटर (SAC) सहित अन्य स्टडीज़ से पता चलता है कि ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं, ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOFs) का खतरा बढ़ रहा है, और हिमालय के कुछ इलाकों में हर साल 24 अरब टन भूजल कम हो रहा है।

ग्लेशियर झीलों का विस्तार:  करीब 40 वर्षों की तस्वीरों से पता चलता है कि भारतीय हिमालय की 2,400 से ज़्यादा ग्लेशियर झीलों में से 676 का काफी विस्तार हुआ है। इनमें से 130 भारत में हैं, जो सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन में स्थित हैं।

ग्लेशियर का पीछे हटना: 2000-2010 के बीच स्टडी किए गए 12% से ज़्यादा ग्लेशियर पीछे हट रहे थे, जबकि 87% में स्थिरता देखी गई। इस पिघलन से ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड का खतरा बढ़ जाता है, जिससे सिक्किम जैसे इलाकों में झीलों की रियल-टाइम मॉनिटरिंग ज़रूरी हो जाती है।

ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड : विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग ने बताया कि ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड जो प्राकृतिक बांधों के तेजी से पिघलने या संरचनात्मक विफलता के कारण होते हैं, जलवायु परिवर्तन से जुड़ा एक बड़ा खतरा हैं।

भूजल में कमी: सैटेलाइट अध्ययन के आंकड़ों से पता चलता है कि बीते 3-4 दशकों में गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु बेसिन में हर साल लगभग 24 अरब टन भूजल का नुकसान हुआ है, जो गंभीर, लंबे समय तक चलने वाली कमी को दिखाता है।

भू-उपयोग में बदलाव: इस बीच वनस्पति सूचकांक से संबंधित अध्ययन में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन से वन क्षेत्रों के स्वरूप, विस्तार और स्थान में   बदलाव हो सकता है। कुछ क्षेत्रों में वनस्पति का घनत्व और स्वास्थ्य बदल गया है, जो जटिल, अक्सर जलवायु-प्रेरित, पर्यावरणीय परिवर्तनों का संकेत देता है। इसका सीधा प्रभाव खेती-किसानी और पशुपालन पर भी पड़ना तिश्चित है।

सरकार की जिम्मेदारी

जलवायु परिवर्तन और भूमंडलीय ऊषता का ही नतीजा है कि बीते लगभग दो दशक के दौरान हिमालयी क्षेत्र - कश्मीर से लेकरअरुणाचल प्रदेश तक, में भयंकर भौतिक आपदाएं हुई हैं, साल-दर-साल उनकी भयावहता एवं संख्यात्मक वृद्धि हुई है। इससे पहाड़ों में रहने वाले लोगों के समक्ष जीवन के संकट की समस्या पैदा हुई है।

चूंकि हिमालय पर्वत पूरे भारतीय उपमहाद्यीप के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास का आधार है। हिमालय पर्वत जहांवर्षभर बहने वाली नदियों का उद्गम स्थल है, वहीं बंगाल की खाड़ी से उठने वाली गर्म हवाओं के हिमालय से टकराने से ही इस क्षेत्र में मानसूनी वर्षा होती है। साथ ही उत्तरी ध्रुव से आने वाली ठंडी हवाओं की मार से इसे बचाता है। यदि हिमालय न होता तो न गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र एवं उनकी सहायक नदियां होती, न गंगा-सिंधु का मैदान होता, न मानसूनी वर्षा होती और न ही भारतीय सभ्यता का विकास होता।

यही कारण है कि भारत सहित पूरी दुनिया के वैज्ञानिक - भगर्भशास्त्री, वनस्पति विज्ञानी, और समाजशास्त्री हिमालय के समक्ष पैदा इस संकट को लेकर खासे चिंतित है और हिमालयी राज्यों की और सरकारों सहित भारत सरकार और योजनाकारों एवं नीतिनिर्माताओं को आगाह करते रहे हैं कि इस क्षेत्र के विकास की योजनाएं हिमालय कीसंवदे संवेदनशीलता और जलवायु परिवर्तन के खतरों को ध्यान  में रखते हुए ही बनाएं।

चिंताजनक बात यह है कि हाल के वर्षों में जिस तरह हिमालयी क्षेत्र के विकास के नाम पर वहां की भौतिक संपदाओं के दोहन को बढ़ावा गया है, उससे लगता नहीं हमारे नेता और योजनाकर प्रत्यक्ष में हिमालय के और परोक्ष में भारतीय उपमहाद्यीप के इस संकट को लेकर चिंतित हैं। ऐसी स्थिति में इसरो की सेटेलाइट आधारित अध्ययन  रिपोर्ट उन्हें अपनी हिमालय नीति में बदलाव करने के लिए प्रेरित करती है। 

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