वल्लीपुर सुल्तानपुर (उत्तर प्रदेश) जिला मुख्यालय अर्थात विकास भवन से 8 किमी की दूरी पर स्थित एक सागी पंचायत है। 2014-15 में सुल्तानपुर के तत्कालीन सांसद वरुण गांधी ने इसे गोद लिया था। वर्तमान समय में उनकी मां श्रीमती मेनका गांधी सांसद हैं। इन दिनों, जिस तरह वरुण गांधी किसानों और छात्र-युवाओं के सवालों को लेकर मुखर हैं और मेनका गांधी भी पार्टी अनुशासन की परवाह किए बिना आने वाले चुनावों के लिए सुल्तानपुर से अपनी दावेदारी पेश कर रही हैं, इससे वल्लीपुर को देखने की बड़ी जिज्ञासा थी।
यह जिज्ञासा तब और बढ़ गई, जब लोगों ने बताया कि वल्लीपुर के लोग बड़े ही अभद्र और खतरनाक हैं। वे सुबह से ही शराब के नशे में धुत रहते हैं। मर्द ही नहीं औरतें भी शराब की आदी हैं। एक बार श्रीमती मेनका गांधी वल्लीपुर गई तो उनका स्वागत शराब के नशे में धुत महिलाओं ने किया। मेनका जी उसी समय अपनी कार में बैठकर वापस लौट गईं।
सुल्तानपूर-अयोध्या राजमार्ग पर गोमती-पुल पार करते ही वल्लीपुर (कूड़ेभार ब्लॉक) की सीमा शुरू हो जाती है। गांव के रास्तों, मकानों और खेतों को देखकर यकीन करना मुश्किल है कि यह गांव उत्तर प्रदेश के मध्य में स्थित सुल्तानपुर जिले में स्थित हैं, जिसका एक गौरवशाली इतिहास रहा है और अब उसका नाम बदलकर ‘कुुशभवनपुर’ किए जाने की चर्चा है। लगभग 2,500 आबादी वाले वल्लीपुर के 483 परिवारों में से 113 परिवार गरीबी रेखा के नीचे हैं। वैसे तो इसे एक शहरी गांव कहा जा सकता है, जहां कि शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात, संचार सुविधाएं और रोजगार के अवसरों की स्थिति शहरों जैसी होने की अपेक्षा की जाती है। गांव में कहीं-कहीं कंक्रीट की पक्की सड़कों के साथ-साथ सीमेंट के अत्याधुनिक मकानों के आसपास फूस और पुराने खपरैल की छत वाले कच्चे मकानों की बहुतायत और बंजर खेत ग्रामीण विकास के तमाम दावों को मुंह चिड़ाते से लगते हैं। गांव में शिक्षा की स्थिति यह है कि 13 सदस्यों वाली ग्राम पंचायत के 7 सदस्य अंगूठा छाप हैं बाकी 6 भी केवल साक्षर हैं और ग्राम प्रधान को अपने पांचवी फेल होने पर गर्व है।
गांव की बहुसंख्य आबादी निषादों (मल्लाह) की है कुछ राजपूत और ब्राह्मण परिवार हैं। एक भी दलित और आदिवासी परिवार गांव में नहीं है। गांव के अधिकतर लोग सुल्तानपुर शहर में पल्लेदारी जैसी मजदूरी करके आजीविका चलाते हैं। गांव के सामने से एलीवेटेड हाईवे और रेललाइन गुजरती है। सड़क के दोनों और जमीन पर प्लॉटिंग हो रही है। गांव के लोग अपनी जमीन बेच रहे हैं और बाहरी लोग खरीद रहे हैं। ग्रामीण सब्जी उत्पादन, पशुपालन और मत्स्यपालन करके शहर के नजदीक होने का लाभ उठा सकते हैं। ग्रामीणों की इसमें रुचि नहीं है, वे मुफ्त राशन और आवास, शौचालय और पेंशन योजनाओं से खुश हैं।
