सबकुछ ठीकठाक रहा तो 2022 में आजादी की 75वीं वर्षगांठ तक ‘नए भारत का नया संसद भवन’ देश को मिल जाएगा और 26 जनवरी, 2023 की गणतंत्र दिवस की परेड के लिए नया सेंट्रल विस्टा तैयार हो जाएगा। नया संसद भवन कैसा होगा और सेंट्रल विस्टा में किस तरह का बदलाव किया जाएगा, इस संबंध में पिछले एक साल के दौरान केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय द्वारा बहुत कुछ कहा गया है। लेकिन इस समय महंगाई, बेराजगारी और कोारोना महामारी सहित कई कारणों से निरंतर कमजोर होती जा रही देश की अर्थव्यवस्था के चलते नए संसद भवन और सेंट्रल विस्टा पर होने वाला व्यय चर्चा का विषय बना हुआ है।
नए संसद भवन के निर्माण में 971 करोड़ रुपए व्यय होंगे। इसका ठेका ‘टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड’ को मिला है, इस पर भारतीय जनता पार्टी के ही वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने सवालिया निशान लगाए हैं। इससे पहले अक्टूबर, 2020 में नए संसद भवन और सेंट्रल विस्टा का डिजायन और कंसल्टेंसी का कार्य 229.75 करोड़ रुपए में गुजरात की एचसीपी डिजाइन, कंसल्टेंसी एंड मैनेजमेंट कंपनी को दिए जाने पर भी काफी विवाद हुआ था। एचसीपी कंपनी के मालिकों से प्रधानमंत्री के नजदीकी संबंध होने की बात कही जाती है। गुजरात में गांधीनगर का सेंट्रल विस्टा, साबरमती रिवर फ्रंट, आईआईएम अहमदाबाद की नई ईमारत का निर्माण इसी कंपनी ने बनाया है। इधर वाराणसी में विश्वनाथ मंदिर परिसर पुनर्निर्माण का कार्य यही कंपनी कर रही है।
सेंट्रल विस्टा के पुनर्निर्माण में कुल कितना व्यय होगा, यह अभी तक स्पष्ट नहीं हैं। केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय के मुताबिक इस पर करीब 13,000 करोड़ रुपए व्यय हो सकते हैं, जबकि भारत सरकार इसके लिए मार्च, 2020 में 20,000 करोड़ रुपए की स्वीकृति प्रदान कर चुकी है। कोरोना संकट की शुरूआत में सरकार द्वारा लिए गए इस निर्णय पर कुछ पत्रकारों ने सरकार की प्राथमिकताओं पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए कहा था कि इतनी राशि में देश में 200 विस्तरों वाले 150 से अधिक मल्टी स्पेसलिटी हॉस्पीटल बन सकते हैं। कुछ ने इस धनराशि को केंद्रीय विश्वविद्यालय, आईआईएम, आईआईटी और आईआईएमएस जैसे उच्च शिक्षण संस्थान खोलने में व्यय करने की हिदायत दी थी।
निसंदेह, नए संसद भवन और सेंट्रल विस्टा के निर्माण से ज्यादा जरूरी अस्पताल और शिक्षण संस्थान हैं। लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी है देश समक्ष मुहबांए खड़ी बुनियादी समस्याओं के समाधान, जिनमें जल संकट एक अहम समस्या है। प्रधानमंत्री द्वारा नए ससंद भवन का शिलान्यास करने से ठीक एक साल पहले 9 दिसंबर, 2019 को नीति आयोग ने अपनी ‘कंपोजिट वाटर मैंनेजमेंट इंडेक्स (समग्र जल प्रबंधन सूचकांक)’ रिपोर्ट जारी करते हुए सरकार का ध्यान इस और खींचने की कोशिश भी की थी।
रिपोर्ट में कहा गया था कि देश वर्तमान समय मे सबसे खराब जल संकट के दौर से गुजर रहा है। देश की 60 करोड़ से अधिक आबादी जल संकट का सामना कर रही है। देश की राजधानी दिल्ली और चेन्नैई, बेंगलुरू, हैदराबाद सहित 21 बड़े शहरों में पीने के पानी का जबर्दस्त संकट है। अक्सर सूखे की मार का सामना करने वाले पश्चिमी और दक्षिण भारतीय राज्यों की आधी से अधिक आबादी (लगभग 33 करोड़़) पेयजल सहित कृषि और उद्योगों के लिए पानी की कमी का सामना कर रहे हैं। नीति आयोग ने देश में जल गुणवत्ता सूचकांक का उल्लेख करते हुए कहा है कि देश की 70 प्रतिशत आबादी प्रदूषित जल पीने को विवश है। जल संकट की समस्या का समाधान करने के लिए जल स्रोतों के सरंक्षण और उचित जल प्रबंधन के सुझाव भी नीति आयोग ने दिए हैं।
