सरदार सरोवर बांध का जल स्तर ऊपर उठने के साथ-साथ नर्मदा घाटी के लोगों की मुश्किलें भी बढ़ती गई हैं। मध्यप्रदेश के निमाड़ क्षेत्र के कई सैकंडो गांव आज जलमग्न हो गये हैं। हजारों एकड़ जमीन डूब चुकी है, 7000 हेक्टेयर जमीन आज टापू बन चुकी है लेकिन उन गांवो के पुनर्वास की स्थिति पहले जैसे ही बनी हुई है। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट और के आदेशों का भी पालन नहीं किया जा रहा है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण का दायित्व संभालने के बाद भी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है।
नर्मदा घाटी के लोगों की मुख्य मांग डूब क्षेत्र के लोगों के सुरक्षित पुनर्वास के लिए कृषि भूमि के बदले कृषि भूमि और मकान के बदले मकान की है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस सबंध में कृषि भूमि की बदले प्रत्येक परिवार को 60 लाख रुपए और मकान बनाने के लिए भूखंड के साथ 5 लाख 80 हजार रूपये दिए जाने का फैसला सुनाया था, लेकिन अभी भ्ी सैकड़ों परिवारों को यह लाभ नहीं मिला है। राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण का विभाग का दायित्व अपने पास रखने के बावजूद डूब प्रभावितों के पुनर्वास के संबंध में कोई पहल न कर पाना अत्यंत चिंतालनक है। घाटी के लोगों का कहना है कि मुख्यमंत्री चौहान प्रदेश के डूब प्रभावितों को डूबने से बचाने के बजाय केंद्र और गुजरात सरकार के सामने घुटने टेक चुके है और आत्म समर्पण कर दिया है।
करीब दो महीने पहले नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के पुनर्वास आयुक्त सहित कई अधिकारियों ने डूब प्रभावित क्षेत्र के लोगों के प्रतिनिधियों से विस्तृत वार्ता (ऑनलाइन कांफ्रेंस के जरिए) के बाद 15 दिन में पुनर्वास संबंधी कार्य आगे बढाने और जल्द से जल्द निर्णय लेने की बात कही थी। उसी समय आंदोलन के प्रतिनिधियों ने ऐलान कर दिया था कि यदि दिए गए समय के अंदर पुर्वास कार्य आगे नहीं बढ़ता तो उन्हें फिर से संघर्ष के रास्ता अख्तियार करना पड़ेगा। नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण जब किए गए दावे के अनुसार काम आगे नहीं बढ़ा पाया तो लोगों लोगों ने जलमग्न होते गांवों के बीच बने टापुओं के बीच क्रमिक अनशन शुरू कर दिया। निमाड़. क्षेत्र के पिछोडी, अवल्दा, कड़माल आदि कई स्थानों पर लोगों ने क्रमिक अनशन शुरू कर दिया।
डूब प्रभावित क्षेत्र के लोग पिछले ढाई महीनों से क्रमिक अनशन पर हैं लेकिन इसकी अब तक न तो सरकार ने और न ही नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण ने आंदोलनकारियों से बात करना भी आवश्यक नहीं समझा। दूसरी डूब प्रभावित अपनी बात पर अडिग हैं। सरदार सरोवर बांध का पानी उनके धरना स्थ्ज्ञल तक पहुंच चुका है और वे उसी पानी में बैठे हैं।

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