यूपी के योगी से दो कदम आगे बिहार के सुशासन बाबू


मुंगेर के लखनपुर में मुखियाओं के बीच बिहार के पंचायती राज मंत्री सम्राट चौधरी।

उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों के दूसरे चरण में क्या हुआ, यह बताने की जरूरत नहीं है। क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत सदस्यों की 25 प्रतिशत से कम सीटें जीतने पर भी भाजपा ने, कैसे ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्षों की लगभग 90 प्रतिशत सीटें जीती, इसकी खबर पूरे देश को है। हत्या, अपहरण, महिलाओं की मर्यादा से खिलवाड़, ड्यूटी पर तैनात अफसरों से बदसलूकी और पत्रकारों की पिटाई जैसी घटनाएं हुईं। इसके बावजूद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने चुनाव प्रक्रिया शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न होने की बात कहकर, न केवल खुद अपने कंधे थपथपाए बल्कि गुंडई करने वालों को भी अभयदान दे डाला।

लगता है, उत्तर प्रदेश की घटनाओं से सबक लेते हुए ‘सुशासन बाबू’ यानी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पंचायत चुनाव से पहले ही इसका इंतजाम कर लिया है। कहा गया है कि यूपी सरकार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बहुप्रचारित लोकप्रियता के चलते जमीनी सच्चाईयों का आकलन करने में नाकाम रही, यदि उसे पंचायत चुनाव में भाजपा की हार का थोड़ा भी अंदेशा होता तो वह विपक्षी उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने ही नहीं देती। बिहार के मुख्यमंत्री तो पहले दिन से ही शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी, महंगाई, आदि सवालों को लेकर विपक्ष के हमलों का सामना कर रहे हैं, जिसका असर पंचायत चुनाव पर पड़ना तय है। लिहाजा सुशासन बाबू ने ऐसी रणनीति बना डाली कि पंचायत चुनावों में सरकार विरोधी अथवा विपक्ष समर्थक उम्मीदवार चुनाव जीत ही न पाए। सरकार के निर्देश पर राज्य चुनाव आयोग ने इस पर अमल करना शुरू भी कर दिया है।

बिहार में पंचायतों का कार्यकाल समाप्त हो जाने के बावजूद अभी चुनावों की तिथि तय नहीं हुई है। राज्य के बड़े हिस्से में बाढ़ के प्रभाव को देखते हुए पंचायत चुनाव की तारीखें तय होने में अभी एक से डेड़ महीने का समय लगने का अनुमान है। लेकिन राज्य निर्वाचन आयोग ने चुनाव की तैयारियां पूरी कर ली हैं। आयोग ने पंचायत चुनाव 10 चरणों में कराने, सरपंच  (ग्राम कचहरी प्रमुख) के चुनाव बैलेट पेपर से एवं मुखिया (ग्राम प्रधान), ग्राम पंचायत, पंचायत समिति व जिला पंचायत सदस्यों के चुनाव ईवीएम से कराने और 850 वोटरों पर एक बूथ बनाने का निर्णय लिया है। 

बड़ी बात यह है कि राज्य निर्वाचन आयोग ने भारी संख्या में पंचायतों को नक्सल प्रभावित बताते हुए प्रशासन को चुश्त-दुरुस्त रहने और चुनाव पूर्व स्क्रूटनिंग कराने के आदेश दिए हैं, जिससे कि कथित तौर पर नक्सली संगठनों से संबंध रखने वाले लोग पंचायत चुनावों में हिस्सा न ले सकें। स्पष्ट है कि चुनाव के दौरान हिंसा अथवा गड़बड़ी की आशंका के नाम पर उन्हें जेल के सलाखों के पीछे धकेला जा सकता है। 

जानकारों का कहना है कि इसके जरिए बिहार की नीतीश-भाजपा सरकार वामपंथी पार्टियों के समर्थकों को पंचायत चुनाव से बाहर रखना चाहती है। ज्ञात हो कि पिछले साल हुए बिहार विधानसभा चुनाव में वमापंथी दलों ने अच्छी-खासी बढ़त हासिल की है, जिसमें नक्सलबाड़ी आंदोलन से निकले सीपीआई-एमएल (लिब्रेशन) का बड़ा हिस्सा रहा है। यह भी स्पष्ट है कि वामदलों की ग्रामीण गरीबों, दलितों और आदिवासियों पर अच्छी पकड़ रही है। लेकिन राज्य सरकार के इस फरमान से वामपंथियों समेत राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस और अन्य सरकार विरोधी पार्टियों के समर्थक डरे हुए हैं। उन्हें डर है कि सरकार उन्हें नक्सल समर्थक बताकर पंचायत चुनाव लड़ने से वंचित रख सकती है और उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई कर सकती है। 

नक्सली प्रभाव के नाम पर राज्य के कितने लोगों को पंचायत चुनाव में भागीदारी से दूर रखा जा सकता है, इसका अनुमान मुजफ्फर पुर जिले के पारू और मीनापुर प्रखंडों के आधार पर लगाया जा सकता है। पारू प्रखंड में पंचायत चुनाव के लिए कुल 476 बूथ बनाए गए हैं, जिनमें से 322 को नक्सल प्रभावित करार दिया गया है जबकि मीनापुर के कुल 398 बूथों में से 251 को नक्सल प्रभावित बताया गया है। स्थानीय पुलिस ने इन कथित नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में दबिश देना शुरू कर दिया है। पंचायतों के संभावित उम्मीवारों से पूछताछ की जा रही है और उनके राजनैतिक संबंधों के रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं। 

सूत्रों के अनुसार सरकार इस रणनीति के पीछे पंचायती राज मंत्री और बीजेपी-एमएलसी सम्राट चौधरी (राकेश कुमार) की अहम् भूमिका है। श्री चौधरी पिछले छः महीनों से गांवों के मुखियाआंे व सरपंचों, ब्लॉक प्रमुखों और जिला पंचायत अध्यक्षों से मिलने और उनकी बैठकें लेने में व्यस्त बताए जाते हैं। इन दिनों वे जनसंख्या नियंत्रण कानून पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ मतभेद को लेकर चर्चाओं में हैं। वे दो बच्चे वाले लोगों को पंचायत चुनाव में भागीदारी के खिलाफ हैं, जबकि मुख्यमंत्री कह चुके हैं कि चुनाव में हिस्सा लेना देश के प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है, जनसंख्या नियंत्रण कानून से किसी को भी उसके अधिकारों से वंचित नहीं रखा जा सकता।

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