तीन कृषि कानूनों की वापसी और एमएसपी पर कानून बनाने की मांग पर दिल्ली की सीमाओं पर धरने पर बैठे किसानों और कानून वापस न लेने और एमएसपी को पूर्ववत बनाए रखने पर अड़ी सरकार के बीच टकराव की संभावनाएं निरंतर बढ़ती जा रही हैं। कल 7 जनवरी को ट्रैक्टर रैली के आयोजन के बाद जहां आंदोलनकारी किसानों ने आंदोलन को और तेज करने की घोषणा कर दी है वहीं सरकार ने आंदोलनकारी किसानों को वापस भेजने के लिए एक साथ कई विकल्पों पर काम करना शुरू कर दिया है। इससे आज किसान नेताओं और सरकार के बीच होने जा रही 8वें दौर की वार्ता भी बेनतीजा होने के कयास लगाए जाने लगे हैं। अलबत्ता आज की वार्ता में क्या होगा, इस पर देश और दुनिया की नजरें गढ़ी हुई हैं।
किसानों की मांगों के समान ही उनके भावी कार्यक्रम भी काफी हद स्पष्ट हैं। आंदोलनकारी किसानों ने 4 जनवरी को 7वें दौर की वार्ता के तुरंत बाद स्पष्ट कर दिया था कि यदि आज भी सरकार ने उनकी मांगें नहीं मानी तो वे 9 जनवरी को यानी कल तीनों काले कानूनों की होली जलाएंगे, इसके बाद 15 जनवरी, 18 जनवरी, 23 जनवरी और 26 जनवरी को देशभर में अलग-अलग कार्यक्रम करेंगे। इसके पीछे आंदोलनकारी किसानों का मकसद भी साफ है।
दूसरी ओर सरकार किसान आंदोलन को समाप्त करने के लिए एक साथ कई विकल्पों पर विचार कर रही है, जिसमें एक तो यही है कि वह अभी भी इस आंदोलन को सिर्फ पंजाब के किसानों का आंदोलन साबित करने में जुटी है। कल जब आंदोलनकारी किसान केएमपी एक्सप्रेस वे पर ट्रैक्टर रैली निकाल रहे थे तो कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर नानकसर संप्रदाय के प्रमुख सिख संत बाबा लक्खा सिंह को मध्यस्थ बनाकर आंदोलन समाप्त करने की योजना बना रहे थे। बाबा लक्खा सिंह और कृषि मंत्री के बीच मुलाकात मास मीडिया सहित सोशल मीडिया से प्रसारित कर एक बार यह साबित करने की कोशिश की गई है कि किसान केवल पंजाब और सिख किसानों का है। जबकि आंदोलनकारी किसान बार-बार यही करते आ रहे हैं कि इस आंदोलन में पंजाब के किसान मार्गदर्शक की भूमिका में हैं लेकिन आंदोलन पूरे देश का है। यह बात दिल्ली की सीमाओं में धरने पर बैठे किसानों में पंजाब सहित हरियाणा उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक आदि राज्यों के किसानों की उपस्थिति और देश के विभिन्न शहरों में इनके समर्थन में हो रहे धरना-प्रदर्शन से भी साबित होती है।
किसान आंदोलन कों खत्म करने के लिए कल ही सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सरकार से पूछा गया प्रश्न दूसरा विकल्प हो सकता है। सर्वाेच्च न्यायालय ने सरकार से पूछा है कि क्या किसान आंदोलन में कोविड-19 के नियमों का पालन हो रहा है? यानी क्या आंदोलनकारी मास्क का उपयोग कर रहे और देह की दूरी के नियमों का पालन कर रहे हैं। जाहिर सी बात है इस प्रश्न के जवाब में सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने किसान आंदोलन में कोविड-19 के नियमों का पालन न होने की बात कह दी। संभव है इस आधार पर सरकार किसानों के धरने को खत्म करने के लिए पुलिस बल का सहारा ले। जैसा कि सीएए के खिलाफ शाहीनबाग धरने के समय हुआ। लेकिन इससे किसान मानने वाले नहीं हैं। अव्वल तो उनके पास बड़ा तर्क यह होगा कि क्या बिहार चुनाव में कोविड-19 के नियमों का पालन हुआ, क्या हैदराबाद नगर निगम के चुनाव में राजनेताओं ने इसका पालन किया, यहां तक कि क्या किसान आंदोलन के समानांतर आयोजित किसान सम्मेलनों में तमाम केंद्रीय मंत्रियों, भाजपा नेताओं ने इसका पालन किया?
कल की ट्रैक्टर रैली के बाद जिस तरह कई केंद्रीय मंत्रियों और भाजपा नेताओं ने इस आंदोलन को ट्रैक्टर मालिक किसानों का आंदोलन साबित करने की कोशिश की है उससे साफ है कि अब आदोलन को किसानों में बड़ा किसान और छोटा किसान की दरार पैदा कर खत्म करने की कोशिश हो सकती है। संभव है कि सरकार कृषि कानूनों को छोटे व सीमांत किसानों और पिछड़ी कृषि वाले राज्यों/क्षेत्रों के हित में साबित करने की कोशिश करे। आंदोलनकारी किसान पहले से ही बिहार में एपीएमसी हटाए जाने और महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में काुटेक्ट फार्मिंग से किसानों को हुए नुकसान का हवाला देते रहे हैं, इससे लगता नहीं कि सरकार का यह दाव कामयाब होगा।
ऐसे में किसान आंदोलन की दिशा और दशा क्या होगी, यह कहना कठिन है। आज की वार्ता बेनतीजा होगी, इसका अंदेशा तो किसान आंदोलन से सरोकार रखने वाले हर शख्स को है, लेकिन इसके बाद सरकार की क्या रणनीति होगी, इसका अनुमान लगाना मुश्किल है। सरकार किसान आंदोलन को वापस नहीं लेगी, इसलिए नहीं कि वह किसानों के आगे कमजोर नहीं पड़ना चाहती बल्कि इसलिए भी कि ऐसा होने से मोदी सरकार के 6 सालों के कार्यकाल में लिए गए कई फैसलों पर फिर से सवाल खड़े होने लगेंगे। केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री कैलाश चौधरी ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि यदि कृषि कानून वापस लिए गए तो कल लोग नागरकिता संशोधन कानून वापस लेने की मांग करेंगे, धारा 370 की फिर से बहाली की मांग करेंगे? यानी सरकार भी मानती है कि ये कानून भी गलत तरीके से और गलत मकसद से लाए गए थे।

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