कोविड-19 महामारी ने बढ़ा दी हैं कुपोषण ग्रस्त आबादी की मुश्किलें


कोविड -19 महामारी ने कुपोषण की समस्या से जूझ रही देश की बहुत बड़ी आबादी की मुश्किलों को और बढ़ा दिया है। आर्थिक रूप से कमजोर और गरीब परिवारों के बच्चों के लिए यह समस्या अस्तित्व संकट का कारण बनकर सामने आई है। वर्ल्ड विजन इंडिया, नामक देश के प्रमुख स्वैच्छिक संगठन (एनजीओ) के मुताबिक कोविड-19 महामारी ने देश के 11 करोड़ 50 लाख बच्चों को कुपोषण के खतरे में डाल दिया है। यह बात संस्था ने देश के 28 राज्यों और 9 केंद्र शासित राज्यों के 640 जिलों में किए गए अध्ययन आधारित ‘इंडिया चाइल्ड वेल-बीइंग रिपोर्ट 2020’ में कही है। 

कोविड-19 महामारी और पहली और दूसरी लहर के दौरान लगाए गए लॉक डाउन कप सबसे ज्यादा मार निम्न और निम्न मध्य वर्ग के लोगों पर पड़ी है। असंगठित क्षेत्र सहित छोटे और मझौले उद्योग व कारोबार बंद होने से भारी संख्या में लोग बेरोजगार हुए हैं और उनकी आय में गिरावट आई है। इससे उनकी पौष्टिक खाद्य पदार्थों तक पहुंच कम हुई है और स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा सेवाओं में रुकावट पैदा हुई है। देश की दो-तिहाई से अधिक आबादी के बच्चों को 18 महीने पहले यानी कोविड-19 महामारी शुरू होने से पहले की तुलना में पौष्टिकता के लिहाज से लगभग आधा भोजन ही मिल पा रहा है। इस बीच स्कूल बंद होने से शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के करोड़ों बच्चे मिड-डे मील (मध्यान्ह भोजन) से भी वंचित हुए हैं। 

कुपोषण की यह समस्या देश के विभिन्न राज्यों में अलग-अलग तरह की है। केरल, तमिलनाडु, पंजाब, हिमाचल प्रदेश और जम्मू और कश्मीर में बेहतर स्थिति है तो बिहार, झारखंड ओडिशा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। राज्यों के भी जिलों और क्षेत्रों एक जैसी स्थिति नहीं है। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश के पश्चिमी जिलों में कुपोषण की समस्या उतनी बिकराल नहीं है जितनी कि पूर्वी और बुदेलखंड क्षेत्र के जिलों की है। इसी तरह मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल क्षेत्रों की तुलना में कृषि, उद्योग और व्यापार की दृष्टि से उन्नत जिलों में कुछ बेहतर स्थिति है। शहरों में भी मलिन बस्तियों मे कुपोषण की समस्या अधिक चिंताजनक है तो कुछ सीमित क्षेत्रों में इसका असर कम पड़ा है। 

सामाजिक तौर पर भी कुपोषण की समस्या विभिन्न समूहों का स्तर स्तर अलग-अलग है। महिला और बाल विकास विभाग के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-2016 के के अनुसार अनुसूचित जनजातियों 28 प्रतिशत, अनुसूचित जातियों की 22 प्रतिशत और अन्य पिछड़े वर्गों के 20 प्रतिशत लोग कुपोषण की समस्या से ग्रस्त है। लेकिन कोविड-19 के कारण बढ़ी कुपोषण की समस्या की मार सभी क्षेत्रों, वर्गों और समूहों के बच्चों पर सबसे ज्यादा पर पड़ी है।

