आज हम, मानव सभ्यता के ज्ञात इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में एक कोविड-19 महामारी का सामना कर रहे हैं। करीब डेड़ साल पहले पैदा इस संकट ने लोगों के व्यक्तिगत, व्यावसायिक, संस्थागत आदि सभी पक्षों का प्रभावित करना शुरू कर दिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ो के मुताबिक अब तक (4 जून, 2021) दुनिया में 17.33.93.953 लोग इससे संक्रमित हुए हैं और 37,29,378 लोगों की मृत्यु हो चुकी है। हमारे देश में संक्रमितों संख्या 2.86,94,479 और इससे मरने वालों की संख्या 3,44,101 दर्ज की गई है। देश-विदेश के समाचार माध्यमों एवं संस्थाओं की सर्वे रिपोर्टों की माने तो भारत में कोविड-19 से मरने वाले लोगों की संख्या 15 लाख से 42 लाख तक हो सकती है। इसमें वे लोग शामिल नहीं हैं जिनकी मृत्यु अस्पतालों को कोविड सेंटर में बदल दिए जाने से अन्य बीमारियों का उपचार न होने से हुई है।
दुनिया के अधिकतर देशों की कमोवेश यही स्थिति है। भारत सहित कई विकासशील देशों की चुनौती कोविड-19 का सामना करने को लेकर है। विकसित देशों ने महामारी से पैदा आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, प्राकृतिक और मनोवैज्ञानिक समस्याओं का सामना करने की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। सभी इस बात पर सहमत दिखाई देते हैं कि सत्ता और पूंजी का विकेंद्रीकरण किए बिना महामारी के प्रभावों का सामना
नहीं किया जा सकता है।
भारत में, इंपैक्ट एंड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट ने अगस्त, 2020 में ‘‘लेसन्स फ्रॉम कोविड-19: इंपावरिंग पंचायती राज इंस्टीट्यूशंस’’ पर विचारगोष्ठी का आयोजन कर एक पहल की थी। दुर्भाग्यवश, इसे न तो सरकार ने गंभीरता से लिया और न ही नीति-निर्माण प्रक्रिया को प्रभावित करने में समर्थ बुद्धिजीवियों ने। विचार गोष्ठी को संबोधित करते हुए इंस्टीट्यूट ऑफ कॉमनवेल्थ यूनीवर्सिटी, लंदन के प्रोफेसर जेम्स मैनोर ने कहा कि किसी भी समस्या का समाधान करने के लिए शासन का जवाबदेही और पारदर्शी होना आवश्यक है। विकेंद्रीकरण लोकतांत्रिक प्रक्रिया में ग्रामीणों की भागीदारी से जवाबदेही और पारदर्शिता को बढ़ाता है।
‘‘डिसेंट्रलाइजेशन एंड इंपावरमेंट फॉर रूरल डवलपमेंट’’ (हरि के. नागरंजन, हंस विश्वंगर और एस. मीनाक्षीसुंदरम द्वारा लिखित) पुस्तक के हवाले से उन्होंने कहा कि पंचायती राज संस्थाएं ग्रामीण गरीबी उन्मूलन अथवा न्यूनीकरण में निर्णायक भूमिका का निर्वाह करती है। स्थानीय स्वशासन के निर्वाचित प्रतिनिधि समाज के गरीबी/कमजोर लोगों की स्थिति जानते हैं और उन्हें आर्थिक विकास और समाज कल्याण की योजनाओं का लाभ दिलाने में सक्षम होते है।
कोरोना महामारी के पहले से ही पंचायतें लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराती रही है। निर्वाचित महिला पंचायत सदस्य जन सामान्य और स्वास्थ्यकर्मियों की बीच संवाद-सेतु की भूमिका निभाती हैं। वे ग्रामीणों की भाषा और बीमारी दोनों जानती हैं। भारत के अधिकतर राज्यों में ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा और पंचायतों की दयनीय स्थिति जगजाहिर है लेकिन केरल, कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छात्तीसगढ़ आदि राज्यों में पंचायतों ने कोविड-19 की टेस्टिंग, ट्रेसिंग और ट्रीटमेंट में अहम् भूमिका निभाई है।
ग्रेट ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ सर्विस की केंद्रीकृत व्यवस्था का उदाहरण देते हुए प्रो. मैनोर ने कहा कि केंद्रीकृत स्वास्थ्य सेवा की कीमत लोगों ने अपनी जान देकर चुकाई है। कोविड-19 के चलते सरकार को इसका अहसास हुआ तो इसके विकेंद्रीकरण पर जोर देते हुए स्थानीय शासन की इकाईयों - काउंटी काउंसिल, डिस्ट्रिक्ट काउंसिल, यूनीटेरी काउंसिल और म्युनिसपल डिस्ट्रिक्ट काउंसिल आदि को पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराने शुरू किए हैं।