नीति आयोग द्वारा उक्त रिपोर्ट जारी करने से दो महीने पहले सितंबर, 2020 में संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन ने भी स्पष्ट किया था कि भारत सहित दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों में जल संकट कृषि के लिए चुनौतीपूर्ण हो गया है, इसका असर लोगों के स्वास्थ्य और उनकी आजीविका पर पड़ रहा है। ‘इकोलॉजीकल थ्रेट रजिस्टर 2020’ शीर्षक से जारी रिपोर्ट में भारत की करीब 60 करोड़ आबादी के जल संकट से जुझने का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि देश में पानी के कारण होने वाले विवादों से कारण सामाजिक सद्भाव बिगड़ा है। लगभग यही बात जून 2020 में वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट ने ‘इक्वाडक्ट वाटर रिस्क एटलस’ रिपोर्ट में कही है। इस रिपोर्ट में दुनिया के 17 जल तनावग्रस्त देशों में भारत को 13वें स्थान पर रखा है। संस्था ने भारत की प्रमुख नदियों - सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र, नर्मदा, गोदावरी, काबेरी, महानदी आदि के जल में हो रही गिरावट और उनके जल ग्रहण क्षेत्रों के सिकुड़ने पर भी चिंता व्यक्त की है।
इसके अतिरिक्त इस बीच पर्यावरण संरक्षण और जल संकट पर कार्य करने वाली दर्जनों स्वैच्छिक संस्थाओं और जल विज्ञान के विशेषज्ञों ने भी सरकार का ध्यान इस ओर खींचने का प्रयास किया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में वाराणसी की एक चुनावी सभा में स्वयं को गंगा का बेटा बताते हुए गंगा के उद्धार की दावा किया था। गंगा को प्रदूषण से बचाने के लिए कई नायाब योजनाएं बनाई गईं। लेकिन गंगा का उद्धार न हो सका। 2019 में दूसरी बार सरकार बनाने पर उन्होंने जल से संबंधित सभी मंत्रालयों को मिलाकर जल शक्ति मंत्रालय बनाया तो उम्मीद जगी थी कि देश को जल संकट से निजात मिलेगी। लेकिन सरकार ग्राम पंचायतों को केंद्रीय और राज्य वित्त आयोगों और ग्रामीण विकास की योजनाओं के दिए जाने वाले धन का उपयोग जल संरक्षण और जल प्रबंधन के लिए करने के निर्देशों से आगे नहीं बढ़ सकी।
आखिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कैसा नया भारत बनाना चाहते हैं? ऐसा भारत जहां देश की राजधानी में एक भव्य अत्याधुनिक सुविधाओं वाला संसद भवन और अदभुत नजारा पेश करने वाला सेंट्रल विस्टा होगा और देश के करोड़ों लोग जिन्होंने कभी दिल्ली नहीं देखी, राष्ट्रपति भवन और इंडिया गेट के चित्र ही देखें हैं, वे पीने के पानी के लिए तरसते रहें, खेती और पशुपालन के लिए जरूरी पानी न मिलने से जर्जर आर्थिक स्थिति का सामना करते रहें, प्रदूषित पानी पीने से होने वाली तमाम बीमारियों को अपनी नियती मान लें। विकट आर्थिक संकट के दौर में प्रधानमंत्री द्वारा नए संसद भवन का शिलान्यास किए जाने के बाद यह बताने की आवश्यकता नहीं कि वे कैसा भारत चाहते हैं। लेकिन क्या देश के 137 करोड़ लोेग भी यही चाहते है?


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