क्या किसी सरकारी कर्मचारी को इसलिए निलंबति किया जा सकता है कि वह किसी योजना का निर्धारित लक्ष्य हासिल करने में असफल रहा? यह प्रश्न इन दिनों में मध्य प्रदेश में पंचायती राज विभाग के कर्मचारियों के असंतोष का सबब बना हुआ है। राज्य के मुरैना जिले के कार्यपालन अधिकारी-जिला पंचायत ने महदौरा, बिजली पुरा, तुतवास, चांद का पुरा और गूंज ग्राम पंचायतों के पंचायम सचिवों को आयुष्मान भारत योजना की समीक्षा बैठक के दौरान तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया। उन पर आरोप था कि वे आयुष्मान भारत योजना का निर्धारित लक्ष्य हासिल करने में असफल रहे।
उसी दिन राज्य के खंडवा जिले की जमनिया खुर्द ग्राम पंचायत के पंचायत सचिव को इसलिए निलंबित कर दिया गया कि उसने एक योजना के लाभार्थी की मृत्यु के उपरांत लाभ के लिए आवेदन दूसरी योजना के तहत जमा कर दिया था। जबकि अशोक नगर जिले की करजई ग्राम पंचायत की सचिव (महिला) को शासकीय कार्यों में लापरवाही के आरोप में निलंबित कर दिया गया। निलंबित ग्राम पंचायत सचिवों का कार्यभार ग्राम रोजगार सहायकों को सौंप दिया गया है, जो रोजगार सहायक के मानदेय में पंचायत सचिव और रोजगार सचिव दोनों का कार्य करेंगे।
पंचायत कर्मियों के प्रति राज्य सरकार के उपेक्षापूर्ण रवैए के कारण पहले से असंतुष्ट ग्राम पंचायत सचिवों का असंतोष जिला पंचायत कार्यपालन अधिकारियों के इन फैसलों से और बढ़ गया है। राज्य में पंचायती राज और ग्रामीण विकास विभागों के विलय के बाद ग्राम पंचायत स्तर पर ग्रामीण विकास विभाग और पंचायती राज विभाग दोनों के काम ग्राम पंचायत सचिवों को देखने पड़ते हैं। समय-समय पर केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा सौंपे जाने वाले वाले आपातकालीन दायित्व अलग हैं।
मध्य प्रदेश में ग्राम पंचायत सचिवों की सचिवों की इससे भी बड़ी शिकयत यह है कि राज्य में 1994 में आधुनिक पंचायती राज प्रणाली आरंभ के तुरंत बाद नियुक्त ग्राम पंचायतों सचिवों को 2008 के मानकों पर वेतन मिलता है और राज्य में अन्य विभागों में 2017 से 7वां वेतन आयोग लागू होने के बाद भी पंचायत कर्मी को छठे वेतनमान पर काम करने को विवश हैं।
विकास योजनाओं को आखिरी व्यक्ति तक ले जाने और शासन में जनता की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए आरंभ पंचायती राज व्यवस्था की धुरी कहे जाने वाले ग्राम पंचायत सचिवों की यह दयनीय स्थिति अकेले मध्य प्रदेश में नहीं है। मध्य प्रदेश देश के उन चुनींदा राज्यों में है जहां प्रत्येक ग्राम पंचायत में एक ग्राम पंचायत सचिव की व्यवस्था है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, बिहार, झारखंड आदि राज्यों मे एक ग्राम पंचायत सचिव के पास 4-5 से लेकर 10-12 ग्राम पंचायतों तक की जिम्मेदारी है। इन राज्यों में ग्राम पंचायतों सचिवों पर काम के बोझ का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है।