उन्होंने कहा कि स्थानीय शासन की उपेक्षा और उसे आवश्यक संसाधन उपलब्ध न कराकर कोई भी देश विकास के लक्ष्य को हासिल नही ंकर सकता। द. अफ्रीका में भारत की ‘‘मनरेगा’’ तर्ज पर शुरू की गई ग्रामीण रोजगार योजना स्थानीय शासन को आवश्यक धन उपलब्ध न कराने से असफल हो गई। अर्थव्यवस्था पर कोविड-19 का बुरा असर पड़ा है। उद्योग और व्यापार बंद होने से बेरोजगारी बढ़ी है। यह समस्या शहरों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक है, वहां रोजगार के सीमित अवसर हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए पंचायती राज संस्थाओं को पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराकर इसका सामना किया जा सकता है।
विचार गोष्ठी में पूर्व केंद्रीय पंचायती राज मंत्री मणिशंकर अय्यर ने देश के विभिन्न राज्यों में पंचायती राज व्यवस्था की स्थितियों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि जिन राज्यों में पंचायतों की जितनी स्वायत्तता प्राप्त है वहां कोविड-19 का सामना करने में उतनी ही सफलता मिली है। उन्होंने 73वें संविधान संशोधन अधिनियम का हवाला देते हुए कहा कि यदि राज्य सरकारें संविधान के अनुच्छेद 243 के प्रवाधानों को ईमानदारी से लागू करें और अनुसूची 11 में उल्लिखित सभी विषयों से संबंधित कार्यक्रमों के कार्यान्वयन के लिए आवश्यक संसाधन प्रदान करें तो कोविड-19 की चुनौतियों का देश आसानी से सामना कर सकता है।
उन्होंने कहा कि आर्थिक विकास और समाज कल्याण के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए विकास प्रक्रिया में जनता की भागीदारी पंचायती राज व्यवस्था का आधार है। दावा किया गया है कि संविधान के उक्त प्रवाधानों के अंतर्गत केंद्र और राज्य सरकारें सभी विधायी और वित्तीय शक्तियां और संसाधन उपलब्ध कराएंगी। लेकिन पंचायतों को वे अधिकार न मिल पाने से पंचायती राज व्यवस्था ‘‘सरपंच राज’’ में तब्दील हुई है। ऐसे सभी राज्यों में पंचायत चुनाव में उम्मीदवारों की जीत-हार को राज्य सरकार या सत्तारूढ़ पार्टी की लोकप्रियता के रूप में देखी जाती है।
कोविड-19 संकट की शुरूआत में भारत सरकार ने एकाएक मनरेगा बजट में वृद्धि करने के साथ ही पंचायतों को संसाधन उपलब्ध कराने के जो दावे किए थे। राज्य सरकारों ने भी कोरोना संक्रमण को रोकने से लेकर प्रभावितों को राहत उपलब्ध कराने व स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी पंचायतों को सौंपते हुए उन्हें वित्तीय सहायता देने की घोषणाएं की थीं। इससे लगा था कि पंचायतों जिम्मेदारियों के साथ-साथ अधिकार भी लिेंगे। एक साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी ऐसा कुछ नहीं हुआ है। सरकारों के इस उदासीनतापूर्ण रवैए से पंचायतों के निर्वाचित प्रतिनिधि ही नहीं पंचायती राज, ग्रामीण विकास व ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा और विभिन्न केंद्रीय योजनाओं के कर्मचारी भी आहत हैं। सभी राज्य कर्मचारी अपनी समस्याओं को लेकर आंदोलित हैं।
एक ओर जहां दुनियां के सभी लोकतांत्रिक देश विकेंद्रीकरण को कोविड-19 का सबसे बड़ा सबक मानते हुए स्थानीय शासन को सुदृढ़ करने में जुटे है। वहां की सरकारें महामारी के दूरगामी परिणामों का सामना करने के लिए वे स्वाथ्य, शिक्षा, अर्थव्यवस्था, राजनीति, पर्यावरण आदि क्षेत्रों के विशेषज्ञों की सिफारिशों को तरजीह दे रही हैं। वहीं हमारा नेतृत्व पंचायती राज संस्थाओं को उनके घोषित अधिकार देने के बजाय उनका उपयोग जनता में अपनी पैठ बनाने के लिए कर रहा है। विशेषज्ञों के सुझाव मानना तो दूर, उनकी बातें सुनना भी सरकार को गवारा नहीं है। सरकार का यह रवैया देश के वर्तमान ही नहीं भविष्य के लिए भी घातक है।
(फोटो स्रोत: यूथ का आवाज)
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