नजर अंदाज नहीं किया जा सकता एमएसएमई का संकट

देश का सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र अर्थात एमएसएमई सेक्टर अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहा है। इसकी पुष्टि एमएसएमई राज्यंमंत्री भानुप्रताप सिंह द्वारा लोकसभा में दिए गए वक्तव्य से भी होती है। तृणमूल कांग्रेस के सांसद कल्याण बनर्जी द्वारा पूछे गए प्रश्न का उत्तर देते हुए राज्यमंत्री ने बताया कि जुलाई 2010 से मार्च 2023 के बीच 19,687 सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग बंद हुए हैं। चिंताजनक बात तो यह है कि बंद होने वाले एमएसएमई की संख्या उत्तरोत्तर बढ़ती गई है। वित्तीय वर्ष 2021-22 में कुल 6,222 एमएसएमई बंद हुए थे, वर्ष 2022-23 में यह संख्या बढ़कर 10,655 हो गई। 

एमएसएमई सेक्टर के इस संकट का असर देश के ग्रामीण अंचलों से लेकर महानगरों के औद्योगिक केंद्रों तक साफ देखा जा सकता है। अधिकतम 20 करोड़ रुपए निवेश तक के उद्यम इसके अंतर्गत आते हैं, जिनमें अधिकतम एक करोड़ की पूंजी निवेश के उद्यम सूक्ष्म, 10 करोड़ तक के लघु और इससे अधिक पूंजी निवेश वाले मध्यम उद्यमों की श्रेणी में आते हैं। एमएसएमई मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार देश में करीब 6 करोड़ 30 लाख एमएसएमई हैं, जिनका सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में 30 प्रतिशत, उत्पादन अर्थात मैनूफैक्चरिंग में 45 प्रतिशत और निर्यात में 40 प्रतिशत का योगदान है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह क्षेत्र करीब 12 करोड़ लोगों को रोजगार प्रदान करता है, अर्थात 140 करोड़ जनसंख्या वाले इस देश की 40 से 50 करोड़ आबादी इसी क्षेत्र पर निर्भर है। देश के आर्थिक विकास में छोटे और मझोले उद्यमों की भूमिका के कारण ही शुरू से ही उन्हें खास तरजीह दी गई। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अति महत्वाकांक्ष्ी ‘स्टार्ट अप इंडिया’ योजना का मुख्य उद्देश्य ही एमएसएमई को बढ़ावा देना रहा है, जिसका सीधा संबंध ‘आत्मनिर्भर भारत’ और हर साल दो करोड़ लोगों को रोजगार देने के दावे से है। ऐसे में, एमएसएमई सेक्टर के इस संकट को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। 

इस संकट की सबसे वीभत्स तस्वीर उद्यमियों द्वारा आत्महत्या करने के रूप में सामने आती है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020 में 11,716 छोटे और मझोले उद्यमियों ने आत्महत्याएं की हैं, 2021 में यह संख्या बढ़कर 12,055 हो गई। इसकी मुख्य वजह उद्यमियों का कर्ज में डूबा होना और बाजार की मंदी रहा है। इसमें उन उद्यमियों की संख्या शामिल नहीं है जो पहले से ही किसी बीमारी से ग्रस्त थे जो कारोबार डूब जाने के कारण और अधिक बीमार होने से मर गए। इसमें यदि एमएसएमई बंद होने से बेरोजगार हुए लोगों की समस्याओं को जोड़ दिया जाए तो अत्यंत भयावह तस्वीर सामने आती है, जिनमें बेरोजगार हुए लोगों के बच्चों की शिक्षा बीच में छूटना, आर्थिक संकट के कारण बीमार परिजनों का ईलाज न करा पाना, कर्ज के कारण आत्महत्या करना अािद शामिल हैं।   

पीएचडी चेंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के मुताबिक एमएसएमई के इस संकट की शुरूआत वर्ष 2016 में नोटबंदी के साथ ही शुरू हो गई थी, जबकि भारी संख्या में छोटे और मझौले उद्यम बंद हो गए थे। उसमें जीएसटी ने आग में घी डालने का काम किया। इस दोहरी मार से वे उबरे भी नहीं थे कि कोविड-19 आ गया, तत्पश्चात यूक्रेन-रूस युद्ध और भू-राजनैतिक तनाव। इन सभी का एमएसएमई के विकास पर नकारात्मक असर पड़ा है। सबसे बड़ी मार कोरोना महामारी की पड़ी है, जबकि एक झटके में लॉकडाउन से हजारों उद्योग बंद हो गए थे और करोड़ों कामगार बेकार हो गए। 

लेकिन एमएसएमई संकट के लिए ये तात्कालिक कारण ही जिम्मेदार नहीं हैं। कोविड-19 के प्रभावों से उबरने के लिए सरकार द्वारा आसान ऋण सुविधा और ब्याज दरों में छूट के रूप में दी गई राहत के बावजूद उनके समक्ष वित्तीय तरलता, ऋण पुनर्भुगतान, कर्मचारियों का वेतन, वैधानिक बकाया की चुनौती बनी रही। पीएचडी चेंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज के पूर्व अध्यक्ष मोहित जैन की मानें तो इस बीच कच्चे माल की कीमतों में वृद्धि और परिवहन महंगा होने से उत्पादन लागत में बढ़ोत्तरी का खामियाजा भी इस क्षेत्र को भुगतना पड़ा है। 

हालांकि सरकार और नीति-निर्माता एमएसएमई सेक्टर को प्रोत्साहित किए जाने की प्रतिबद्धता को दुहराते रहे हैं, जिसे उद्यमी सरकार का सराहनीय दृष्टिकोण मानते हैं। साथ ही वे यह भी मानते हैं कि पारिस्थितिकी तंत्र की कई बुनियादी समस्याएं, अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी तक पहुंच न होना, अकुशल श्रमशक्ति और प्रतिस्पर्धी कीमतों में कच्चा माल खरीदने की अक्षमता, बाजार में आयातित सस्ते उत्पादों का सामना न कर पाना अािद कई ऐसे कारण हैं जो एमएसएमई सेक्टर प्रमुख बाधाएं है। 

स्पष्ट है कि एमएसएमई सेक्टर का सीधा संबंध र्साजनिक परिवहन व्यवस्था, बैंकिंग, प्राथमिक और तकनीकी शिक्षा, स्वास्थ्य, विदेशी व्यापार अािद सभी क्षेत्रों से है। इन सभी क्षेत्रों की स्थिति में आवश्यक सुधार के बिना एमएसएमई सेक्टर के उज्ज्वल भविष्य की कल्पना नहीं की जा सकती। यह सच है कि सरकार का दावे के अनुरूप 5 ट्रिलियन की जीडीपी का लक्ष्य हासिल करने में एमएसएमई की निर्णायक भूमिका हो सकती है। इसके लिए जहां सरकार को एमएसएमई को जरूरी रियायतें देनी होंगी वहीं उससे जुड़े सभी क्षेत्रों में आवश्यक सुधार करना होगा।


 इन्द्र चन्द रजवार

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