तीन केंद्रीय कृषि कानूनों के विरोध में आंदोलनरत किसान दिल्ली की सीमाओं पर धरने पर हैं। देश के विभिन्न राज्यों से आए लाखों किसान कड़कड़ाती ठंड में खुले आसमान के नीचे रातें बिता रहे हैं। ठंड सहित अन्य कारणों से अब तक 40 से अधिक किसानो की मृत्य हो चुकी है। सरकार किसान आंदोलन के चलते गतिरोध को दूर करने के बजाय कानूनों को किसानों के हित में होने के तर्क पेश कर किसान आंदोलन के समानांतर कानून समर्थक किसानों को एकजुट करने में लगी है। इसी क्रम में 25 दिसंबंर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को संबोधित करते हुए कम्युनिस्ट पार्टियों पर निशाना साधते हुए सवाल किया कि केरल में एपीएमसी की मंडियां नहीं हैं, वहां प्रोटेस्ट क्यों नहीं होता है।
एपीएमसी यानी कृषि उपज विपणन समिति ही वह व्यवस्था है जिसके तहत मंडियों के जरिए सरकार किसानों से एमएसपी पर अनाज खरीदती है। देश के करीब आधा दर्जन राज्यों में यह व्यवस्था नहीं है, जिनमें केरल प्रमुख है। फिर केरल में एमएसपी को लेकर कोई आंदोलन क्यों नहीं है? क्या वास्तव में केरल में सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट सरकार ने किसानों की उपेक्षा की है और सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टियों ने इस नजरअंदाज किया है?
असल में, केरल में कृषि का पैटर्न देश के अन्य राज्यों से एकदम अलग है। केरल की लगभग 52 प्रतिशत ग्रामीण आबादी खेती-किसानी पर निर्भर है और राज्य की अर्थव्यवस्था में इसका महत्वपूर्ण योगदान है। लेकिन कुल कृषि उपजों का 18 प्रतिशत ही खाद्यान्नों यानी चावल, मक्का, बाजरा, दालें आदि से प्राप्त होता है। शेष 82 प्रतिशत पैदावार मसालों और बागवानी - नारियल, काजू, रबर, चाय, कॉफी, तरह-तरह की काली मिर्च, जायफल, इलायची, लौंग, दालचीनी आदि की है। ये ही केरल की खेती का मुख्य आधार हैं।
इन फसलों की खरीद-फरोख्त (मार्केटिंग) के लिए अलग-अलग बोर्ड हैं। जैसे रबर बोर्ड, कॉफी बोर्ड, मसाला बोर्ड, चाय बोर्ड आदि। इन बोर्डों की देखरेख में ही किसान की फसलें नीलामी से बिकती हैं। यह व्यवस्था 1956 में वर्तमान केरल राज्य के वजूद में आने से पहले या यह कहना चाहिए कि स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले के त्रावणकोर और कोच्चि रियासतों के समय से चली आ रही है।
बागवानी आधारित केरल की इन कृषि उपजों का बड़ा हिस्सा निर्यात होता है और करोड़ों डॉलर की विदेशी मुद्रा देश को मिलती है। सदियों से केरल से अरब और यूरोपीय देशों में मसालों का निर्यात होता आया है। पिछले 10 सालों में ही मसालों और औषधीय बूटियों का कारोबार विश्व व्यापार 5 लाख टन तक जा पहुंचा है जो मुद्रा के हिसाब से 1500 मिलियन डॉलर्स (लगभग 11,000 करोड़ रुपए) पहुंच गया। इसमें बड़ा हिस्सा केरल का है।
इन उत्पादों की कीमतें विश्व बाजार के उतार-चढ़ाव से जुड़ी होती है, इस कारण केरल की सरकारों को इनका न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करने की जरूरत ही नहीं पड़ी। प्रश्न यह उठता है कि क्या आज केरल के किसान सरकार की नीतियों से खुश हैं, यदि नही ंतो इसके लिए कौन जिम्मेदार हैं, राज्य एलडीएफ सरकार या केंद्र की एनडीए सरकार?
