भारंगम की औपचारिकता बनाम भारत का समावेशी रंगमंच


 रंगमंच का महापर्व भारंगम अर्थात भारत रंग महोत्सव संपन्न हो गया। देश की राजधानी दिल्ली सहित 10 शहरों में आयोजित भारतीय रंगमंच के इस अंतरराष्ट्रीय समारोह के तहत 80 नाट्य प्रस्तुतियों सहित पुस्तक विमोचन, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय गोष्ठियों, लीविंग लीजेंड, मास्टर क्लासेज और मीट द डायरेक्टर जैसे कार्यक्रम आयोजित किए गए। कोरोना-महामारी के कारण दो वर्षों के अंतराल के बाद आयोजित भारंगम को लेकर रंगकर्मियों में जितनी जिज्ञासा पहले देखी जा रही थी उस हिसाब से समारोह रंगकर्मियों और दर्शकों का ध्यानाकर्षित करने में असफल रहा। 


भारंगम का आयोजन, यों तो देश के सबसे बड़े नाट्य शिक्षण संस्थान राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) द्वारा किया जाता है, वही समारोह के प्रतिभागियों - रंगकर्मियों और समूहों का चयन करता है। लेकिन कार्यक्रम में केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय की प्रत्यक्ष भूमिका के कारण इसे भारत सरकार के प्रदर्शन के तौर पर देखा जाता है। इसी से समीक्षकों को रंगमंच और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के प्रति सरकार के दृष्टिकोण का आकलन करने का अवसर मिलता है।


हालांकि, भारंगम की थीम यानी विषयवस्तु इस बार ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ पर केंद्रित थी लेकिन चर्चित प्रस्तुतियां पौराणिक कथाओं और मिथकों पर आधारित नाटकों की रही, जो वर्षों से मंचित होते आ रहे हैं। कुछ रंगकर्मी इसे भी रंग महोत्सव के फीका होने का एक कारण मानते हैं। जबकि ज्यादातर रंगकर्मी इसकी वजह रंगमंच पर सत्ता का हस्तक्षेप मानते हैं। वे कहते हैं, ‘‘कहने को तो एनएसडी, संगीत नाटक अकादमी सभी ऑटोनमस (स्वायत्त) हैं लेकिन उन्हें कोई भी निर्णय लेने की स्वायत्तता नहीं है, संस्थान में कर्मचारियों की नियुक्ति, आबंटित धन का उपयोग और कार्यक्रमों के आयोजन में सत्ता का हस्तक्षेप रहता है।’’

मंडी हाउस, जो कि देश की राजधानी में कला, संस्कृति और साहित्यिक गतिविधियों का केंद्र है, में सभी रंगकर्मी भारंगम को औपचारिक बना देने की बात करते हैं। वे कहते हैं कि राजनेताओं ने रंगमंच को अपनी छवि चमकाने और अपना एजेंडा सेट करने का जरिया बना दिया है। आलोचना सभी करते हैं लेकिन कोई भी सामने नहीं आना चाहता, हर कोई नाम के उल्लेख से बचना चाहता है। क्योंकि रंगमंच आज भी पूरी तरह सरकारी ग्रांट पर निर्भर है। सरकार की नीतियों के विरोध या कार्यक्रमों पर टिप्पणी का मतलब है ग्रांट से बाहर होना। रंगकर्मियों का यह नजरिया या डर न केवल भारंगम बल्कि रंगमंच के स्वरूप पर भी प्रश्नचिन्ह लगाता है।

अभिव्यक्ति और मनोरंजन के सर्वाधिक प्रभावी माध्यम रंगमंच की यह स्थिति विचारणीय है। माना जाता है कि आधुनिक भारतीय रंगमंच को भी भारतीय लोकतंत्र के समान ही वैदिक काल से अर्जित ज्ञान और हजारों वर्ष पुरानी परंपराओं और आधुनिक पश्चिमी के विचारों के बीच लंबे समय से चले आ रहे समागम का परिणाम है। ऐसा नहीं है कि स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले देश में रंगमंच नहीं था। रंगमंच हमेशा ही रहा है, आदि नाटककार भास और अश्वघोष से लेकर भारंगम के आयोजन तक। आजाद भारत में इसे लोकतांत्रिक स्वरूप देने में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने निर्णायक काम किया था।

