भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 : पृष्ठभूमि, विशेषता और प्रभाव


खेतीहर भूमि की सुरक्षा कृषि विकास और किसानों की समृद्धि की पहली शर्त है। इस लिहाज से भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 (पूरा नाम: भूमि अधिग्रणि में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकर, पुनर्वास और पुनर्स्थापन अधिनियिम 2013) का विशेष महत्व है। इस कानून के वजूद में आने से पहले बिटिश शासनकाल में 120 साल पहले बने भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 के तहत सरकार मनमाने तरीके नाममात्र का मुआवजा देकर विभिन्न उद्देश्यों के लिए किसानों की निजी और सार्वजनिक जमीन का अधिग्रहण कर लेती थी। भूमि अधिग्रहण कानून 2013 बनने के बाद सरकार द्वारा किसानों की निजी जमीन ही नहीं सार्वजनिक उपयोग की जमीन का अधिग्रहण करना मुश्किल हो गया। इससे जहां शहरी विस्तार और औद्योगिकीकरण के नाम पर औने-पौने दामों पर जमीनों के अधिग्रहण पर अंकुश लगा है वहीं कृषि और कृषि संबंधी च्यवसायों पर निर्भर ग्रामीणों ने राहत की सांस ली है।

भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 की पृष्ठभूमि

ब्रिटिश हुक्मरानों द्वारा ढांचागत विकास एवं नागरिक सुविधाओं के निर्माण से लेकर वन-खन संपदा के औपनिवेशिक दोहन के लिए भूमि का अधिग्रहण आम बात थी। अंग्रेजों की इस ‘जमीन हड़पो’ नीति का मुखर विरोध होने पर ब्रिटिश पार्लियामेंट 1894 में भूमि अधिग्रहण कानून ले आई थी। ब्रिटिश सरकार का यह भूमि अधिग्रहण कानून कई संशोधनों के बाद आजाद भारत में बना रहा। 

सरकार द्वारा भूमि का अधिग्रहण से होने वाले नुकसान का अहसास किसानों और जल, जंगल व जमीन पर निर्भर लोगों को तब हुआ जब अप्रैल 2000 में सरकार ‘विशेष आर्थिक क्षेत्र नीति ;ेचमबपंस मबपदपउबप ्रवदम चवसपबलद्ध यानी सेज और उसके साथ ही सरकार औद्योगिक कोरीडोर, एक्सप्रेस हाइ-वे और स्मार्ट सिटी जैसी अन्य योजनाएं ले आई। आर्थिक क्षेत्र अधिनियम 2006 बनने के बाद तो सरकार ने औद्योगिक, आवासीय और व्यावसायिक परिसरों के लिए निजी और सार्वजनिक जमीन का अधिग्रहणकर व्यापारियों और उद्यमियों को बेचना शुरू कर दिया। इससे जहां निर्धारित विशेष आर्थिक क्षेत्रों, औद्योगिक गलियारों, एकस्प्रेस हाई-वे से लगे क्षेत्रों में जमीन की खरीद-फरोख्त का कारोबार फलने-फूलने लगा। इससे देशभर में सरकार द्वारा भूमि का अधिग्रहण किए जाने का विरोध हुआ। कई स्थानों पर आंदोलनकारियों को प्रशासन की बर्बरता का सामना भी करना पड़़़़ा, कई लोगों की मौतें हुई और सैकड़ों लोगों के विरुद्ध मुकदमे दर्ज किए गए। 

जन आंदोलनों और जनता के दबाव में सरकार भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन विधेयक 2007 ले आई लेकिन लोकसभा भंग हो जाने पर यह बिल निरस्त हो गया। तत्पश्चात 7 सितंबर 2011 को इसी नाम से दूसरा विधेयक लोकसभा में पेश किया गया। बिल को संसद की स्थाई समिति को भेजा गया, आदोलनकारी संगगठनों, किसानों, आदिवासियों और अन्य प्रभावित होने वाले लोगों के विचारों को जानने के बाद विधेयक में कई बदलाव किए गए और विधेयक का नाम बदला गया। बिल पर करीब दो साल तक संसद में और संसद के बाहर विस्तृत विचार-विमर्श के बाद 29 अगस्त 2013 को लोकसभा में और 3 सितंबर को राज्यसभा में पारित हुआ, और 1 जनवरी 2014 से लागू हुआ। 

भूमि अधिग्रहण कानून 2013 की विशेषताएं: 

भूमि ग्रहण अधिनियम 2013 अर्थात भूमि अधिग्रणि में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकर, पुनर्वास और पुनर्स्थापन अधिनियम 5 स्तंभों पर टिका हुआ है। 

