विपक्षी पार्टियों की 23 जून, 2023 को पटना में होने वाली बैठक को लेकर राजनैतिक माहौल गरमाया हुआ है।
कहा जा रहा है कि बैठक में 19 से
अधिक पार्टियों के नेता शामिल होंगे, जिनमें
बिहार के मुयमंत्री नीतीश कुमार सहित सरकार में शामिल जद-यू, राजद, कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों के नेता, प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के.
स्टालिन, उत्तर प्रदेश से सपा नेता अखिलेश यादव, रालोद नेता जयंत चौधरी व आजाद पार्टी के नेता चंद्रशेखर आजाद, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, शिवसेना (उद्धव गुट) के नेता उद्धव
ठाकरे और एनसीपी नेता शरद पवार आदि नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है।
स्पष्ट तौर पर बैठक का मुख्य मुद्दा आगामी
लोकसभा चुनाव के मद्देनजर विपक्षी पार्टियों की एकजुटता और उसकी रणनीति तैयार करना
है। अगस्त 2022 में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार
द्वारा एनडीए से अलग होकर राजद-कांग्रेस-वामपंथी गठबंधन में शामिल होने और
कांग्रेस नेता राहुल गांधी की ‘भारत
जोड़ो यात्रा’ के बाद देश के राजनैतिक परिदृश्य में
आए बदलाव, के चलते इस बैठक को काफी महत्वपूर्ण
माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि यह बैठक आगामी लोकसभा चुनाव में विपक्षी एकता के
लिए निर्णायक साबित होगी।
केंद्र सहित देश के दर्जनभर राज्यों में
सत्तासीन भाजपा को विपक्षी दलों की इस चुनौती का पूरा अहसास है। यदि विपक्ष एकजुट हो
गया तो उसके लिए लोकसभा ही नहीं, उससे
पहले मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना आदि राज्यों के विधानसभा
चुनाव में भी अपनी साख बचा पाना मुश्किल होगा। लिहाजा, उसने विपक्ष पर हमला तेज करने के साथ
ही अपनी रणनीति उन मुद्दों पर केंद्रित कर दी है, जिससे जनता का विश्वास फिर से हसिल कर सके।
बहुदलीय शासन व्यवस्था में सत्तारूढ़ पार्टी के
विरुद्ध विपक्षी दलों का गोलबंद होने और सत्तापक्ष द्वारा विपक्षी चालों को नाकाम
करने की कोशिश नई बात नहीं है। आजाद भारत में इस तरह की विपक्षी एकता पहली बार 1960 के दशक में देखने को मिली, जबकि डॉ. राम मनोहर लोहिया की पहल पर ‘कांग्रेस हटाओ’ नारे तहत संयुक्त समाजवादी पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, भारतीय क्रांतिदल और भारतीय जनसंघ का
मोर्चा बना था, जो देश के 8 राज्यों में संयुक्त विधायक दल
(संविद) की सरकारें बनाने में कामयाब रहा।
राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठजोड़ पहली बार
आपातकाल के बाद जय प्रकाश नारायण द्वारा समाजवादी पार्टी, कांग्रेस-एस, स्वतंत्र पार्टी व भारतीय क्रांति दल
के नए अवतार भारतीय लोकदल आदि को मिलकर बनाई गई जनता पार्टी के रूप में सामने आया।
यह इन्दिरा गांधी के नेतृत्ववाली
कांग्रेस-आर को सत्ताच्युत करने में कामयाब रहा। चूंकि इन्दिरा गांधी के खिलाफ
आंदोलन ‘समग्र क्रांति’ के नाम से हुआ था, इसलिए 1977 के चुनाव में जनता पार्टी की जीत को ‘दूसरी आजादी’
कहा गया। तत्पश्चात राजीव गांधी सरकार
में बड़े नेता वी.पी. सिंह ने अपने साथ कांग्रेस से निकले कांग्रेसियों, पुराने समाजवादियों व लोकदलियों को
