विश्वास नहीं होता ना! पर यह सच है। जरा सोचिए आप अपने बच्चे को एक आम खाने को दें और सैकड़ों मक्खियां आम सहित बच्चे के मुंह और पूरे बदन में चिपक जाएं या आप खाना खाने बैठें अनगिनत मक्खियां आकर उस पर बैठ जाएं, या आप आटा गूंथने बैठें और मक्खियां उस पर बैठ जाएं तो आप क्या करेंगे? खासकर तब जबकि मक्खियों को भगाने अथवा मारने के तमाम उपाय नाकरा साबित हों और दिन-पर-दिन यह समस्या बढ़ती ही जाए तो आप पलायन के सिवाय और क्या कर सकते हैं?
ये मक्खियां हरदोई जिला (उ.प्र.) के अहिरोरी ब्लॉक के - कुइयां, बढ़ईयन पुरवा, नयागांव, पट्टी, कैथी पुरवा, एकघरा, अकबर पुर, दौलत पुर, बक्सापुर, शुक्ला पुर, डिघिया, डही, सलेमपुर, फत्ते पुर, लालपुर आदि गांवों के लोगों के लिए जी का जंजाल बनी हुई हैं। इस समस्या से निजात दिलाने के लिए लोग जिला प्रशासन, राज्य सरकार और सांसद-विधायक से गुहार लगाई, लेकिन कोई भी उन्हें इससे निजात नहीं दिला पाया। अंततः उन्होंने मक्खियों के खिलाफ आंदोलन का रास्ता अख्तियार किया है, वे 5-6 महीनों से बढ़ईयन पुरवा गांव में धरने पर बैठे हैं।
मक्खियों की इस समस्या की जड़ कुईयां गांव (दही ग्राम पंचायत) में 7 एकड़ जमीन में स्थापित ‘सांगवान पौल्ट्री फार्म’ है। अगस्त 2014 में जब तत्कालीन मुख्यमंत्री ने पौल्ट्री फार्म के अंतर्गत ‘कॉमर्शियल लेयर्स फार्म’ का उद्घाटन किया था तो इससे स्थानीय लोगों को रोजगार मिलने और उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार के बड़े-बड़े दावे किए थे। उस समय कंपनी ने प्रतिदिन एक लाख अंडे तैयार करने का लक्ष्य रखा था, लेकिन आज कंपनी 5 लाख अंडे प्रतिदिन तैयार कर रही है, जो देश के कई शहरों को भेजे जाते हैं। ग्रामीणों के अनुसार पौल्ट्री फार्म में 172 कर्मचारी है, जिनमें से मात्र 4 स्थानीय हैं।
सांगवान पौल्ट्री फार्म की शुरुआत यों तो 2011-12 में हो गई थी, जबकि दलबीर सांगवान ने एक सिख परिवार से 3 एकड़ जमीन खरीदी थी। दलबीर सांगवान गुड़गांव, हरियाणा स्थित ‘सांगवान प्रोपर्टी एंड इंफ्रास्ट्रक्चर प्रा. लि. के मालिक के है, साथ ही ‘सांगवान पौल्ट्री फार्म गुड़गांव’ के कारण भी जाने जाते हैं। कुईयां गांव में तीन एकड़ जमीन खरीदने के बाद उससे लगी जमीन खरीदना शुरू किया, जिसके मालिक मुख्यतः दलित थे। दही के पूर्व प्रधान रामचंद्र कहते हैं कि दलबीर सांगवान ने दलितों को डरा-धमकाकर या लालच देकर जमीन बेचने के लिए मजबूर किया था।
शुरू में दो-तीन सालों तक पौल्ट्री फार्म से लोगों को खास परेशनी नहीं थी। करीब 6 साल पहले मक्खियों के रूप में उसका साइड इफैक्ट दिखना शुरू हुआ, जो पिछले दो-तीन सालों में चिंताजनक गति से बढ़ता चला गया। पहले मक्खियां कम थीं और उनका असर पौल्ट्री फार्म से एक किलोमीटर के दायरे तक था। अब पौल्ट्री फार्म के 5 से 7 किमी के दायरे में स्थित गांव उनकी जद में हैं।
मक्खियों का आतंक इतना है कि लोग सुकून से बैठ नहीं सकते हैं और न ही खाना खा सकते हैं। रसोईघर में जालियां लगाकर खाना बनाया जाता है और मच्छरदानियों में बैठकर लोग खाना खाते हैं। शादी-व्याह व अन्य समारोहों में सामूहिक भोज लगभग बंद है। इसका असर स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है। उल्टी-दस्त और बुखार की समस्या चिंताजनक गति से बढ़ गई है। कई बार तो यह समस्या जानलेवा साबित हो जाती है।
पूनियां गांव के रामनरेश ने बताया कि बीते 6 महीनों के दौरान उनके गांव के सात लोगों की मृत्यु हुई है, मरने वालों की उम्र 12-13 साल से 50 साल तक थी। ये सभी मौतें 10 से 15 दिन की बीमारी के बाद हुई थीं। इस क्षेत्र में 10 प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल हैं, सभी स्कूलों में दो साल से मिड-डे मील बंद है, क्योंकि मक्खियों के कारण बच्चे खुले में खाना नहीं खा सकते।
