...क्योंकि ग्रामीण मुफ्तखोरी के आदी हो गए हैं?

गांव के लोगों को देश-दुनिया की खबरों की जानकारी न हो, तो यह चौंकाने वाली बात नहीं है। क्योंकि हम उतना ही जान पाते हैं जितना कि हमारे इर्दगिर्द घटित होता है या समाचार माध्यमों से सुनते, पढ़ते हैं। चूंकि आज समाचार माध्यमों का रवैया एकतरफा हो गया है, इस कारण हमें दूसरे पक्ष की जानकारी नहीं हो पाती। लेकिन इतना विवेक तो हम में होना ही चाहिए कि हम अपने अच्छे या बुरे पर विचार कर सकें। ऐसा न होने से हम, गांव के लोग शासन की अच्छी योजना का लाभ उठाने से वंचित रह जाते हैं और जनकल्याणके नाम पर पंगु बनाने वाली योजनाओं के जाल में फंस जाते हैं। मैं बात कर रहा हूं, ग्रामीण विकास योजनाओं के संदर्भ में। 

बीते महीने, मैं उत्तर प्रदेश के दो जिलों - अयोध्या और सुल्तानपुर, में था। ये जिले केंद्र और राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी की सर्वोच्च वरीयता में आते हैं। दोनों ही जिलों में ग्रामीण विकास की योजनाओं के लिए पर्याप्त संसाधन मुहैया कराए गए हैं और ऐसे प्रशासनिक अधिकारियों को तैनात किया गया है, जिनकी पहुंच सीधे मुख्यमंत्री तक बताई जाती है। लेकिन ग्रामीणों को निर्माण-विकास योजनाओं से अधिक चिंता व्यक्तिगत आर्थिक सहायता वाली योजनाओं की है, जैसे प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान, स्वक्ष्छ भारत योजना के तहत शौचालय और पेंशन योजना। इस कड़ी में अब प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत मुफ्त राशन भी जुड़ गया है।

हर कोई इन कल्याणकारी योजनाओं के दायरे में आने की होड़ में दिखता है। लोग मनरेगा में काम नहीं करना चाहते हैं, कहते हैं मजदूरी कम है। मनरेगा के तहत व्यक्तिगत योजनाएं भी है जिसके तहत वे पशु बाड़ा या भूमि सुधार कर खेती-बागवानी और पशुपालन से अपनी आय बढ़ा सकते हैं। उन्हें या तो इसकी जानकारी नहीं है या फिर स्थाई तौर पर अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने में उनकी दिलचस्पी नहीं है। उन्हें मनरेगा में दस दिन काम करना मंजूर नहीं बल्कि पांच किलों राशन प्रतिव्यक्ति चाहिए। वे इसका हिसाब लगाना भी जरूरी नहीं समझते।

इसी तरह, बहुत सारे लोग प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान बनवाना चाहते हैं, लेकिन आजीविका मिशन के तहत समूह बनाकर हर महीने स्थाई आमदनी नहीं चाहते। वे यह नहीं जानते कि सहायता समूह से जुड़कर वे एक साल में  स्कूटी या बाइक ले सकते, जो कि उनके बच्चे का सपना हो सकता है। लेकिन वे यह नहीं जानते कि यदि उनके घर में दोपहिया वाहन हो तो प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ नहीं ले सकते। हालांकि, केंद्र और राज्य सरकारें ‘एक जिला-एक उत्पाद’ योजना के तहत निजी निवेश को बढ़ावा देने के दावे करती है, ताकि स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक कौशल का लाभ मिल सके और रोजगार के अवसर पैदा हों। गांवों के अधिकतर युवा पढ़लिखकर या तो घर में बेरोजगार बैठे हैं या फिर दिल्ली, मुबई, गुजरात, राजस्थान या हरियाणा पलायन कर गए है। लेकिन ‘एक जिला-एक उत्पाद’ योजना की जानकारी न तो पंचायत प्रतिनिधियों को है न ही ग्रामीण प्रशासन को।