मिलाकर जनता दल एवं क्षेत्रीय पार्टियों को लेकर ‘राष्ट्रीय मोर्चा’ बनाकर
कांग्रेसी को चुनौती दी। 1989 के चुनाव में राष्ट्रीय मोर्चे को
बहुमत नहीं मिला था, लेकिन धुर-विरोधी विचारधारा वाली भाजपा
और वामपंथी पार्टियों के समर्थन से सरकार बना डाली।
इसके अतिरिक्त प्रादेशिक स्तर पर भी समय-समय पर
इस तरह के गठबंधन या मोर्च बनते रहे हैं, जो
राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करने में नाकाम ही रहे। लेकिन राष्ट्रीय स्तर के
मोर्चों का भी देश का राजनैतिक, आर्थिक
और सामाजिक व्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव ही पड़ा। क्योंकि वे न केवल तात्कालिक थे, बल्कि उनका कोई वैचारिक आधार भी नहीं
था। उनका उद्देश्य सत्तारूढ़ पार्टी यानी कांग्रेस को सत्ताच्युत करना था, जिसमें वे कामयाब रहे।
दूसरी ओर, जिन समस्याओं के कारण जनता में सरकार
अथवा सत्तारूढ़ पार्टी के विरुद्ध आक्रोश था, और
जिनके नाम पर विपक्ष ने वोट मांगे थे, वे
और अधिक विकराल रूप लेकर सामने आईं, मसलन
शासन (नौकरशाही सहित) में व्याप्त भ्रष्टाचार, राजनीति
का आपराधीकरण, अर्थव्यवस्था में पूंजी का दबदबा, रालनेताओं द्वारा सत्ताधिकारों और
सार्वजनिक संपत्ति का निजी हित में उपयोग और वोट हासिल करने के लिए जाति और धर्म
के आधार पर सामाजिक ध्रुवीकरण इत्यादि। इससे जहां राजनेताओं की वैचारिक निष्ठा
खत्म हुई, जिसकी वीभत्स परिणति निर्वाचित
जनप्रतिनिधियों की खरीद-फरोख्त और चुनाव के सत्ता पविर्तन के रूप में हुई है, वहीं देश के आर्थिक विकास का लाभ
बहुसंख्य आबादी के बदले चन्द समर्थ और ऊंची पहुंच के लोगों तक सिमट कर रह गया। वोट
की राजनीति के चलते इस बीच सामाजिक समरसता का जो संकट पैदा हुआ है, वह अलग है।
निश्चित ही, आर्थिक
उदारीकरण की नीतियों का गलत तरीके से क्रियान्वयन भी इसका एक बड़ा कारण रहा है।
मौजूदा गठबंधन राजनीति के दौर में उसकी चर्चा बेईमानी ही कही जाएगी। लेकिन
विचारधारा का सवाल तो उठाया ही जाएगा। और वह यही है कि विपक्षी पार्टियों की पटना
में बैठक का मकसद भी नरेंद्र मोदी सरकार को उखाड़ फेंकना और बैठक में शामिल
पार्टियों/ नेताओं की अपने-अपने किलों को बचाने की कसरत मात्र है? जो कि, कथित तौर पर ममता बनर्जी, अरविंद
केजरीवाल और अखिलेश यादव द्वारा रखी गई एकता की शर्तों से स्प्ष्ट होता है।
बैठक का दूसरा पक्ष कांग्रेस नेता राहुल गांधी की उपस्थिति है। उन्होंने अपनी ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के दौरान देश में बढ़ती आर्थिक असमानता, सामाजिक ध्रुवीकरण और राजनैतिक केंद्रीकरण के सवालों को जनता के बीच उठाकर उसमें नई उम्मीदें पैदा की है। यदि उन्हें विपक्षी एकता के मसले पर तरजीह मिलती है तो कहा जा सकता है कि निश्चित ही विपक्षी एकता का यह प्रयोग पिछले प्रयोगों से अलग तो होगा ही, उसका एक वैचारिक आधार भी होगा। इस प्रक्रिया में यह भी संभव है कि जो पार्टियां और नेता विपक्षी एकता के झंडावरदार बने हैं वे सत्तापक्ष के साथ खड़े नजर आएं।
इन्द्र चन्द रजवार
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