सागी पंचायत होने के बावजूद वल्लीपुर में पंचायत सचिव नहीं है, सहायक विकास अधिकारी इंचार्ज सचिव है और ग्राम रोजगार सेवक भी दूसरी पंचायत से है। बातचीत 30-35 मिनट तो ठीकठाक रही, उसके बाद ग्रामीणों ने ग्राम प्रधान से लेकर रोजगार सेवक, एडीओ, कोटेदार और अन्य अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाना शुरू कर दिया। यों कहें कि हंगामा शुरू कर दिया। आरोप लगाने वाले अधिकतर लोग शराब के नशे में थे। दो-तीन महिलाएं ज्यादा ही उग्र थीं, वे भी शराब पिए हुए थीं। उन्हीं में दो-तीन युवा ऐसे भी मिले जो गांव में एक पुस्तकालय और खेल का मैदान बनाना चाहते हैं। एक व्यक्ति गांव के एलवेटेड हाईवे/रेल लाइन में सब-वे बनवाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, सांसद मेनका गांधी तक को पत्र लिख चुके हैं, यह मामला राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण का होने की बात कहकर हाथ खड़े कर दिए। अब उन्होंने ग्रामीणों के हस्ताक्षयुक्त ज्ञापन राज्य के मुख्यमंत्राी को भेजा है।
निश्चित ही, वल्लीपुर की अपनी चुनौतियां हैं, ग्रमीणों को शराब के जहर से मुक्त कराने से लेकर बुनियादी जरूरतों तक की, इनका सामना तो वल्लीपुर के लोगों को ही करना होगा। लेकिन बाकी सागी पंचायतों में भी ऐसा कुछ भी उल्लेखनीय नहीं दिखता जो आसपास के अन्य गंावों में न हो। जबकि सांसद आदर्श ग्राम योजना शुरू करते समय कहा गया था कि ‘स्मार्ट सिटी’ की तर्ज पर विकसित सागी पंचायतें सामाजिक-आर्थिक विकास का मॉडल होंगी, जिससे आसपास के अन्य गांव प्रेरणा लेंगे। ग्रामीण इस बात पर खुश हो सकते हैं कि उनकी पंचायत को सांसद ने गोद लिया है, इस बहाने सांसद महोदय कभी-कभी गांव में आ जाते हैं। यदि ग्राम प्रधान विरोधी पार्टी के हों तो वे सांसद पर अपनी निधि से यानी संसद सदस्य स्थानीय विकास निधि से एक भी रुपया गांव को न देने की शिकायत करते हैं। यह शिकायत जिला और विकास खंड स्तरीय अधिकारियों की भी रहती है।
लेकिन, असल बात वित्तीय संसाधनों की नहीं बल्कि पंचायत कार्य योजना बनाने और उसका कार्यान्वयन की है। सागी पंचायत के विकास के लिए ग्रामीण विकास और पंचायती राज विभागों के अतिरिक्त शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, पशुपालन, ग्रामीण अभियंत्रण, सार्वजनिक निर्माण आदि की सक्रिय भागीदारी की बात भी कही गई है। इसके लिए जिला स्तर पर नोडल अधिकारी नियुक्त किए गए हैं। इस आधार पर यदि पंचायत प्रतिनिधि और प्रशासन गोद लिए गांव के विकास के लिए सांसद महोदय से संसद सदस्य निधि से धन आबंटित करने का प्रस्ताव करे तो शायद ही सांसद उसे अस्वीकार करे। बल्कि सच तो यह है कि आज केंद्रीय और राज्य वित्त आयोगों और मनरेगा जैसी स्कीमों से ग्राम पंचायतों को आबंटित धन का भी अशिक्षित पंचायत प्रतिनिधियों और अपर्याप्त कर्मचारियों के कारण समुचित उपयोग नहीं हो पाता। यह स्थिति बदलनी चाहिए।
इन्द्र चन्द रजवार
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