1) सामाजिक सहमति, 

2) सामाजिक प्रभाव आकलन, 

3) उचित मुआवजा, 

4) पुनर्वास और 

5) पुनर्स्थापन। 

  • यह कानून सरकार को सार्वजनिक उपयोग के लिए जमीन के अधिग्रहण के सीमित अधिकार देता है। भूमि अधिग्रहण कानून 1894 के तहत सरकार सार्वजनिक उपयोग के लिए अर्जेंसी क्लॉज लगाकर जमीन का अधिग्रहण कर सकती थी। नए कानून में यह प्रावधान केवल राष्ट्रीय सुरक्षा, प्राकृतिक आपदा अथवा संसद द्वारा मान्य आपदा के संदर्भ में लगाया जा सकता है। इसके लिए सामाजिक सहमति आवश्यक नहीं है। 
  • पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण से प्रभावित होने वाले 70 प्रतिशत लोगों की और प्राइवेट परियोजनाओं  के लिए 80 प्रतिशत लोगों  की सहमति आवश्यक है।
  • भूमि अधिग्रहण पर ग्रामीण क्षेत्रों में सर्किल रेट का चार गुना और शहरी क्षेत्रों में दो गुना मुआवजा दिया जाना तय है।
  • भूमि अधिग्रहण से जमीन गंवाने वाले गंवाने वाले लोगों का पुनर्वास और रोजगार गंवाने वाले लोगों का पुनर्स्थापन आवश्यक है। 
  • बहुफसली और सिंचित भूमि का अधिग्रहण नहीं किया जा सकता। विशेष परिस्थिति में अधिग्रहण आवश्यक हो तो प्रभावित लोगों को उतनी ही भूमि देनी होगी। 
  • संविधान की 5वीं और 6ठी अनुसूची के अंदर आने वाले क्षेत्रों की जमीन का अधिग्रहण करने के लिए ग्रामसभा की स्वीकृति अनिवार्य है।
  • किसी भी उद्देश्य के लिए जमीन का अधिग्रहण करने से पहले जनसुनवाई के माध्यम से सामाजिक प्रभाव आकलन यानी ;ेवबपंस पउचंबज ंेेमेेउमदजद्ध किया जाना प्राथमिक शर्त है।
  • यदि पांच साल पहले भूमि का अधिग्रहण हो जाने के बाद 5 साल तक यदि प्रभावित लोगों को मुआवजा नहीं मिला हो और सरकार ने अधिग्रहीत भूमि पर कब्जा न किया हो भूमि अधिग्रहण रद्द समझा जाएगा।

नया भूमि अधिग्रहण कानूनों के बनने से जहां देशभर के किसानों ने राहत  की सांस ली वहीं सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण से हासिल जमीनों का फायदा उठाने वाले उद्योगपतियों, व्यापारियों बिल्डरों के लिए मुश्किलें खड़ी हो गईं। इससे जमीन के कारोबार से जुड़ा व्यापारी समूह और उद्योगपतियों का बड़ा समूह सरकार के खिलाफ हो गया। याद कीजिए 2014 के लोकसभा चुनाव का वह दौर जब रियल इस्टेट धड़ाम से नीचे गिर गया तो तब की मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा ने भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन करने का आश्वासन देकर उद्योगपतियों सहित जमीन के कारोबार से जुड़े व्यापारियों को अपने पक्ष में कर लिया, जिन्होंने भाजपा को चुनाव जिताने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया।

भूमि अधिग्रहण कानून 2013 में संशोधन की कोशिश 

चुनाव में उद्योगपतियों, रियल इस्टेट और जमीन के कारोबारियों से मिले सहयोग और समर्थन की एवज में मई 2014 में सत्तारूढ़ होते ही भाजपा सरकार ने इस कानून में संशोधन की पेशकस शुरू कर दी। कैबनेट मीटिंग में इस मसले पर चर्चा हुई, कानून में बदलाव के लिए अध्यादेश लाने का निर्णय  लिया गया। ग्रामीण विकास मंत्री गोपीनाथ मुंडे इसके विरुद्ध थे। उसके दो-चार दिनों बाद ही एक मामूली सी दुर्घटना में रहस्यमय ढंग से उनकी मृत्यु हो गई। दो बार अध्यादेश लाने के बाद सरकार ने 24 फरवरी 2015 को भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश किया।

भाजपा सरकार द्वारा पेश संशोधन विधेयक में राष्ट्रीय सुरक्षा सहित आधारभूत संरचना, आवासीय योजनाओं, औद्योगिक कोरिडोर एवं परियोजनाओं के लिए भूमि का अधिग्रहण किए जाने पर सामाजिक प्रभाव आकलन और सामाजिक स्वीकृति के प्रावधान खत्म किए जाने, अधिग्रहीत जमीन का मुआवजा ग्रामीण क्षेत्रों में सर्किल रेट का दोगुना एवं शहरी क्षेत्रों में सर्किल रेट के बराबर किए जाने और सिंचित भूमि के अधिग्रहण को स्वीकृति प्रदान करने जैसे प्रावधान रखे गए थे। लोकसभा में विपक्षी सदस्यों ने इस विधेयक का  यह कहकर विरोध किया था कि नया कानून भूमि अधिग्रहण कानून 1894 जैसा ही होगा। इसके बावजूद संशोधन विधेयक लोकसभा में पास हो गया लेकिन राज्यसभा में पास न होने की स्थिति में संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दिया गया और संयुक्त संसदीय समिति किसी निष्कर्ष नहीं पहुंच पाई।

राज्य सरकारों की पहल

केंद्र सरकार ही नहीं अधिकांश राज्य सरकारें भी भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 में संशोधन करना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने राष्ट्रपति की स्वीकृति के आधार पर केंद्रीय कानून को बाई-पास करने का रास्ता अख्तियार किया। महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, बिहार, झारखंड, केरल आदि राज्यों की सरकारों ने इस ऐसे कई परिवर्तन किए हैं जो कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 की मूल भावना के विरुद्ध हैं। लेकिन केंद्रीय स्तर पर कानून में कोई बदलाव न होने से इसका बहुत अधिक प्रभाव नहीं पड़ा है। अर्थात किसानों की निजी और सार्वजनिक उपयोग की जिस भूमि पर उद्योगपतियों, बिल्डरों, रियल इस्टेट और जमीन के कारोबारियों की नजर गढ़ी हुई है उसे हासिल करने में उन्हें नरेंद्र मोदी सरकार से कोई मदद नहीं मिल पाई। 


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