पंचायत प्रतिनिधियों के लिए अनिवार्य हो सकती है न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता


उत्तर पदेश में ग्राम पंचायतों का कार्यकाल पूरा हो गया है। 25 दिसंबर को राज्य की 58,656 ग्राम पंचायतों (गौतम बुद्ध नगर की 88 और गोंडा जिले की 10 पंचायतों को छोड़कर) ग्राम प्रधानों के स्थान पर सहायक विकास अधिकारियों (एडीओ) को प्रशासक नियुक्त कर दिया गया है। यह नियुक्ति जिला अधिकारियों द्वारा की गई है और वे उन्हीं के निर्देश पर कार्य करेंगे। पंचायत चुनाव कब होंगे यह तय नहीं है लेकिन प्रशासकों की नियुक्ति आगामी 6 महीनों के लिए की गई है। 

राज्य सरकार पिछले 6 महीनों से पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव में लगी हुई थी। इस बीच ग्राम पंचायतों के परिसीमन, मतदाता सूचिशें के पुनीरीक्षण और आरक्षण रोस्टर का काम न हो पाने से पंचायत चुनाव टालने पड़े हैं। फिलहाल, ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायत चुनाव कब होंगे, कौन चुने जाएंगे प्रचायत प्रतिनिधि और नई पंचायतों का स्वरूप कैसा होगा, जैसे सवालों को लेकर गहमागहमी हैं। 

राज्य के मुख्यमंत्री और योगी आदित्यनाथ और पंचायती राज मंत्री भूपेंद्र सिंह चौधरी सहित तमाम मंत्राी और वरिष्ठ अधिकारियों का दावा है कि पंचायत चुनाव आगामी 6 महीनों में करा लिए जाएंगे। राज्य  में सत्तारूढ़ भाजपा और सपा, बसपा, कांग्रेस सहित आम आदमी पार्टी और आजाद समाज पार्टी ने अपने कार्यकर्ताओं को पंचायत चुनाव लड़ाने के लिए सक्रियता बढ़ा दी है। उनका मकसद राज्य में पंचायती राज व्यवस्था को सुदृढ़ करना अथवा शासन में जनता की भागीदारी बढ़ाना नहीं बल्कि 14-15 महीनों बाद होने वाले राज्य विधानसभा चुनाव के लिए कार्यकर्ता तैयार करना और ग्रामीण क्षेत्रों में वोट मैनेजमेंट करना है। यानी इस बार पंचायत प्रतिनिधि खासकर ग्राम प्रधान किसी न किसी पार्टी के प्रतिनिधि ही होंगे। 

पंचायतों का स्वरूप कैसा होगा, इसका अनुमान राज्य सरकार द्वारा पंचायत प्रतिनिधियों के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता निर्धारण की तैयारियों से लगाया जा सकता है। राज्य सरकार इस संबंध में राजस्थान, हरियाण, उत्तराखंड और ओड़िसा के चुनाव मॉडल पर विचार कर रही है। इस राज्यों में ग्राम प्रधान/सरपंच और पंचायत सदस्यों से लेकर पंचायत समिति व जिला पंचायत के सदस्यों के लिए 5वीं से लेकर 12वीं तक की न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य की गई है। 

माना जा रहा है कि पंचायत प्रतिनिधियों के लिए न्यूनतम शिक्षा अनिवार्य कर दिए जाने से ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा का प्रसार होगा और पंचायत राज और विकास कार्यों में शिक्षितों का सहयोग मिलेगा। बदली हुई सामाजिक-राजनैतिक स्थितियों में पंचायती राज व्यवस्था के लिए यह बहुत जरूरी है। 

उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश में पंचायती राज संस्थाओं, मुख्यतः ग्राम पंचायतों में पंचायत प्रतिनिधियों का बड़ा हिस्सा अशिक्षितों का है। सामान्यतः दो-तिहाई सदस्य 8वीं से कम पढ़े हैं जबकि 15 से 20 प्रतिशत निरक्षर (अंगूठा छाप) हैं। यदि कहीं उच्च शिक्षा प्राप्त प्रतिनिधि हैं भी तो वे गांवों में न रहकर आसपास के शहरों/कस्बों में रहते हैं।

