फतेहपुर के ललौली गांव में एक महीने के दौरान 100 लोगों की मौत और उसी दौरान पंचायत चुनाव होना, शासन की संवेदनहीनता को तो उजागर करता ही है, जो किसी भी सभ्य समाज के लिए किसी कलंक से कम नहीं है। इस बहाने यदि फतेहपुर जिले के सामाजिक-आर्थिक विकास की जाए तो हमारे राजनैतिक नेतृत्व और विकास के प्रति हमारे सोच का बौनापन ही उजागर होता है।
गंगा-यमुना के दोआब में स्थित फतेहपुर कुछ ही साल पहले तक उपजाऊ खेतीहर और बुंदेलखंड के शुष्क क्षेत्रों के बीच एक पुल की तरह रहा है। कहते हैं, बौद्धकाल में भी यह क्षेत्र काफी समृद्ध था। मुगल बादशाह औरंगजेब ने यहां अपना शस्त्रागार और छावनी स्थापित की थी। अंग्रेजों ने एक सुनियोजित रणनीति के तहत शिक्षा और अकादमिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में इलाहाद को और आर्थिक व औद्योगिक एवं सामारिक गतिविधियों के लिए कानपुर को विकसित किया। फतेहपुर के लोग जो कृषि और कृषि आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर निर्भर थे, वहां कारखानों वे व्यापारिक प्रतिष्ठानों में मजदूरी करने लगे।
आजाद भारत में, देश के दो प्रधानमंत्रियों - लाल बहादुर शास्त्री और विश्वनाथ प्रताप सिंह का फतेहपुर से गहरा संबंध रहा है। लाल बहादुर शास्त्री के फतेहपुर से संबंध के कारण ही उनके बेटे हरिकृष्ण शास्त्री दो बार (1980 और 1984) में यहां से लोकसभा सदस्य चुने गए और केंद्र में मंत्री बने। वी. पी. सिंह कांग्रेस से अलग होने के बाद 1989 में फतेहपुर लोकसभा सदस्य चुने गए थे और देश के प्रधानमंत्री बने। तत्पश्चात 1991 में भी वे फतेहपुर से ही लोकसभा सदस्य चुने गए। फतेहपुर को इसका कोई लाभ नहीं मिला, उल्टा आर्थिक विकास की दौड़ में निरंतर पिछड़ता चला गया।
आज स्थिति यह है कि जिले में कुछ ईंट भट्टों को छोड़ एक भी उद्योग नहीं है। कृषिभूमि के असमान वितरण और सीलिंग एक्ट लागू न होने से कुछ लोगों के पास अकूत जमीन है तो अधिकतर या तो सीमांत किसान हैं या फिर भूमिहीन, जो खेत मजदूरी अथवा शहरों में मजदूरी कर आजीविका चलाते हैं। आर्थिक पिछड़ेपन और संसाधनों के असमान वितरण के कारण जिले का सामाजिक विकास भी अवरुद्ध हुआ है। शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार, ग्रामीण परिवहन आदि की दशा अत्यंत दयनीय है।
वर्तमान राजनैतिक नेतृत्व की बात की जाए तो क्षेत्रीय सांसद साध्वी निरंजन ज्योति केंद्र सरकार में राज्य मंत्री हैं। जिले में 6 विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र हैं। पिछले चुनाव में पांच पर भाजपा के और एक पर उसकी सहयोगी पार्टी अपना दल के उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीते थे, जिनमें से दो -रणवेंद्र प्रताप सिंह और जयकुमार सिंह जैकी (अपना दल) राज्य सरकार में मंत्री हैं। मजे की बात ये है कि सभी 6 विधायक करोड़ों (एक करोड़ से 16 करोड़ तक) की संपत्ति के मालिक हैं। सांसद साध्वी निरंजन ज्योति देशभर में धार्मिक प्रवचन करने के लिए जानी जाती हैं तो विधायकों की प्राथमिकता अपने व्यवसाय का विकास करना है।
कृषि योग्य भूमि अत्यधिक उपजाऊ होने के कारण गांवों की सार्वजनिक उपयोग की भूमि पर प्रभावशाली लोगों का कब्जा है। कुछ अपवादों को छोड़कर जिले के किसी भी गांव में गोचर नहीं बचा है। गांवों में स्कूल, अस्पताल खेल का मैदान आदि बनाने के लिए भी जमीन नहीं है। ग्रामीण विकास और पंचायती राज के तहत योजनाएं पारित भी होती हैं तो जमीन उपलब्ध न होने के कारण वे या तो लागू नहीं हो पाती या फिर कागजों में ही बन पाती हैं।
जिले के पिछड़ेपन को ध्यान में रखते हुए फतेहपुर को आंकाक्षी ;।ेचपतंजपवदंसद्ध जिला घोषित किया गया है, जिसका मकसद जिले में पर्याप्त वित्तीय संसाधन, आवश्यक एवं कुशल प्रशासनिक नेतृत्व और नप्रतिनिधियों एवं प्रशासन के सामंजस्य से विकासयोजनाओं का प्रभावी तरीके से कार्यान्वयन हो सके। नीति आयोग के दावे के मुताबिक आंकाक्षी जिलांे को निकटवर्ती जिलों के लिए विकास के मॉडल के रूप में विकसित किया जाएगा। लेकिन फतेहपुर में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है।
जिले में जिला स्तरीय अधिकारियों से लेकर निचले स्तर तक कर्मचारियों तक कई पद रिक्त पड़े हैं। विकास प्रक्रिया में निर्णायक भूमिका का निर्वाह करने वाले ब्लॉक डवलपमेंट अफसरों (बीडीओ) के ही करीब आधे पद रिक्त पड़े हैं। जिला स्तरीय अधिकारियों बीडीओ का अतिरिक्त कार्यभार दिया गया। ग्रामीण विकास और पंचायती राज विभाग के स्वीकृत पदों में से आधे से ज्यादा रिक्त पड़े हैं। यह स्थिति स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, सिंचाई आदि की भी है। यही नहीं जिले के शीर्ष प्रशासनिक यानी जिला अधिकारी और मुख्य विकास अधिकारी के पदों पर अक्सर नए/अनुभवहीन अधिकारियों की नियुक्ति की जाती रही है।
कोरोना महामारी के चलते एक बार इस बात की पुष्टि हुई है कि किसी भी जिले/क्षेत्र का विकास ऊपर से थोपी गई या प्रचारित योजनाओं से नहीं बल्कि विकास प्रक्रिया में जन सामान्य की भागीदारी से ही हो सकता है। यदि फतेहपुर (पूरे प्रदेश में) स्थानीय स्वशासन/पंचायती राज व्यवस्था को सुदृढ़ किया होता, उन्हें संविधान में उल्लखित विधायी और वित्तीय शक्तियां प्रदान की होती तों जनता शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार आदि से जुड़ी समस्याओं का समाधान स्वयं कर लेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी मजबूत होती। तब कोरोना संकट का सामना करना भी इतना मुश्किल नहीं होता।

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