कुपोषण की यह समस्या आने वाले दिनों में कितनी भयावह हो सकती है इसका अनुमान यूनीसेफ की रिपोर्ट से लगाया जा सकता है, जिसमें कहा गया है कि भारत में कुपोषण के कारण बालमृत्यु दर में 15.4 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है। यूनीसेफ की ‘द स्टेट ऑफ वर्ल्डस चिल्ड्रन-2019’ रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2018 में भारत में पांच साल से कम उम्र के 8.8 लाख बच्चों की मृत्यु कुपोषण के कारण हुई थी। रिपोर्ट में के अनुसार इस उम्र के दुनिया के प्रत्येक 3 बच्चों में एक कुपोषण जनित समस्याओं से ग्रस्त है। भारत में हर दूसरा बच्चा किसी न किसी रूप् से कुपोषण का शिकार है। 2019 में ही जारी यूनीसेफ की ‘वर्ल्ड हंगर इंडेक्स’ (विश्व भुखमरी सूचकांक) के अनुसार दुनिया के 117 देशों में भारत 102वें स्थान पर था।

कुपोषण का सबसे बड़ा कारण गरीबी और क्रय शक्ति की कमी है, जिससे लोग पोषक और गुणवत्तापूर्ण भोजन प्राप्त नही ंकर सकते। महिलाओं के प्रति भेदभाव और स्वच्छ पेयजल व दूषित वातावरण के कारण भी कुपोषण की समस्या बढ़ी है। कुपोषण के कारण, मुख्यतः बच्चों और महिलाओं में एनीमिया (खून की कमी), घेंघा और हड्डियों से संबंधित रोग पैदा हो जाते हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव और जानकारी न होने से यह समस्या अधिक जटिल हो जाती है। इसका सीधा असर लोगों की उत्पादन क्षमता पर पड़ता है। उन्हें अपनी आय का बड़ा हिस्सा कुपोषण जनित बीमारियों के उपचार में व्यय करना पड़ता जाता है।

भारत सरकार ने 2018 में ‘राष्ट्रीय पोषण मिशन’ की शुरूआत करते हुए 2022 तक ‘कुपोषण मुक्त भारत’ बनाने का दाव किया था। इस अभियान के पहले पोषण संबंधी कार्यक्रमों के लिए 9046.17 करोड़ रुपए स्वीकृत किए गए थे। साथ ही प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना, प्रधानमंत्राी जननी सुरक्षा योजना और किशोरी कल्याण कल्याण योजना का इसमें समायोजन किया गया था। पोषण अभियान के लिए स्वीकृत धनराशि महिला और बाल विकास के सालाना बजट से अलग है। अभियान के तहत प्रत्येक बच्चे को (गर्भावस्था के 270 दिनों सहित) 1000 दिन तक पोषक आहार उपलब्ध कराने का दावा किया गया था। लेकिन विभिन्न मंत्रालयों और केंद्र व राज्य सरकारों के बीच तालमेल न होने के कारण स्वीकृत धनराशि का मात्र 16 प्रतिशत ही व्यय होने की बात कही जा रही है। 

पोषण संबंधी कार्यक्रमों के कार्यान्वयन की जिम्मेदारी महिला और बाल विकास विभाग को दी गई है। जमीनी स्तर पर आंगनवाड़ी और आशा कार्यकर्ता ही कुपोषण ग्रस्त लोगों को भोजन और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराती हैं, जो तात्कालिक जरूरत हो सकती है। लेकिन कुपोषण की समस्या का हल लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधार और उनकी क्रय शक्ति को के बिना नहीं किया जा सकता। इसके लिए शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में कृषि, व्यापार, उद्योग और सेवा क्षेत्रों के उच्च लक्ष्यों का निर्धारण कर रोजगार के अवसरों में वृद्धि करने की आवश्यकता है। साथ ही शिक्षा को रोजगारोन्मुख कर स्वास्थ्य सेवाओं को प्रत्येक व्यक्ति की पहुंच में लाने की जरूरत है। कोविड-19 महामारी के प्रभावों को देखते हुए सरकार को इस दिशा में यथाशीघ्र निर्णायक पहल करनी चाहिए, अन्यथा कुपोषण और गरीबी का चक्र बढ़ता ही जाएगा।

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