स्वामीनाथन आयोग की प्रमुख सिफारिशें इस प्रकार हैं ;
1) रोजगार सृजन: कृषि क्षेत्र देश में रोजगार का मुख्य आधार रहा है। आजादी के बाद इसमें तेजी से और चिंताजनक गति से गिरावट आई है। 1961 में देश की 75 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर थी जो कि 1999 में घटकर 59 प्रतिशत रह गई। आर्थिक उदारीकरण का दूसरा चरण (2001-02) आरंभ होने के बाद इसकी गिरावट और भी तेज हो गई थी। स्वामीनाथन आयोग ने ‘नेट टेक होम इनकम’ की आवश्यकता पर जोर देते हुए कृषि और उससे संबंधित व्यवसायों को रोजगार का प्रमुख विकल्प बनाने की सिफारिश की है।
2) भूमि का न्याय संगत बंटवारा: स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत बाद भूमि सुधार और जमींदारी उन्मूलन के प्रयासों के बाद भी भूमि का बंटवारा सही रूप में नहीं हो पाया था। अर्थव्यवस्था की तमाम विसंगतियों के कारण इसमें और भी खामियां पैदा हो गई। देश में 50 प्रतिशत ग्रामीणों के पास मात्र 8 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि है, लगभग 84 प्रतिशत से अधिक किसानों के पास दो हेक्टेयर से कम जमीन है। कुछ किसान ऐसे हैं जिनके पास सैकड़ों हेक्टेयर जमीन है। आयोग ने कृषि भूमि के असमान वितरण को समाप्त कर उसे सही करने की सिफारिश की है।
3) भूमि सुधार: कृषि के प्रति सरकार के उदासीन रवैए के कारण देश में भारी मात्रा में निजी स्वामित्व वाली और सार्वजनिक जमीन बेकार पड़ी है। खेतीहर जमीन को गैर-कृषि गतिविधियों के उपयोग में लाया जा रहा है और ग्रामीण क्षेत्रों में प्रभावी लोगों द्वारा सार्वजनिक भूमि पर कब्जा किया गया है। आयोग ने इस स्थिति पर चिंता व्यक्त करते आवश्यक कदम उठाने और भूमिहीनों को अतिरिक्त जमीन दिलाने की पेश की है, साथ ही आदिवासी क्षेत्रों के लिए विशेष नियम बनाने की सिफारिश की है।
4) सिंचाई सुविधाओं का विस्तार: दर्जनों बांध परियोजनाओं और नहरों के निर्माण के बाद भी देश की एक तिहाई से भी कम कृषि भ्सूमि सिंचित है। आयोग ने सिंचाई सुविधाओं के अभाव पर चिंता व्यक्त करते हुए सभी क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाओं के विस्तार की आवश्यकता पर जोर दिया है। इसके लिए जलागम क्षेत्रों का विकास करने, वर्षा जल का संचय करने, कुंआ शोधन कार्यक्रम लागू करने आदि का सुझाव सरकार को दिया है।
5) उत्पादन सुधार: स्वामीनाथन आयोग ने कृषि उत्पादन को बढ़ाने के लिए विकास योजनाओं में जनता की भागीदारी बढ़ाने, ग्रामीण क्षेत्रों में आवागमन की सुविधाओं का विस्तार करने के लिए सड़कों का निर्माण और संचार सुविधाओं को बढ़ाने की सिफाशि की है।
6) किसानों की आय में वृद्धि: किसानों की आय में वृद्धि के लिए स्वामीनाथन आयोग ने समर्थन मूल्य के विभिन्न मानकों का उल्लेख करते हुए 23 कृषि उपजों को न्यूनतम समर्थन मूल्य के दायरे में लाने और भूमि की लागत सहित कृषि पर होने वाले व्यय और किसान की मेहनत से 50 प्रतिशत न्यूनतम समर्थन मूल्य दिए जाने की पैरवी की है और कृषि उपजों की खरीद के लिए किसानों की पहुंच के अंदर मंडियों का विकास करने की सिफारिश की है।
7) ऋण और बीमा सुविधा: देश के सभी किसानों को उन्हें सार्वजनिक ऋण प्रणाली से जोड़ने की बात करते हुए आयोग ने किसानों को दिए जाने वाले ऋण पर न्यूनतम व्याज, जो 4 प्रतिशत से अधिक न हो, लिए जाने और ऋण की वापसी के लिए किसान पर किसी तरह का दबाव न डालने की सिफारिश की है। साथ ही फसल बीमा का दायरा भंडारण और स्वास्थ्य सुरक्षा तक बढ़ाने की बात कही है।
8) खाद्य सुरक्षा: कृषि विकास और खाद्य सुरक्षा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। स्वामीनाथन आयोग ने सभी के लिए समान वितरण प्रणाली लागू करने, पोषण योजना का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वयं सहायता समूह बनाकर खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की सिफाशि की है।
9) प्रतिस्पर्धा का वातावरण और व्यापार: कृषि व्यवस्था के विकास और किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार करने के लिए कृषि उपजों के विपणन के समान ही उनके व्यापार को आवश्यक बताते हुए स्वामीनाथन आयोग ने किसानों में प्रतिस्पर्धा की भावना का विकास किए जाने पर जोर दिया है, जिससे किसान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर अधिक मांग वाली अलग-अलग फसलें पैदा करने के लिए प्रेरित हों।
10) किसानों द्वारा आत्महत्या पर रोक लगाना: कर्ज में डूबने सहित विभिन्न कारणों से किसानों की हत्या द्वारा सिलसिला आर्थिक उदारीकरण की नीति लागू होने के साथ ही शुरू हो गया था। स्वामीनाथन आयोग ने किसानों द्वारा आत्महत्या पर रोक लगाने के लिए प्रभावित क्षेत्रों को चिन्हित करते हुए कृषि सुधार कार्यक्रम लागू किए जाने की सिफारिश की है।
कृषि विज्ञानी एम.एस. स्वामीनाथन की अध्यक्षता वाले देश के पहले ‘राष्ट्रीय किसान आयोग’ ने उक्त विषयों से संबंधित 201 सिफारिशें की थीं। माना जाता है कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (नरेगा) बनाने के समान ही स्वामीनाथन आयोग के गठन में भी यूपीए (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) सरकार का समर्थन करने वाली वामपंथी पार्टियों की अहम् भूमिका थी। जानकारों का कहना है कि स्वामीनाथन आयोग की सभी सिफारिशें लागू होने के सथ ही कृषि व्यवस्था और किसानों की दशा में चमत्कारिक बदलाव की शुरूआत होगी। इसका लाभ न केवल सिंचाई सुविधाओं से संपन्न मैदानी क्षेत्रों को मिलेगा बल्कि कृषि के लिहाज से दोयम समझे जाने वाले पहाड़ी, पठारी और रेगिस्तानी क्षेत्रों को भी मिलेगा और जिस तरह पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हरित क्रांति के बाद उत्पादन उद्योग (मैन्यूफैक्चरिंग इंडस्ट्री) - खाद्यान्न एवं फल प्रसंस्करण और कृषि उद्योगों के विकास से श्रम का कृषि से उत्पादन की ओर स्थानांतरण हुआ है, उसी तरह पूरा देश कृषि विकास से लाभान्वित होगा।

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