किसान आंदोलन: क्या पूर्व जज मार्कंडेय काटजू के सुझावों को गंभीरता से लेंगे प्रधानमंत्री


देश की राजधानी समेत उत्तर भारत में शीत लहर चल रही है। दिल्ली की सीमाओं पर किसान पिछले 51 दिनों से कृषि कानूनों के विरोध में धरने पर बैठे हैं। अब तक ठंड और अन्य कारणें से करीब 65 किसानों की मृत्यु हो चुकी है। किसानों का कहना है कि यदि उनकी मांगें न मानी गई तों वे 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस की परेड में हिस्सा लेंगे, दिल्ली समेत देशभर में ट्रैक्टर रैलियां निकालेंगें और आंदोलन को तेज कर देंगे। दूसरी ओर सरकार न तो कृषि कानूनों को वापस लेने के लिए तैयार है। अब तक सरकार और आंदोलनकारी किसानों के बीच 9 दौर की वार्ता हो चुकी है। अगली वार्ता अब 19 जनवरी को तय है, लेकिन उसमें भी कोई हल निकलेगा ऐसी उम्मीद न तो सरकार को है और न ही किसानों को। 

आंदोलनकारी किसानों और सरकार के बीच मध्यस्थता के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक चार सदस्यीय समिति नियुक्त की है। हालांकि उनमें से एक सदस्य भूपेंद्र सिंह मान ने खुद को इस समिति से अलग कर लिया है। बीकी तीनों सदस्य अशोक गुलाटी, अनिल घणावत और प्रमोद कुमार जोशी कृषि कानूनों के पक्ष में लेख लिखकर अपने विचार स्पष्ट कर चुके हैं। आंदोलनकारी किसानों ने इस समिति की सुनवाई में शामिल न होने का ऐलान किया है। उनका कहना है कि उनकी मांग जनता द्वारा चुनी गई सरकार से है और न ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से मध्यस्थता करने की मांग की है। 

किसानों और सरकार के बीच 9वें दौर की वार्ता से ठीक पहले सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कंडेय काटजू ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर तीनों विवादास्पद कानून वापस लेने और किसानों की समस्याओं को हल करने के लिए उच्च अधिकार वाले किसान आयोग का गठन करने के सुझाव दिए हैं। 


गतिरोध पर पहूंच गई है समस्या 

जस्टिस काटजू ने लिखा है, ‘‘भारत में किसान आंदोलन और इससे जुड़ी समस्याएं एक गतिरोध पर पहुंच गई हैं. किसान संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त 4 सदस्य समिति की सुनवाई में भाग लेने से इंकार करने स्पष्ट हो गया है कि जब तक उन 3 कानूनों को रद्द नहीं किया जाता है, तब तक आंदोलन खत्म नहीं होगा।.भारी संख्या में किसान दिल्ली की सीमा पर कैंप किए हुए हैं, लेकिन वे 26 जनवरी को दिल्ली में प्रवेश करने और वे अपने ट्रैक्टरों के साथ गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं.। सरकार इसकी अनुमति नहीं देगी। किसानों को रोकने के लिए पुलिस व अर्धसैनिक बलों का सहारा लिया जाएग ावे किसानों पर लाठीचार्ज और गोलीबारी करेंगे, जिससे हिंसा हो सकती है।’’

प्रधानमंत्री को दिए दो सुझाव

1) सरकार को 3 कानूनों को तुरंत रद्द करते हुए अध्यादेश जारी करना चाहिए. यदि आप ऐसा करते हैं तो सभी आपकी तारीफ करेंगे. यदि कोई पूछता है कि कानून क्यों बनाए गए, तो आप कह सकते हैं कि हमने गलती की है, हमें अपनी गलती का एहसास है और इसे सही कर रहे हैं. सभी इंसान गलती करते हैं. ऐसा करने से आलोचना से ज्यादा आपकी सराहना होगी।.

2) इसके साथ ही, सरकार को प्रमुख किसान संगठनों, सरकार के प्रतिनिधियों और कृषि विशेषज्ञों के सदस्यों की एक उच्च शक्ति वाली किसान आयोग की नियुक्ति करनी चाहिए, जो किसानों की समस्याओं के सभी पहलुओं पर विचार कर कर्तव्य के साथ काम करे. किसानों को उनकी उपज के लिए पर्याप्त पारिश्रमिक नहीं मिल रही है, जिस कारण 3 से 4 लाख किसान पहले ही आत्महत्या कर चुके हैं. इस किसान आयोग द्वारा कई महीनों तक चर्चा करनी चाहिए और फिर जो आम सहमति बने, उस पर एक व्यापक कानून बनाया जाना चाहिए। 

जस्टिस काटजू समसाययिक विषयों सहित सरकार, न्याय प्रणाली और मीडिया पर बेबाक टिप्पणी के लिए जाने जाते हैं। मौजूदा किसान आंदोलन और किसानों की समस्याओं से संबंधित उनके सुझावों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सरकार कितनी गंभीरता से लेती है, यह कहना कठिन है। कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर सहित कई मंत्री और भाजपा नेता इस बीच जिस तरह के वक्तव्य सार्वजनिक मंत्रों और प्रेस ाताओं के जरिए देते रहे हैं उससे स्पष्ट है कि सरकार कृषि कानूनों को किसी भी कीमत पर वापस लेने को तैयार नहीं है। लेकिन समय रहते किसान आंदोलन को समाप्त न किया गया तो यह न केवल सरकार के लिए बल्कि पूरे देश के लिए नुकसानदायक साबित होगा।


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