गांव में लोग मर हे थे, साथ ही पंचायत चुनाव की तैयारी चल रही थी। पहली मौत 10 अप्रैल को हुई, उसके बाद हर रोज दो-तीन, दो-तीन लोगों की मौत हो रही थी। 23 अप्रैल को 7 लोगों की मौत हुई। 26 अप्रैल को मतदान होना था। गांव की रहनुमाई के दावेदार घर-घर जाकर वोट मांग रहे थे और सरकारी अमले के लोग भी बराबर गांव का दौरा कर रहे थे। किसी ने भी गांव मे हो रही मौतों को किसी ने गंभीरता से नहीं लिया। न चुनाव टले और न ही लोगों के मरने का सिलसिला। 13 मई, 2021 तक गांव के 100 लोग अपनी जान गंवा हो चुके थे।
यह दास्तान फतेहपुर (उ.प्र.) जिले के ललौली गांव की है। जिला मुख्यालय से 35 किमी दूर बांदा रोड पर स्थिति ललौली करीब 25 हजार की आबादी वाला कस्बेनुमा गांव है। गंगा-यमुना के दोआब में दो महानगरों - कानपुर और इलाहाबाद के मध्य स्थित फतेहपुर हालांकि एक खेतीहर जिला है। लेकिन ललौली में खेती पर निर्भर लोगों की संख्या बहुत कम है। अधिकतर लोग आसपास के शहरों सहित दिल्ली, मुंबई, जयपुर, अहमदाबाद, चंडीगढ़ आदि शहरों में मेहनत-मजदूरी और असंगठित क्षेत्र में काम कर अपनी आजीविका चलाते हैं। रोजी-रोटी के लिए गांव के 500 से 700 के बीच विभिन्न शहरों में प्रवास में रहते हैं। अकेले मुंबई में करीब 250 लोगों के काम करने की बात कही जाती है।
गांव के लोग कहते हैं, कोविड-19 की दूसरी लहर में प्रवासियों के गांव लौटने पर कोरोना संक्रमण बढ़ा और उसी से लोगों की मौत हुई है। लेकिन प्रशासन लोगों की मौत का कारण कोरोना संक्रमण के बजाय रहस्यमय बीमारी मानता है। इसकी वजह गांव में कोविड-19 की कोई जांच और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव माना जा सकता है।
खबरों के मुताबिक, पहले लोगो को मामूली सी खांसी हुई, फिर बुखार आया, सांसें फूलने लगी और 1-2 दिन में ही उनकी मौत हो गई। अधिकतर को डाक्टर के पास जाने का भी समय नहीं मिल पाया।
गांव में सरकारी स्वास्थ्य सेवा के नाम पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) है, जहां न तो जानकार स्वास्थ्यकर्मी तैनात है और न ही दवाएं मिलती हैं। कहने को तो जिले का एकमात्र टेली मेडिसन सेंटर भी ललौली में ही है, लेकिन वहां भी कोई प्रशिक्षित डॉक्टर नहीं है। गांव/कस्बे में कुछ झोलाछाप डॉक्टरों की दुकानें (क्लीनिक) हैं। स्वास्थ्य संबंधी छोटी-मोटी परेशानी में लोग सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में जाने के बजाय उन्हीं के पास जाते हैं।
इस बार भी, 10 अप्रैल को गांव में पहली मौत हुई तो ग्रामीणों ने झोलाछाप डॉक्टरों की शरण लेनी शुरू कर दी। लेकिन इसका कोई लाभ नहीं हुआ। रोजाना गांव में 1 से 3 लोगों की मौत होने लगी। 23 अप्रैल को एक ही दिन में 7 लोगों की जान गई।
ग्राम प्रधान और क्षेत्र पंचायत व जिला पंचायत सदस्यता के उम्मीदवार घर-घर जाकर वोट मांग रहे थे। बड़ा गांव होने के नाते विभिन्न राजनैतिक पार्टियों के जिला स्तरीय नेताओं का आना-जाना लगा हुआ था। चुनाव ड्यूटी में तैनात सरकारी कर्मचारी भी बराबर गांव में आ रहे थे। लेकिन किसी ने भी गांव में हो रही मौतों को गंभीरता से नहीं लिया।
25 अप्रैल को क्षेत्रीय सांसद और केंद्रीय ग्रामीण विकास राज्य मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति फतेहपुर के दौरे पर थी। जिले के आला अफसरों और पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठकों में उन्होंने प्रधानमंत्री किसान कल्याण योजना से लेकर ग्रामीण विकास की तमाम योजनाओं का बखान कर पंचायत चुनाव को प्रभावित करने की कोई कसर नहीं छोड़ी तो कोविड-19 से बचाव के लिए घरेलू नुस्खे अपनाने की हिदायत दे डाली। मतदान के दिन फतेहपुर में विकने वाले सभी अखबारों के वही छाई हुई थीं।
श्मशान घाटों की चिंताओं के धुंए, कब्रिस्तानों की गुबार और मरे लोगों के परिजनों की चीत्कार के बीच, 26 अप्रैल को पंचायत चुनाव के लिए मतदान भी हो गया। गांव वालों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि चुनाव में कौन जीता और किसकी हार हुई।
समाचार माध्यमों से इसका खुलासा होने पर जिले के आला अफसरों ने ललौली का दौरा करना शुरू कर दिया। जिला अधिकारी अपूर्वा दुबे ने ललौली में मरने वालों की संख्या भ्रामक होने और 37 लोगों के मरने की बात कही है। जबकि ग्रामीण विकास और पंचायत सशक्तिकरण को लेकर सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता अनीस भाई कहते हैं ललौली मंे मरने वालों की संख्या 150 तक हो सकती है। 13 मई के बाद भी कई लोग मरे हैं। अनीस भाई आगे कहते हैं, फतेहपुर में ललौली अकेला गांव नहीं है, जहां कोरोना जांच न होने और स्वास्थ्य सुविधाएं न मिलने से लोगों की मृत्यु हुई हैं।
इस बात की तस्दीक सरकार के आंकड़ों से की जा सकती है। सरकार यानी जिला प्रशासन के अनुसार 13 मई से पहले के 45 दिनों में फतेहपुर में कोविड-19 से 122 लोगों की मौत हुई है जबकि उसी दौरान जिले में मरने वाले 1020 लोगों मृत्यु प्रमाणपत्र जारी हुए है। क्या ये बाकी सभी मौते उसी कथित रहस्यमयी बीमारी से हुई हैं?
हालांकि, इस तरह कोरोना टेस्टिंग न होने और समय पर उपचार न होने से कथित रहस्यमय बीमारी से लोगों की मृत्यु राज्य के कई हुई है। राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह जनपद गोरखपुर के उनवल नगर पंचायत में भी ऐसे ही दर्जनों लोगों की मौत का मामला सामने आया है और हमीरपुर जहां कि गंगा नदी में तैरती लाशें दिख जाने से हड़कंप मच गया था, फतेहपुर से ज्यादा दूर नहीं है। ये तमाम घटनाएं मुख्यमंत्री योग आदित्यनाथ और भाजपा के बहुप्रचारित ‘‘रामराज्य’’ की हकीकत बयां करने के लिए काफी हैं। लेकिन इन घटनाओं से उनकी सेहत पर उसी तरह कोई फर्क पड़ता नजर नहीं आता जिस तरह ललौली में पंचायत चुनाव में हार-जीत के फैसलों को कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है।
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