इन तमाम समस्याओं के कारण इन गांवों से कई परिवार पलायन कर चुके हैं, जो लोग दिल्ली, गुड़गांव, कानपुर, सूरत बेंगलुरू आदि शहरों में नौकरी करते हैं, पहले उनके बच्चे और परिजन गांवों में ही रहते थे, मक्क्षियों की समस्या के कारण वे अपने परिवार और बच्चे अपने साथ ले गए हैं। उनकी जमीन बंजर हो पड़ी है, क्योंकि मक्खियों ने फसलों को भी नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया है, उनसे बचाव के लिए बड़ी मात्रा में कीटनाशकों का उपयोग करना पड़ता है, जो काफी महंगा पड़ता है, इसलिए उनकी जमीन आबाद करने को कोई तैयार नहीं है।
एक स्थानीय स्कूल के शिक्षक ने अपना नाम उजागर न करने की शर्त पर बताया कि ग्रामीण जन प्रतिनिधियों के कारण भी यह समस्या बढ़ी है। ग्राम प्रधान और पंचायतों के सदस्य पौल्ट्री फार्म से नियमित पैसा लेते हैं, और सरकारी अफसरों के मुआइने पर आने पर कह देते हैं पौल्ट्री फार्म द्वारा बचाव के पर्याप्त उपाय किए जा रहे हैं। कई ग्रामीण इस बात को स्वीकारते हैं। क्या एमपी-एमएलए भी पैरा लेते हैं, यह पूछे जाने पर वे कहते हैं, ‘‘वे बड़े लोग है, इसका हमें क्या पता!’’ अलबत्ता स्थानीय सांसद और विधायक यहां आते रहते हैं।
पौल्ट्री फार्म के खिलाफ आंदोलन के चलते सांसद जयप्रकाश जुलाई दूसरे सप्ताह में कुईयां आए थे, धरने पर बैठे लोगों से मिलने के बाद वे पौल्ट्री फार्म में भी गए थे। स्थानीय पार्टी कार्यकर्ता ने बताया कि पौल्ट्री फार्म की गंदगी के कारण उन्होंने वहां चाय भी नहीं पी लेकिन पौल्ट्री फार्म के मालिक या प्रबंधक से उनकी क्या बात हुई, यह उन्हें नहीं मालूम!
स्थानीय (गोपामऊ) विधायक श्यामप्रकाश तीन महीने पहले कुईयां आए थे। विधायक महोदय यह तो स्वीकार करते हैं कि पौल्ट्री फार्म के कारण स्वस्थ्य संबंधी समस्या तो पैदा हुई है, इस संबंध में उन्होंने जिला प्रशासन और पौल्ट्री फार्म के मालिक से भी मुलाकात की थी। साथ ही वे यह भी कहते हैं कि पौल्ट्री फार्म को हटाया नहीं जा सकता, क्योंकि उसकी स्थापना में करोड़ों रुपए लगे है। इसके लिए पौल्ट्री फार्म द्वारा बराबर दवाइयों का छिड़काव और बचाव के अन्य कार्य किए जा रहे हैं। क्या वे इस समस्या को स्वास्थ्य सचिव और कुक्कुट पालन विभाग (पशुपालन विभाग के अधीन) संज्ञान में लाए है, पूछे जाने पर वे कहते हैं कि वे क्या कर सकते है, यह जिला प्रशासन का मामला है।
कुईयां स्थित सांगवान पौल्ट्री फार्म निश्चित ही आसपास के जिलों में सबसे बड़ा मुर्गी फार्म है लेकिन मुर्गी फार्म के कारण पैदा समस्या का यह अकेला और नया मामला नहीं है। दिसंबर 2019 में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने राज्य में मुर्गी पालन केंद्रों के लिए केंद्रीय पर्यावरण प्रदूषण बोर्ड (सीपीसीबी) के दिशा-निर्देश का पालन करने के आदेश दिए थे। मुर्गी पालन केंद्रों के कारण होने वाले प्रदूषण और उससे होने वाली पर्यावरणीय क्षति के विरुद्ध दायर एक याचिका की सुनवाई करते हुए एनजीटी ने सीपीसीबी द्वारा 2015 में जारी दिशा-निर्देश का पालन न किए जाने पर राज्य सरकार को फटकार लगाई थी, साथ ही राज्य सरकार के अधीन उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीसीबी) द्वारा मुर्गी पालन केंद्रों की स्थापना एवं संचालन के लिए अगसत 1019 में जारी नियमों को खानापूर्ति बताया था। एनजीटी के आदेश का राज्य सरकार कितना सम्मान कर पाई इसका अनुमान कुईयां, हरदोई की इस समस्या से लगाया जा सकता है।
इन्द्र चन्द रजवार

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