निर्वाचित प्रतिनिधियों की खरीद-फरोख्त से अर्थहीन हो जाएंगी पंचायतें


उत्तर प्रदेश के पंचायती राज मंत्री भूपेंद्र चौधरी सपा के गढ़ कन्नौज में समर्थकों के साथ 

देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में निर्वाचित जिला पंचायत सदस्यों की खरीद-फरांख्त का बाजार गर्म है। सत्तारूढ़ भाजपा सहित सभी पार्टियां इस बाजार की खरीददार बनीे हुई हैं। आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर हर कोई जिला पंचायतों के अध्यक्ष पदों पर अपने आदमी तैनात करने को आतुर है। विभिन्न जगहों से मिल रही खबरों के मुताबिक एक-एक वोट यानी जिला पंचायत सदस्य की कीमत 1 लाख से 5 लाख रुपए तक लगाई जा रही है।

करीब तीन सप्ताह पहले जब पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव परिणामों की घोषणा हुई थी तो कहा गया था कि पंचायत चुनाव में भाजपा को भारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है। उसे जिला पंचायत सदस्यों की 25 फीसदी से भी कम सीटें मिली हैं। उसके गढ़ कहे जाने वाले गोरखपुर, लखनऊ, अयोध्या, आगरा आदि जिलों में 10 फीसदी से कम भाजपा उम्मीदार चुनाव जीते हैं। जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव होने तक स्थिति एकदम उलट गई है। 

राज्य के 17 जिलों में भाजपा उम्मीदवारों के निर्विरोध जिला पंचायत अध्यक्ष चुने जाने की खबर हैं और राज्य के दो-तिहाई से अधिक जिलों में उसकी जीत की संभावना व्यक्त की जा रही है। राज्य की दूसरी बड़ी पार्टी सपा ने राज्य सरकार पर आरोप लगाया है कि पुलिस व स्थानीय प्रशासन का इस्तेमाल कर जिला पंचायत अध्यक्ष के उसके उम्मीदवारों को नामांकन के लिए रोका गया और जिला पंचायत सदस्यों को लालच देकर और धमकाकर अपने पक्ष मंे मतदान कराया जा रहा है। साथ ही वोट मैनेजमेंट न कर पाने के कारण पार्टी के कई जिला अध्यक्षों को पद से हटा दिया गया है। 

हालांकि तीन स्तरीय पंचायत प्रणाली में जिला पंचायत और क्षेत्र पंचायत (पंचायत समिति) के अध्यक्ष पदों के चुनाव में सदस्यों की खरीद-फरोख्त आम बात है। देश के लगभग सभी राज्यों में यह शुरू से ही यानी 1994 में वर्तमान पंचायत प्रणाली लागू होने के समय से ही, चला आ रहा है। (इसका एकमात्र समाधान जिला पंचायत और क्षेत्र पंचायत के अध्यक्षों के चुनाव भी ग्राम प्रधान/सरपंच की तरह सीधे जनता द्वारा और दल-विहीन आधार पर कराया जाना हो सकता है।) लेकिन मौजूदा कोविड-19 महामारी के दौर में यह प्रवृति पंचायती राज व्यवस्था के लिए घातक होने के साथ-साथ देश के लिए भी चिंताजनक है। 

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दुनिया के तमाम लोकतांत्रिक देश कोविड-19 के प्रभावों का सामना करने के लिए स्थानीय शासन को अधिकतम स्वायत्तता और सुविधाएं प्रदान करने की नीतियां और योजनाएं बना रहे हैं। विपक्षी पार्टियों और विशेषज्ञों के सुझावों पर महामारी के दूरगामी सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभावों का मुकाबला करने के लिए स्थानीय शासन को मजबूत किया जा रहा है। लेकिन भारत में जनता द्वारा चुने गए पंचायत प्रतिनिधियों की खरीद-फरोख्त के जरिए स्थानीय स्वशासन का अप्रासंगिक यानी अर्थहीन बनाने की साजिश चरमोत्कर्ष पर है। जबकि कोविड-19 की पहली लहर में ही ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोना संक्रमण को रोकने, प्रवासी श्रमिकों के आइसोलेशन व कोरंटीन की व्यवस्था देखने, ग्रामीणों को महामारी के प्रति जागरूक करने, आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने और जरूरतमंदों को भोजन व राशन वितरण में पंचायती राज संस्थाओं की निर्णायक भूमिका जग-जाहिर हो चुकी थी। 

केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा कोविड-19 महामारी का सामना करने के लिए पंचायतों को अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध कराने के दावे पूरे न किए जाने के बावजूद पंचायत प्रतिनिधियों ने निजी स्रोतों और स्थानीय लोगों के सहयोग से बचाव और राहत कार्य संचालित किए। केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु जैसे राज्यों में जहां पंचायतों को राज्य सरकारों का सहयोग मिला और जहां पंचायतों को विधायी और वित्तीय शक्तियां प्राप्त हैं, पंचायतों की इस भूमिका की पूरी दुनिया में सराहना हुई है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में पंचायतों की इस भूमिका को नजर अंदाज कर उनका राजनैतिक इस्तेमाल पंचायती राज प्रणाली के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। 

जिला पंचायतों के अध्यक्ष पदों के चुनाव के लिए सदस्यों की खरीद-फरोख्त का असर जिला पंचायत सहित क्षेत्र पंचायत और ग्राम पंचायत के कामकाज पर भी पड़ना तय है। सरकार भले ही लाख दावे करे कि आर्थिक विकास और समाज कल्याण की योजनाओं और उनके लिए धन का आवंटन सीधे ग्राम पंचायतों को होता है। मनरेगा जैसी रोजगार स्कीम हो या प्रधानमंत्री आवास योजना या फिर कोई अन्य योजना लाभार्थी का पैसा सीधे उसके खाते में जाता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि कोई भी सामूहिक योजना हो या व्यक्तिगत उसे अंतिम स्वीकृति जिला पंचायत से ही मिलती है। 

इस बात को एक सामान्य ग्रामीण भी समझ सकता है कि करोड़ों खर्च कर बना जिला पंचायत अध्यक्ष अथवा लाखों में बिका सदस्य जनता के हित में क्या काम करेगा? और, विकास योजनाओं के नाम पर व्यय होने वाला धन कितना उन पर व्यय होगा और कितना जनता के इन प्रतिनिधियों (?), नौकरशाहों और विचौलियों की जेब में जाएगा? देश के अधिकतर राज्यों में पंचायतों की निजी स्रोतों से होने वाली आमदनी नगण्य है, चुनाव में लाखों रुपए खर्च करने वाले ग्राम प्रधानों, क्षेत्र पंचायत सदस्यों और जिला पंचायत सदस्यों को विकास योजनाओं के धन से ही उसकी भरपाई भी करनी होती है। ऐसे में उन्हें योजनाएं पारित कराने के लिए कितना कमीशन देना पड़ सकता है, इसका अनुमान ही लगाया जा सकता है।


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