संसदीय समिति ने यह निर्णय (कथित तौर
पर) सितंबर 2015 में साहित्यकारों द्वारा अवार्ड वापसी को
ध्यान में रखते हुए लिया है। ज्ञात हो कि तब कन्नड़ साहित्यकार ने एम.एम. कलबुर्गी
की हत्या के विरोध में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित देश के शीर्ष 39
साहित्यकारों ने पुरस्कार वापस कर दिए थे। हालांकि साहित्यकार 20 अगस्त 2013 को
तर्कवादी मराठी विद्वान नरेंद्र दाभोलकर की और 20 फरवरी को 2015
में मराठी साहित्यकार गोविंद पनसारे की हत्या को लेकर काफी आहत थे। इन दोनों ही
घटनाओं में दक्षिणपंथी अतिवादियों का हाथ होने और सरकार पर उनके खिलाफ कोई
कार्रवाई न करने के आरोप थे।
कन्नड़ साहित्यकार कलबुर्गी न केवल
साहित्य अकादमी से पुरस्कृत लेखक थे बल्कि एक प्रतिष्ठित शिक्षाविद और विचारक भी
थे। उन्होंने कर्नाटक के लिंगायत समुदाय के इतिहास और उसकी संस्कृति को नई
अंतर्दृष्टि देने का काम किया था, उसका आरएसएस और उसके अनुसांगिक संगठनों
ने कड़ा
विरोध किया था। 30 अगस्त 2015 को कुछ लोगों
द्वारा उनकी हत्या कर दी गई थी। इसके विरोध में देशभर के साहित्यकारों ने अपने
पुरस्कार वापस कर दिए थे। उनका सत्ता प्रतिष्ठानों पर बैठै लोगों से लेकर
आरएसएस-भाजपा के कार्यकर्ताओं तक ने ‘अवार्ड वापसी गैंग’ कहकर
अपमान भी किया था।
परिवहन, संस्कृति और
पर्यटन की स्थायी संसदीय समिति, जिसके अध्यक्ष वाईएसआर कांग्रेस के
सांसद वी. विजयराई रेड्डी है, ने कहा है कि अकादमी पुरस्कार किसी भी
लेखक, कलाकार के लिए सर्वोच्च सम्मान होता है। पुरस्कार वापसी जैसी अप्रिय
घटनाएं पुरस्कार विजेताओं की उपलब्धियों को कम कर देती हैं, जिसका उनकी
प्रतिष्ठा और ख्याति पर असर पड़ता है। पुरस्कृत व्यक्ति द्वारा पुरस्कार लौटाना देश
के लिए अपमानजनक है।
समिति ने स्पष्ट किया है कि पुरस्कार
के लिए चयनित व्यक्ति को एक शपथ-पत्र देना होगा, उसके बिना किसी
भी व्यक्ति को पुरस्कृत नहीं किया जाएगा ताकि वह भविष्य में राजनैतिक कारणों अथवा
सरकार के किसी फैसले या नीतियों के विरोध में पुरसकार वापस न कर सके। यदि कोई
(पूर्व में) पुरस्कृत व्यक्ति पुरस्कार वापस करता है तो भविष्य में किसी भी
पुरस्कार के लिए उसके नाम पर विचार नहीं किया जाएगा।
इस मसले को केवल पुरस्कार वापसी से
जोड़कर नहीं देखा जा सकता है, बल्कि यह साहित्य, कला
और संस्कृति के समग्र एवं स्वाभाविक विकास का मसला है। सृजन को सहज मानवीय
अभिव्यक्ति कहा गया है, वह चाहे विभिन्न साहित्यिक विधाओं के रूप में
हो या कला रूपों में। स्थापित मूल्यों और व्यवस्था की विसंगतियों को अभिव्यक्त
करना ही उसकी अंतर्निहित चेतना होती है। अर्थात प्रतिरोध अथवा विरोध के बिना किसी
भी साहित्यिक और कलात्मक सृजन की कल्पना नहीं की जा सकती है। एक साहित्यकार अथवा
कलाकार द्वारा अपने कार्य के समान में प्राप्त पुरस्कार लौटाने को इससे अलग नहीं
किया जा सकता।
ऐसा नहीं है कि सहित्यकारों एवं
कलाकारों ने सरकार की नतियों अथवा अप्रिय घटनाओं पर अंकुश लगाने में नाकामी के
विरोध में पहली बार वर्तमान भाजपा सरकार के समय पुरस्कार वापस किए हों। 1984 के
सिख विरोधी हिंसा और स्वर्णमंदिर में सैन्य कार्रवाई के विरोध में कई साहित्यकारों,
कलाकारों,
खिलाड़ियों
और यहां तक कि राजनेताओं ने अपने पुरस्कार वापस कर दिए थे। उनमें एक नाम पंजाब के
मुख्यमंत्री रहे स्व. प्रकाश सिंह बादल का भी है, जिन्होंने देश
का दूसरा बड़ा नागरिक पुरस्कार ‘पद्म विभूषण’ वापस कर दिया
था। उसके बाद 1989 के भागलपुर दंगों के विरोध में और फिर यूपीए
सरकार में भ्रष्टाचार के विरोध में भी कई साहित्यकारों ने पुरस्कार वापस किए थे।
यह भी सच है कि कुछ अपवादों को छोड़
दिया जाए तो हमेशा ही वे ही साहित्यकार और कलाकार पुरस्कृत किए जाते रहे हैं,
जो
सत्तारूढ़ पार्टी की विचारधारा के हों और उसकी नाकामियों का मूक समर्थन करते रहे
हों। इसलिए समय-समय पर पुरस्कारों को लेकर विवाद भी उठते रहे हैं। लेकिन आज तक
किसी भी सरकार ने ऐसा विधान नहीं बनाया कि पुरस्कार प्राप्त करने की चाह रखने वाले
साहित्यकार और कलाकार सरकार का विरोध ही न कर सकें।
जैसा कि राजनीति के वि़द्वान कहते है कि आज्ञाकारी समाज का निर्माण वर्तमान सरकार का मुख्य ध्येय है। यह साफ है कि साहित्यकारों और कलाकारों को काबू में किए बिना समाज को आज्ञाकारी नहीं बनाया जा सकता है। इस विधान के बन जाने से सत्ता और व्यवस्था का विरोध करने वाले साहित्यकार और कलाकार न केवल पुरस्कार और सम्मान प्राप्त करने वालों की संभावित सूची से बाहर हो जाएंगे, बल्कि साहित्य और कला सृजन की धार भी कुंद हो जाएगी। यह सर्वमान्य तथ्य है कि सामाजिक स्वीकार्यता सृजन को प्रोत्साहित करती है, इसी से साहित्यकार अथवा प्रतिष्ठा प्राप्त होती है और सामाजिक स्वीकार्यता उसी सृजन को मिलती है जिसका शासन सम्मान करता है। देखना ये है कि साहित्यकार और कलाकार सरकार के इच्दानुसार आज्ञाकारी होना स्वीकार करते हैं या अपनी अंतर्निहित चेतना के अनुरूप इसका प्रतिकार करते हैं ?
इन्द्र चन्द रजवार

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