किसान आंदोलन और हरित क्रांति


भारत ही नहीं पूरी दुनिया में जब भी खाद्यान्न सुरक्षा, किसान समुदाय की बेहतरी और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के विकास की बातें होती हैं तो हरित क्रांति का उल्लेख जरूर होता है। आज जब तीन कृषि कानूनों के विरोध में किसान करीब 6 महीने से आंदोलनरत हैं, पिछले तीन सप्ताह से देश की राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर धरने पर बैठे हैं, आंदोलनकारी किसानों और सरकार के बीच पांच दौर की वार्ता के बाद भी आंदोलन समाप्त होने के कोई आसार नहीं दिखाई दे रहे हैं, किसान तीनों कृषि कानूनों की वापसी की मांग से कम पर मानने के लिए तैयार नहीं हैं तो सरकार इन कानूनों कृषि विकास की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता रही है और उन्हें वापस लेने को तैयार नहीं है, जिससे किसान आंदोलन को लेकर पैदा गतिरोध बढ़ गया है। हालांकि इस आंदोलन में देश के कई राज्यों के किसान शामिल हैं लेकिन पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों की संख्या अधिक होने के कारण कई लोग जिनमें राजनेता, नौकरशाह और बुद्धिजीवी भी शामिल हैं का कहना है कि ये देश के वो समृद्ध किसान हैं जिन्हें हरित क्रांति का लाभ मिला है।

आखिर यह ‘हरित क्रांति’ है क्या? 

हरित क्रांति एक वैश्विक घटना है। कृषि विकास के संदर्भ में इसका वहीं महत्व है जो औद्योगिक विकास के संदर्भ में औद्योगिक क्रांति का है। इसका श्रेय अमेरिकी कृषि वैज्ञानिक नॉर्मन अर्नेस्ट बोरलॉग को दिया जाता है। उन्होंने 1960 के दशक में दुनिया में भुखमरी की समस्या के समाधान और कृषि उत्पादकता को बढ़़ाने के अनुवांशिकी संशोधन ;श्रमदमजपबंससल डवकपलिद्ध से सर्वप्रथम बीमारियों से लड़ने वाली गेहूं की प्रजाति का विकास किया और कृषि उत्पादन को बढ़ाने व उसे श्रमसाध्य बनाने के उद्देश्य से रासायनिक उवर्रकों एव मशीनीकरण को बढ़ावा दिया। उन्होंने अपनी खोज का सफल परीक्षण मैक्सिको में किया था। इस प्रयोग के आश्चर्यजनक परिणाम सामने आने पर दुनिया के सभी देशों ने उस तकनीक को अपनाया, जिसे ‘हरित क्रांति’ का नाम दिया गया।

भारत में हरित क्रांति का जनक आनुवांशिकी वैज्ञानिक एम.एस. स्वामीनाथन को माना जाता है। उन्होंने पंजाब को हरित क्रांति के प्रयोग के लिए चुना था। ऊपरी तौर पर भारत में भी हरित क्रांति का प्रयोग कृषि क्षेत्र में मशीनीकरण और राायनिक उर्वरकों एवं जीएम बीजों को बढ़ावा देने के प्रयोग के रूप में देखा जाता है। लेकिन व्यवहार में यह कृषि व्यवस्था में सुधार की एक बड़ी पहल थी। एम. एस. स्वामीनाथन ने जहां जीएम बीजों और परंपरागत बीजों के सम्मिश्रण से गेहूं की शंकर प्रजाति का विकास किया, जिसे बाद में धान, मक्का, बाजरा आदि अन्य फसलों पर अपनाया गया था, वहीं देश में व्यापक कृषि सुधारों की भी पहल की।