नेहरू स्वयं अच्छे और उच्च स्तरीय लेखक थे। कला, साहित्य और संस्कृति से उनका लगाव जगजाहिर है। वे साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में रुचि ही नहीं लेते थे बल्कि प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उनमें भागीदारी के लिए समय निकाल लेते थे। अक्सर कलाकारों, रंगकर्मियों, साहित्यकारों को अपने घर बुला लेते थे। इसकी जानकारी पं. नेहरू की आत्मकथा ‘मेरी कहानी’ सहित दर्जनों कलाकारों, साहित्यकारों और रंगकर्मियों की जीवनियों और संस्मरणों से होती है। उन्हीं की प्रेरणा से मंडी हाउस कला, संस्कृति और साहित्यिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में विकसित हुआ।

राजनैतिक तौर पर नेहरू समाजवादी थे और रूसी साम्यवाद के प्रति उनका झुकाव किसी से छिपा नहीं हैं। कहते हैं स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद (1952 के बाद) जब उन्होंने कला, संस्कृति और साहित्य के विकास के लिए गठित संस्थानों को स्वयत्तता प्रदान की तो दुनियाभर में उनकी आलोचना हुई थी। नेहरू आधुनिकता के साथ-साथ प्राचीन भारतीय सभ्यता, परंपराओं और कलाओं के समावेशी विकास के पक्षधर थे, पश्चिम से प्रभावित बुद्धिजीवी इस धारणा को अस्वीकार करते हैं। हाल ही में प्रकाशित ‘नेहरूज इंडिया: ए हिस्ट्री इन सेवन मिथ’ (टेलर सी. शरमन, लंदन स्कूल और इकोनोमिक्स) में भी इसका उल्लेख मिलता है। उन्होंने अपनी आलोचना की परवाह नहीं की, क्योंकि वे कला, संस्कृति और साहित्य में प्रत्येक व्यक्ति और समूह की अभिव्यक्ति और भागीदारी चाहते थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जिस तरह शास्त्रीय और विदेशी नाटकों के साथ-साथ विभिन्न लोकनाट्य शैलियों और नुक्कड़ नाटक को स्वीकार्यता मिली और भारतीय भाषाओं में नाट्य लेखन और मंचीय प्रयोगों का विस्तार हुआ, क्या वह भारतीय लोकतंत्र के समानांतर भारतीय रंगमंच के समावेशी स्वरूप के बिना संभव था?

इस सोच के साथ पोषित भारतीय रंगमंच के महापर्व के रूप में 1999 में शुरू भारंगम महज एक ऑपचारिकता बनकर रह जाएगा, ऐसी कल्पना न तो एनएसडी के तत्कालीन निदेशक ने की होगी और न ही उन रंकर्मियों ने की होगी, जिनके सहयोग से इसकी रूपरेखा तैयार की गई थी। हाल के वर्षों में जिस तरह एनएसडी का भौगोलिक विस्तार हुआ है और स्कूल, कॉलेजों में नाट्य शिक्षा को बढ़ावा दिया गया है, उससे समाज में रंगमंच के महत्व का अनुमान तो लगाया जा सकता है। लेकिन रंगमंच को अभिव्यक्ति, साहित्य और मनोरंजन की प्रभावी विधा और इससे बढ़कर मनुष्य और समाज को सुसंस्कृत बनाने वाली कला के तौर पर विकसित करने का दृष्टिकोण आज कहीं नहीं दिखता। (फोटो: टाइम्स ऑफ इंडिया से साभार)

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इन्द्र चन्द रजवार

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