अशिक्षित पंचायत प्रतिनिधि जहां पंचायती राज व्यवस्था के प्रावधानों और नियमावलियों से अनभिज्ञ हैं वहीं पंचायत के कामकाज, कार्ययोजना तैयार करने एवं विकास कार्यों से संबंधित कार्याें के रिकॉर्ड रख पाने में अक्षम हैं। उन्हें हर छोटे-बड़े काम के लिए ग्राम पंचायत विकास अधिकारी (पंचायत सचिव) पर निर्भर रहना पड़ता है। इससे ग्राम पंचायतों में नौकरशाही का दबदबा बढ़ा है और पंचायतों को आंबटित धन के उपयोग में गड़बड़ी व घपले बढ़े हैं। पंचायत प्रतिनिधियों के लिए न्यूनतम षेक्षणिक योग्यता का अनिवार्य कर दिए जाने से इस स्थिति में बदलरव की काफी संभावना है। 


सरपंच पद के लिए हुई नीलामी

महाराष्ट्र में अप्रैल-जून 2020 में पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल समाप्त होने के बाद से सरपंचों (ग्राम प्रधानों) के स्थान पर प्रशासक नियुक्त हैं। राज्य में पंचायतों के चुनाव कब होंगे, अभी तक यह तय नहीं है। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायत चुनाव की सरगर्मी तेज हो गई है। सरपंचों से लेकर पंचायत समिति और जिला पंचायत के सदस्य के लिए उम्मीदार ताल ठोंक रहे है, जिसमें राजनैतिक पार्टियां भी बढ़चढ़कर भाग ले रही हैं। 

राज्य में पंचायत चुनाव की तैयारी की गहमागहमी के बीच एक रोचक मामला प्रकाश में आया है, जिसमें सरपंच पद का चुनाव मतदान के जरिए न होकर बोली लगाकर नीलामी के जरिए हुआ है। बात राज्य के नंदुबार जिले की खोड़ामाली ग्राम पंचायत की है। इस गांव में लोगों द्वारा सार्वजनिक रूप में बोली लगवाकर भावी सरपंच का चुनाव कर लिया गया है। 

सरपंच पद की यह नीलामी ग्रांव के मदिर-प्रांगण में हुई, जिसमें सरपंच पद के उम्मीवारों ने बोली लगवाई। प्रदीप पाटिल ने 42 लाख रुपए (सबसे ऊंची) बोली लगाकर अपनी जीत हासिल कर ली। प्रदाप पाटिल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के स्थानीय नेता हैं। बोली लगाने वालों में कांग्रेस, भाजपा, शिवसेना व अन्य पार्टियों के नेताओं सहित निर्दलीय उम्मीदवार भी थे। 

प्रदीप पाटिल ने नीलामी से सरपंच पद पर जीत दर्ज करने के तुरंत बाद घोषणा की है कि सरपंच उनकी बेटी बनेगी। यानी राज्य में विधिवत पंचायत चुनाव होने पर खोड़ामाली पंचायत में मतदान नहीं होगा, प्रदीप पाटिल की बेटी निर्विरोध सरपंच चुनी मान ली जाएंगी। 

कहा गया है कि सरपंच पद के लिए लगाई गई बोली की रकम ग्राम पंचायत की होगी जिसका उपयोग गांव के विकास कार्यों के लिए किया जाएगा। अभी यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि इसकी भरपाई भावी सरपंच द्वारा ग्राम पंचायत के लिए आंबटित निधि से होगा या यह रकम सरपंच का रुतबा हासिल करने के शुल्क के रूप में होगी। लेकिन यह स्पष्ट है कि इससे आगामी ग्राम पंचायत में गांव के लोगों की कोई भूमिका नहीं रह जाएगी।

कल्पना कीजिए यदि आने वाले समय में संसद और राज्यों के विधानमंडलों के सदस्यों का चुनाव भी इसी तरह बोली लगाकर होने लगे तो भारतीय लोकतंत्र का स्वरूप कैसा होगा?     


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