यह उस दौर की घटना है जब पं. जवाहरलाल नेहरू के बाद लाल बहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री बने थे। दूसरी और तीसरी पंचवर्षीय योजनाओं में कृषि विकास के लिए बनाई गई योजनाओं - बहु-उद्देश्यीय बांध परियोजनाओं एवं सिंचाई नहरों का निर्माण अैर उर्वरक काखानों का निर्माण आदि, के परिणाम आने थे, देश के पश्चिमी हिस्से में अकाल के कारण देश खाद्यान्न संकट का सामना कर रहा था। ठीक उसी समय (1965 में) पास्तिानी ने देश की सीमाओं पर पहले घुसपैठ बाद में प्रत्यक्ष युद्ध छेड़कर सामरिक संकट को बढ़ा दिया था। तब प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने ‘जय जवान-जय किसान’ का नारा दिया था। 

असल में, ‘जय जवान-जय किसान’ के पीछे देश को आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर और सैन्य-शक्ति संपन्न बनाने की निष्ठा निहित थी। इसके लिए शास्त्री जी ने कृषि और रक्षा क्षेत्रों को अपने नियंत्रण में रखने के बजाय कृषि मंत्री सी. सुब्रमण्यम और रक्षा मंत्री यशवंत राव चह्वाण को पूर्ण स्वतंत्रता देना ज्यादा जरूरी समझा।    

सी. सुब्रमण्यम और एम.एस. स्वामीनाथन दोनों ही तमिल भाषी यानी तमिलनाडु के थे। प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री से मिली स्वतंत्रता और स्वामीनाथन से करीबी का लाभ उठाते हुए उन्होंने हरित क्रांति को भारतीय कृषि क्रांति का नया रूप प्रस्तुत किया, जिसमें कृषि क्षेत्र में हो रहे वैज्ञानिक अनुसंधानों का लाभ किसानों तक पहुंचाने के साथ-साथ कृषि के संरचनागत और संस्थानिक विकास की प्रतिबद्धता निहित थी। 

इस तरह भारत में हरित क्रांति को जो रूप सामने आया, उसे दो भागों में बांटा जा सकता है ;

1) तकनीकी और संस्थानिक संरचना का विकास - इसके अंतर्गत निम्नलिखित कार्यक्रम निश्चित किए गए ;

क) उन्नतशील प्रजनक और आधार बीजों का उत्पादन, 

ख) सिंचाई सुविधाओं का विकास,

ग) पौध सरंक्षण कार्यक्रमों को प्रोत्साहन,

घ) बहुफसली कृषि कार्यक्रमों का प्रचार-प्रसार,

च) अत्याधुनिक कृषि यंत्रों का निर्माण,

छ) कृषि सेवा केंद्रो की स्थापना,

ज) कृषि उद्योगों को प्रोत्साहन - कृषि यंत्रों, उर्वरक और प्रसंस्करण के संबंधित।

झ) कृषि संबंधी निगमों की स्थापना - राष्ट्रीय बीज निगम, सहकारिता विकास निगम, राष्ट्रीय कृषि विपणन संघ (नेफेड), राष्ट्रीय खाद्य निगम, उर्वरक गारंटी निगम, ग्रामीण विद्वुतीकरण निगम आदि की स्थापना इसी योजना के तहम की गई।

ट) भूमि की उर्वरकता का विकास - मृदा परीक्षण, भूमि संरक्षण आदि से संबंधित कार्य इसी के अंतर्गत आरंभ हुए।

ठ) कृषि शिक्षा और अनुसंधान - राष्ट्रीय स्तर पर कृषि अनुसंधान परिषद एवं विभिन्न राज्यों में उसकी शाखाओं की स्थापना, राष्ट्रीय और प्रादेशिक स्तर के कृषि विश्वविद्यालयों की स्थापना और स्कूली शिक्षा में कृषि को बढ़ावा देने जैसे कार्यक्रम इस योजना के अंतर्गत आते हैं।

2) कृषि उत्पादन में सुधार - इसके अंतर्गत निम्नलिखित लक्ष्य निश्चित किए गए थे ;

क) उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि,

ख) कृषि के परंपरागत स्वरूप में परिवर्तन,

ग) कृषि बचत में वृद्धि,

घ) अग्रगामी और प्रतिगामी संबंधों में संतुलन - अर्थात कृषि क्षेत्र से उद्योगों को प्राप्त होने वाले और उद्वोगों से कृषि को मिलने वाली वस्तुओं की मात्रा व मूल्य में संतुलन बनाना।

