पंचायतों राज संस्थाओं पर नियंत्रण करना चाहती हैं राज्य सरकारें




मध्य प्रदेश में पंचायती राज संस्थाओं - ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत और जिला पंचायत का कार्यकाल समाप्त हुए करीब एक वर्ष बीत गया है। अभी भी यह तय नहीं है कि इनके चुनाव कब होंगे। विभागीय सूत्रों की मानें तो सरकार हफ्ता-दस दिन में पंचायतों के चुनाव की घोषा कर सकती है। सब कुछ ठीकठाक रहा तो जनवरी 2021 के आखिर में या फरवरी 2021 में चुनाव हो सकते हैं। लेकिन इसका भरोसा न तो पंचायत प्रतिनिधियों व संभावित उम्मीदवारों को है और न ही स्थानीय प्रशासन को। क्योंकि इस तरह की अटकलें पिछले साल दिसंबर से ही लगती रही हैं। 

यही स्थिति महाराष्ट्र की भी है, जहां पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल अप्रैल-जून, 2020 में समाप्त हो चुका था और जुलाई में निर्वाचित पेचायत प्रतिनिधियों के स्थान पर प्रशासक नियुक्त कर दिए गए थे। इस मसले पर विपक्षी पार्टी भाजपा ने राज्य सरकार पर पंचायती राज संस्थाओं को कमजोर करने का आरोन लगाते हुए राज्य विधानसभा में हंगामा भी किया था। 

उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 25 दिसंबर, 2020 को जिला पंचायतों का 23 जनवरी 2021 और क्षेत्र पंचायतों का कार्यकाल 17 मार्च 2021 को समाप्त हो रहा है। राज्य सरकार का दावा है ह िअप्रैल-मई में पंचायतों के चुनाव करा लिए जाएंगे। लेकिन पंचायतों के परिसीमन, मतदाता ूसचियों के पुनरीक्षण और आरक्षण रोस्ट का काम जिस गति से चल रहा है उससे लगता नहीं कि इस अवधि में पंचायत चुनाव हो पाएंगे।

पर्वतीय राज्य हिमाचन प्रदेश में 21 जनवरी 2021 को पंचायतों का कार्यकाल  समाप्त हो रहा है। सरकार का दावा है कि पंचायत चुनाव तय समय में हो जाएंगे। लेकिन कैसे? कहा तो यह भी जा रहा है कि सरकार जल्दी ही पंचायतों के चुनाव की अधिसूचना जारी कर सकती है। लेकिन राज्य में शीत लहर के आगोस में है। ऐन मौके पर सरकार मौसम सही न होने का तर्क देकर पंचायत चुनाव अप्रैल-मई तक के लिए टाल दे तो आश्चर्य नहीं।

राज्य सरकरों द्वारा पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव टालने की एक बानगी है। दो-चार अपवादों को छोड़ दिया जाए तो देश के सभी राज्यों में पिछले 25 सालों से यही सब होता आ रहा है। मसलन बिहार और झारखंड में पंचायती राज संस्थानों का कार्यकाल समाप्त होने को आया है लेकिन अभी तक कोई सुुगबुगाहट भी नहीं है। 

समय पर पंचायतों के चुनाव न कराने के पीछे राज्यों की सरकारों के चाहे कोई भी तर्क हों लेकिन सत्यता यही है कि समय पर चुनाव न कराकर वे पंचायतों पर अपना नियंत्रण कायम करना चाहती है। राज्य सरकारों का यह रवैया पंचायती राज अधिनियम (73वां संविधान संशोधन) के प्रावधानों के विरुद्ध और स्वायत्त स्थानीय स्वशासन के विकास की सबसे बड़ी बाधा है। इस तरह लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव तो कभी नहीं टाले गए, जबकि संविधान के मुताबिक अपने स्तर पर लोकसभा और विधानसभाओं का की जो हैसियत है वही तीन स्तरीय पंचायतों की भी है। 

पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों की जिम्मेदारी राज्य निर्वाचन आयोग की है। कहने को को तो वह स्वायत्त संवैधानिक संस्था है लेकिन राज्य सरकार के अधीन होने के कारण वह राज्य सरकार की इच्छा और सुविधा के अनुसार काम करने को विवश होता है। 

निर्धारित समय पर पंचायतों के चुनाव न कराने के पीछे राज्य सरकारों का मकसद जहां पंचायतों को आबंटित होने वाले बजट पर कब्जा करना होता है वहीं पंचायतों पर अपनी पार्टी की पकड़ को मजबूत करना होता है। बेशक, पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव ‘दलविहीन’ आधार पर होते हैं लेकिन व्यवहार में पंचायतों के चुनाव लड़ने वाले लगभग सभी उम्मीदवार किसी न किसी पार्टी से जुड़े होते हैं। इस कारण पंचायतों के चुनाव परिणामों को सत्तारूढ़ पाटी और राज्य व केंद्र सरकारों की छवि से जोड़कर देखा जाता है। जैसा कि हाल में संपन्न राजस्थान और केरल में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव परिणामां के मामले में देखा गया। 

यह भी जगजाहिर है कि पंचायत प्रतिनिधि चाहे किसी भी पार्टी के कार्यकर्ता अथवा नेता हों वे राज्य सरकार का विरोध नहीं कर सकते। लेकिन लोकसभा और राज्य विधानसभा के चुनाव के समय उसी पार्टी के पक्ष में खड़े हो जाते हैं जिससे वे जुड़े होते है और उसके कार्यकर्ता के रूप में काम करते हुए उसे जिताने में लग जाते हैं। इसलिए राज्य में सत्तायढ़ पार्टी की कोशिश यह होती है कि पंचायतों में अधिक से अधिक उसके समर्थक चुनाव जीतें। इससे उन्हें प्रभावी कार्यकर्ता और भावी नेता तो मिलते ही हैं गांवों के एकमुश्त वोट भी सुरक्षित हो जाते हैं। 

राज्य सरकारों और राजनैतिक पार्टियों की इस मानसिकता के चलते जहां पंचायतें औपचारिक बनकर रह जाती हैं वहीं पंचायतों के कामकाज में नौकरशाही की हस्तक्षेप बढ़ जाता है। नीतियों के निर्माण और उनके योजनाओं के कार्यान्वयन में पंचायतों के माध्यम से जनता की भागीदारी कहने भर की रह जाती है। ऐसी स्थिति में ही उन्हें यानी पंचायतों को पंचायत क्षेत्र की जरूरतों को दरकिनार करते हुए राज्य सरकार अथवा प्रशासन के दिशा-निर्देशों के अनुसार अपनी कार्य योजना बनानी पड़ती है। 

जानकारों का कहना है कि पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव समय पर कराने के लिए पंचायती राज अधिनियम में संशोधन किए जाने की जरूरत है, जिसमें समय पर पंचायत चुनाव कराने के ठोस प्रावधान किए जाएं। इससे पंचायतों पर राज्य सरकारों का नियंत्रण पूरी तरह समाप्त भले ही न हो लेकिन कम जरूर हो सकता है। 

(आलेख आपको कैसा लगा, इसे संबंध में अपने सुझाव देने की कृपा करें।) 


एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