क्षमता से अधिक काम का बोझ के अलावा उच्च प्रशासनिक अधिकारियों की दमनात्मक रवैया भी ग्राम पंचायत सचिवों की परेशानी का बड़ा कारण है। देश के लगभग सभी राज्यों में शासकीय कार्यों में लापरवाही, पंचायतों को आबंटित धन का दुरुपयोग और गबन के आरोप में पंचायत सचिवों का निलंबन और स्थानांतरण एक आम बात है। हाल ही में उत्तराखंड के पॉड़ी जिले की सिमलना हर्षू न्याय पंचायत क्षेत्र के ग्राम पंचायत विकास अधिकारी (उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायत सचिव) को इसलिए निलंबित कर दिया गया कि उन्होंने ग्राम प्रधानों को पदभार संभालने संबंधी अभिलेख उपलब्ध कराने में कोताही बरती, ग्राम प्रधानों को ‘डोंगल’ आबंटित नहीं किए और पंचायत निधि से स्वयं पैसा निकाला और वे ग्राम पंचायत विकास योजना की बैठक में उपस्थित नहीं हुए। ध्यान देने की बात यह है कि उन पर उक्त न्याय पंचायत क्षेत्र की 8 ग्राम पंचायतों का दायित्व था।
अधिक गहराई में जाने की जरूरत नहीं है। पिछले 9-10 महीनों में ही कोरोना महामारी का ग्रामीण क्षेत्रों में विस्तार को रोकने, लॉक डाउन के दौरान ग्रांव लौटे प्रवासियों को कोरेंटीन की व्यवस्था संभालने, इच्छुक लोगों को मनरेगा के तहत काम दिलाने में और लोगों को मुुफ्त राशन वितरण जैसे कामों में ग्राम पंचायत सचिवों की निर्णायक भूमिका थी। अन्य तमाम विभागों के कर्मचारी जब लॉक डाउन के चलते अपने घरों में बैठे थे वहीं ग्राम पंचायत सचिव अपने नियत कामों से कहीं अधिक काम कर रहे थे और उन्हीं को कोरोना को रोकने में लापरवाही बरतने के आरोपों का सामना करना पड़ा है।
पंचायती राज कर्मियों के प्रति शासन के इस तरह के उपेक्षापूर्ण और दमनात्मक रवैए के विरुद्ध ग्राम पंचायत सचिवों का असंतोष आक्रोश की और बढ़ने लगा है। कई राज्यों में वे आंदोलन की राह पर बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। दो दिन पहले छत्तीसगढ़ प्रदेश पंचायत सचिव संघ द्वारा राज्य के सभी जिला मुख्यालयों में ग्राम पंचायत सचिवों ने धरना-प्रदर्शन किया और 26 दिसंबर से काम बंद कर हड़ताल पर जाने की ऐलान कर दिया है। करीब एक साल पहले झारखंड राज्य पंचायत सचिव संघ ने जिला स्तरीय आंदोलन किए थे। अब मध्य प्रदेश ग्राम पंचायत सचिव संगठन भी इसी दिशा में बढ़ता नजर आ रहा है।
देश के विभिन्न राज्यों में ग्राम पंचायत सचिवों में बढ़ते असंतोष और उनके आंदोलन के रास्ते पर जाने से ग्रामीण विकास की योजनाओं के कार्यान्वयन और पंचायती राज के कार्य संपदान में बाधा पड़ना तय है। इस समस्या के समाधान के लिए केंद्र सरकार को आवश्यक कदम उठाने चाहिए। केंद्र सरकार ने जिस तरह केरल और प. बंगाल जैसे राज्यों में पंचायती राज व्यवस्था के सफल प्रयोगों के आधार पर गुड गवर्नेंस और थ्री-एफ थ्योरी को देशभर में लागू किया उसी तरह पंचायत कर्मियों के कार्याधिकारों में लिए भी एकीकृत राष्ट्रीय नीति बनाई जानी चाहिए। दूसरे शब्दों में कहें तो पंचायती राज संस्थाओं के लिए केंद्रीय और प्रदोशिक सेवाओं से अलग कैडर बनाया जाना चाहिए, और वे केंद्र या राज्य सरकारों के प्रति नहीं बल्कि संविधान के प्रति जवाबदेह हों।

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