हरित क्रांति के ये सुधार कार्यक्रम न तो केवल कृषि उत्पादन तक सीमति थे नहीं गेहूं, धान, मक्का, बाजरा आदि खाद्यान्नों तक। बल्कि ये कार्यक्रम कृषि पर आधारित देश की बहुसंख्य जनता (उस समय लगभग तीन-चौथाई आबादी) के आर्थिक विकास के परिप्रेक्ष्य में तैयार किए गए थे। सामान्यतः हरित क्रांति को कृषि के मशीनीकरण और उन्नत बीजों, रसायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग के जरिए उत्पादन बढ़ाने के एक कार्यक्रम के तौर पर विश्श्लेषित किया जाता है। जबकि यह देश किसानों को सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन यापन की सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में एक बड़ा कदम था, जो कि स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले ब्रिटिश हुकूमत सहित देशी राजाओं और जमींदारों के दमन और उत्पीड़न के शिकार थे।   

परिणाम: हालांकि हरित क्रांति के कार्यक्रम लागू होने के एक दशक के अंदर ही देशभर में उसका प्रभाव  दिखाई देने लगा था। देश में नए शंकर बीजों और रासायनिक उर्वरकों का प्रचलन शुरू हो गया था। लेकिन इसका लाभ जितना पंजाब और हरियाणा को मिला शेष भारत को नहीं मिला। इसकी मुख्य वजह भूमि सुधार और जमींदारी उन्मूलन कार्यक्रमों के लागू होने के बावजूद देश के अधिकतर राज्यों में अब भी सामंती और औपनिवेशिक कृषि-संबंध काफी मजबूत थे, अधिकतर राज्यों में कृषि उपजों की खरीद की कोई सुदृढ़ व्यवस्था नहीं थी और किसान अब भी साहूकारों के कर्जे में डूबे हुए थे। पंजाब और हरियाणा की स्थिति अलग थी। इन राज्यों में कृषि विकास की पहल ब्रिटिश शासनकाल में ही शुरू हो गई थी। 1937 में जब पंजाब (संयुक्त पंजाब) में यूनियनिस्ट पार्टी की सरकार बनी थी तो उसने कृषि उत्पादन मंडी एक्ट, साहूकार पंजीकरण एक्ट, गिरवी जमीनों की वापसी एक्ट, कर्ज माफी एक्ट, व्यवसाय श्रमिक एक्ट आदि बनाकर कृषि को सर्वोच्च प्राथमिकता देना शुरू कर दिया था। हालांकि इन राज्यों में भी कृषि पर निर्भर लोगों की स्थिति उद्योग, व्यापार और सेवा क्षेत्रों पर निर्भर लोगों की स्थिति से काफी कमजोर है, लेकिन देश के अन्य राज्यों से किसानों की तलना में उनकी स्थिति काफी अच्छी है।

देश के अन्य राज्यों में यदि हरित क्रांति का लाभ नहीं मिला है तो इसकी वजह जहां सामंती और औपनिवेशिक कृषि-संबंधों बने रहना और कृषि के संस्थानिक संरचना का अभाव है। उदाहरण के तौर पर बिहार को ले लें, बिहार में जहां कृषि भूमिका असमान वितरण है तो वहीं कृषि उपजों की खरीद की कोई व्यवस्था नहीं है। इस कारण बिहार के किसान भारी संख्या में पंजाब और हरियाणा में खेत-मजदूरी करने के लिए जाते हैं।

आज तीन कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे किसान आंदोलन में पंजाब और हरियाणा के किसानों की संख्या अधिक होने की वजह भी यही है कि उन्हें ही हरित क्रांति का सर्वाधिक लाभ मिला है। उन्हें डर है कि इन कानूनों से कृषि क्षेत्र में ओपन माकेर्ट का दबदबा बढ़ जाएगा, व्यापारी किसानों से मनमाने दामों पर कृषि उपज खरीदने लगेंगे, कांटेक्ट फार्मिंग के नाम पर किसान व्यापारियों के अधीन हो जाएंगे।


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