मनरेगा : बर्खास्तगी के आदेश के बावजूद काम पर नहीं लौटे आंदोलनरत कर्मचाारी

 


देहरादून में अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे मनरेगा कर्मचारी।

आखिर वही हुआ जिसकी आशंका थी। उत्तराखंड सरकार ने बीते 75 दिनों से आंदोलरत मनरेगा (महात्मा गांधी ग्रामउीण रोगजगार गारंटी योजना) कर्मचारियों को यथाशीर्घ काम पर लौटने का नोटिस जारी कर दिया है। अन्यथा उनकी सेवा समाप्त कर दी जाएगी। यदि ऐसा हुआ तो क्या राज्य सरकार मनरेगा योजनाओं के संचालन के लिए आउटसोर्सिंग का सहारा लेगी? यानी उसे प्राइवेट ठेकेदारों के हवाले कर देगी?

उत्तराखंड में मनरेगा के भविष्य को लेकर यह असमंजसपूर्ण स्थिति तब पैदा हुई है जबकि राज्य को इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। कोरोना महामारी के चलते देश के विभिन्न शहरों में काम करने वाले प्रवासी गांव में बेरोजगार बैठे हैं। कई लोगों ने मनरेगा के लिए पंजीकरण कराया है और नए जॉबकार्ड बनवाए हैं। लेकिन मनरेगा कर्मियों की हड़ताल से गांवों में ग्रामीण विकास की योजनाएं ठप्प  हैं। श्रमिकों को पुराने काम का भुगतान भी नहीं हुआ है, नए काम शुरू नहीं हो पाए है। इसका असर चालू वित्तीय वर्ष की योजनाओं पर पड़ना भी तय है।

राज्य में करीब 13 हजार मनरेगा कर्मचारी संविदा पर कार्यरत हैं, जिनमें उप जिला कार्यक्रम अधिकारी, कनिष्ठ अभियंता, कंप्यूटर ऑपरेटर, जिला कंप्यूटर प्रोग्रामर और ग्राम रोजगार सहायक हैं। 2006 में मनरेगा स्कीम लागू होने के बाद होनी इन पदों पर संविदा पर नियुक्तियां हुई हैं। सभी संविदा कर्मचारियों का न केवल मानदेय यानी वेतन न केवल उसी स्तर के नियमित राज्य कर्मचारियों से बहुत कम हैं बल्कि उनकी नौकरी की भी कोई गारंटी नहीं हैं। बीडीओं से लेकर मुख्य विकास अधिकारी तक बिना किसी पूर्व सूचना चेतावनी या उनका पक्ष सुने बिना किसी भी समय बर्खास्त कर सकते हैं। 

इस व्यवस्था के विरुद्ध मनरेगा कर्मचारियों में शुरू से असंतोष था। कई सालों से वे नियमितीकरण, विभागों में समायोजन और ग्रेड पे लागू करने की मांग कर रहे थे। इन्हीं मांगगों को लेकर 15 मार्च, 2021 को उन्होंने अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू कर दी और जिला मुख्यालयों और राजधानी देहरादून में सचिवालय के आगे धरने पर बैठ गए। हड़ताल शुरू होने के करीब तीन सप्ताह बाद 8 अप्रैल को आंदोलनरत कर्मचारियों और राज्य प्रशासन के अधिकारियों के बीच वार्ता के बाद मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया था कि सरकार मनरेगा कर्मचारियों की समस्याओं पर विचार करने करगेी। इसके बाद भी मनरेगा कर्मियों का आंदोलन शांतिपूर्ण तरीके से चलता रहा। 

मुख्यमंत्री का ये आश्वासन उस वक्त धरा का धरा रह गया जब 15 मई को अपर मुख्य सचिव मनीषी पंवार ने उन्हें आंदोलन समाप्त करे के लिए 15 दिन का समय देते हुए चेतावनी दे डाली कि यदि वे काम पर नहीं लौटे तो उनकी सेवा समाप्त कर दी जाएगी और मनरेगा योजनाओं के लिए आउटसोर्सिंग की सहायता ली जाएगी। 

इस बीच ग्राम प्रधानों और ग्राम विकास अधिकारियों सहित कई कर्मचारी संगठन मनरेगा कर्मियों की मांगों को जायज ठहराते हुए यथाशीघ्र उनका समाधान करने की मांग कर कर चुके थे। ग्राम प्रधानों ने तो मनरेगा कर्मियों की मांगें न माने जाने पर ब्लॉक ममुख्यालयों में ताला लगवाने तक की चेतावनी दे डाली थी। उल्लेखनीय है कि मनरेगा योजनाओं के कार्यान्वयन में ग्राम प्रधानों और ग्राम विकास अधिकारियों की निर्णायक भूमिका होती है। लेकिन बिना ज्ूनियर इंजीनियर, डाटा ऑपरेटर और ग्राम रोजगार सहायक के काम करना उनके मुश्किल है।  

राज्य प्रशासन ने आंदोलनरत मनरेगा कर्मचारियों का समर्थन कर रहे ग्राम प्रधानों और ग्राम विकास अधिकारियों की मांगों पर विचार करना भी जरूरी नहीं समझा। अपर मुख्य सचिव की चेतावनी के अनुरूप आंदोलनरत कर्मचारियों के काम पर न लौटने पर उन्हें बर्खास्त करने संबंधी आदेश जारी कर दिया। राज्य समन्वयक की ओर से 29 मई को सभी जिलों के मुख्य विकास अधिकारियों को जारी इस आदेश में कहा गया है कि आंदोलन कर रहे मनरेगा कर्मचारी यदि काम पर नहीं लौटते तो उन्हें तत्काल प्रभाव से बर्खास्त कर दिया जाए। 

प्राप्त सूचनाओं के अनुसार राज्य सरकार के उक्त आदेश के बावजूद उत्तराखंड के मनरेगा कर्मचारी काम पर नहीं लॉटे हैं। लिहाजा, यह प्रश्न उठ खड़ा हुआ है कि क्या अपर मुख्य सचिव के कहे अनुसार राज्य सरकार मनरेगा योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए आउटसोर्सिंग का सहारा लेगी? यदि ऐसा हुआ तो यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण होगा। कुछ अपवादों को छोड़कर देश के सभी राज्यों में मनरेगा कर्मचारियों के शासन के सौतेपन का सामना करना पड़ता है। जिन राज्यों में पंचायती राज और ग्रामीण विकास विभागों का एकीकरण हो गया है वहां यह कम दिखाई देती है लेकिन संविदा पर नियुक्त कर्मचारियों को वहां भी वही सब झेलना पड़ता है। यदि उत्तराखंड में मनरेगा को आउटसोर्सिंग हवाले कर दिए जाने पर क्या अन्य राज्य इससे बच पाएंगे? 

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