‘‘मुफ्तखोरी की मानसिकता के कारण ग्रामीण विकास योजनाओं का लाभ नहीं उठा पा रहे है। लोग जब यही चाहते हैं तो हम क्या कर सकते हैं, आखिर लोकतंत्र है।’’ (ये एक अधिकारी के शब्द हैं।) यदि लोकतंत्र की बात की जाए तो दोनों ही जिलों में लोकतंत्र का नया मॉडल देखने को मिला। अयोध्या में राममंदिर तो बन ही रहा है, गांव-गांव में पुराने मंदिरों का जीर्णोद्धार हो रहा है और नए मंदिर बन रहे हैं। हालांकि अधिकतर बिरादियों के अपने देवता हैं और पुराने मंदिर भी उन्हीें के हैं। लेकिन मंदिरों का नव-निर्माण पौराणिक देवताओं के नाम पर हो रहा है। इस बहाने में गांवों में भजन-कीर्तन, सुंदरकांड और हनुमान चालीसा का पाठ हो रहा है, जिनमें आयोजन के स्तर के मुताबिक भाजपा नेताओं और आरएसएस के पदाधिकारियों की भागीदारी रहती है। गांवों की बहुसंख्य आबादी दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की है। वे मानते हैं कि राममंदिर बनने से उन्हें कोई लाभ नहीं होगा। बाहरी लोग ही इसका फायदा उठाएंगे। वे कहते हैं, ‘‘पिछले दो-तीन सालों में अयोध्या और उसके आसपास के गांवों की जमीन बाहरी लोगों ने खरीदी है, इससे लगता है कि कुछ वर्षों बाद अयोध्या में बाहरी लोगों का राज होगा।’’ हालांकि दोनों ही जिलों में आजादी के समय से ही समाजवादी राजनीति का दबदबा रहा है। लेकिन आज ग्रामीण प्रतिनिधि अपना संबंध भाजपा से जोड़ने पर गर्व महसूस करते हैं।  

दूसरी ओर, सामान्य ग्रामीणों की राय जानकर आश्चर्य हुआ कि अयोध्या में स्व. मित्रसेन यादव आज तक के सर्वाधिक लोकप्रिय संसद सदस्य रहे हैं, जो कि अलग-अलग बार भाकपा, बसपा और सपा के टिकट पर चुने गए थे। लेकिन राममंदिर आंदोलन के बाद राजनैतिक स्थिति बदल गई है। अब वहां स्थानीय नेतृत्व का कोई मतलब नहीं रह गया है। सुल्तानपुर में पहले से ही नेहरू-गांधी परिवार का प्रभा रहा है। यदि वरुण गांधी और मेनका गांधी भाजपा के साथ न हों तो भाजपा के लिए चुनाव जीतना भी मुश्किल है। वैसे, भाजपा ने अपनी चर्चित ‘नाम बदलो’ रणनीति के तहत सुल्तानपुर का नाम ‘कुशभवनपुर’ करने की घोषणा से उसका संबंध भगवान राम से जोड़ना शुरू कर दिया है।

खैर, यह राजनीति है। असल बात ग्रामीण विकास की है। लोग भजन-कीर्तन करते हैं तो करें और जिसे अपना नेतृत्व सौंपना चाहते हैं सौंपें। लेकिन वे किसी भी तरह मुफ्तखोरी के झांसे में न आएं, अपने संसाधनों, श्रम और अधिकारों को समझें और अपने नेताओं से पूछें कि मंदिर बन जाने के बाद विकास में उनकी भागीदारी क्या होगी? क्यों कुछ मुट्ठीभर उद्योगपतियों की आमदनी बढ़ती जा रही है और बहुसंख्य ग्रामीण आबादी शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार और यातायात की सुविधाओं से वंचित हैं और क्यों उनके बच्चों को रोजी-रेटी के लिए दूसरे राज्यों और शहरों में भेजने को मजबूर है? वैसे ये सवाल हम सभी को अपने नेताओं से पूछना चाहिए, चाहे हम किसी भी जिले या राज्य के हों। (फोटो: मुमारिच नगर, अयोध्या में ग्रामीणों के बीच।)    

इन्द्र चन्द रजवार 

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