केरल सहित देश के सभी राज्यों में मसालों और बागवानी आधरित उपजों की खरीद-फरोख्त के लिए बनाए गए ये बोर्ड केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय के अधीन या उसके दिशा-निर्देशों पर कार्य करते हैं। हाल के वर्षों में इन बोर्डों को सुनियोजित तरीके से कमजोर किया गया है। केंद्र से फंड न मिल पाने के कारण इन बोर्डों में कर्मचारियों के पद खाली पड़े हैं। निदेशक स्तर तक के अधिकारी तक नहीं हैं। ऊपर से फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (एफटीए) का कहर अलग है, जिसने बिना किसी कस्टम ड्यूटी, कर या प्रतिबंध के आसियान देशों से मसालों के आयात को अनुमति देकर केरल के किसानों के समक्ष नई चुनौती पेश की है।
2006 में एलडीएफ सरकार बनने से पहले केरल के किसान भी देश के अन्य राज्यों के किसानों के समान ही कर्ज मंे डूबे थे और आत्महत्याएं कर रहे थे। एलडीएफ सरकार ने किसानों को कर्ज से उबारने के लिए ‘कर्ज राहत आयोग’ का गठन किया। किसानों के कर्ज माफ करने के अलावा उन्हें अगली फसल के लिए आसान शर्तों पर वित्तीय मदद देना शुरू किया। विश्व बाजार में कीमतें गिरने पर किसानों को आर्थिक संरक्षण प्रदान करने के लिए कृषि उपजों को सहकारी समितियों द्वारा खरीदने की योजना बनाई।
जहां तक खाद्यान्नों की बात है, राज्य में गेहूं नहीं होता। चावल, मक्का बाजरा और दालें भी बहुत कम मात्रा में होती हैं। इसके बावजूद एलडीएफ सरकार ने एपीएमसी के विकल्प के तौर पर अनाजों की खरीद के नियम बनाए जिससे किसानों को उनकी उपज का न्यूनतम मूल्य मिल सके। अनाज ही नहीं फलों और सब्जियों की खरीद-फरोख्त के लिए थोक और खुदरा बाजार का नेटवर्क बनाया। इस वर्ष भी देश में धान का समर्थन मूल्य जहां 1868 रुपए तय है और वह भी किसानों को नहीं मिल पा रहा वहीं केरल में इस वर्ष धान 2748 रुपये प्रति क्विंटल खरीदा गया यानी भारत सरकार की एमएसपी से 900 रुपए अधिक।
केरल देश का एकमात्र राज्य है जहां सब्जियों और फलों का भी आधार मूल्य तय किया गया है। आलू (20 रु), कद्दू व लौकी (9रु), तोरई (8रु), करेला (30रु), चिचिंडा (16रु), टमाटर (8रु), बीन्स (34रु), भिण्डी (20रु), पत्ता गोभी (11रु), गाजर (21रु), फली (28 रु), चुकन्दर (21 रु), लहसुन (139 रु), कसावा (12 रु), केला (30रु) और अनन्नास (15रु), किलो के भाव से खरीदा गया।
प्रधानमंत्री ने 25 दिसंबर के संबोधन में देश के सीमांत और छोटे किसानों को दी जाने वाली सालाना 6,000 रुपए की प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि का बखान करते हुए अपने आप को किसानों का सबसे बड़ा हितैषी साबित करने की कोशिश की है। केरल की एलडीएफ सरकार इससे कहीं अधिक सब्सिीडी किसानों को दे रही है, वह भी फसल के आधार पर। यह सब्सीडी धान पर 22,000, सब्जी पर 25,000, ठंडे मौसम की सब्जियों पर 30,000, दालों पर 20,000, केले पर 30,000 रुपये प्रति हैक्टेयर है, जो प्रति परिवार न होकर प्रति किसान है।
विवादास्पद तीन कृषि कानून मोदी सरकार कोरोना संकट के दौरान अध्यादेशों के जरिए लाई है और बिना बहस के संसद में उन्हें पारित भी करा लिया और जब किसानों ने उसका विरोध किया तो सरकार ने इन कानूनों को किसानों के हित सिद्ध करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी है। इसी कोरोना महामारी के दौरान केरल सरकार ने ‘सुविक्षा केरल योजना’ लागू की है, जिसके तहत 3600 करोड़ रुपए राज्य की कृषि सहकारी समितियों को दिए ताकि वे संकट का मुकाबला कर सकें। लेकिन क्या किसानों के हित में या कृषि के विकास के लिए केंद्र सरकार या भाजपा, कांग्रेस अथवा किसी भी अन्य पार्टी से शासित राज्य सरकार ऐसी योजना लाई है। वे ऐसा कर सकती हैं या नहीं यह एक विचारणीय प्रश्न है।
फिलहाल, दिल्ली की सीमाओं पर आंदोलनरत किसान अपनी मांगों को लेकर डटे हुए हैं। सरकार की जिद है कि वह किसी भी सूरत में कृषि कानूनों को वापस नहीं लेगी और न ही एमएसपी पर कानून बनाएगी। यह कहना मुश्किल है कि यह आंदोलन कब तक चलेगा और इसकी परिणति क्या होगा? लेकिन यह तय है कि जितना यह आंदोलन खिंचेगा उतना ही किसानों और कृषि के प्रति केंद्र और राज्य सरकारों की उपेक्षापूर्ण नतियांे का खुलासा होता जाएगा।
चित्र: केरल के वानाड जिले में बागवनी करते किसान और विभिन्न औषधीय उपजें।


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