ऑक्सफोर्ड पॉलिसी मैनेजमेंट (ग्रेट ब्रिटेन) के अनुमान पर यकीन करें तो कोरोना महामारी खत्म होने तक 2.6 अरब (दुनिया की एक तिहाई से अधिक) आबादी इससे प्रभावित हो चुकी होगी। कमजोर स्वास्थ्य सेवाओं और असमानतापूर्ण सामाजिक-आर्थिक स्थिति वाले देशों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।
ऑक्सफोर्ड पॉलिसी मैनेजमेंट (ओपीएम) की यह रिपोर्ट दुनिया में, सार्स (2002-04) और इबोला (2014-16) के प्रभावों और कोविड-19की मार एवं उससे बचाव के उपायों के अध्ययन पर आधारित है। रिपोर्ट में कहा गया है कि स्थानीय शासन को स्वायत्तता प्रदान करके ही कोविड-19 के दूरगामी सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभावों को कम किया जा सकता है। संस्था ने स्थानीय शासन व्यवस्था को मजबूत करने के लिए आवश्यक सुझाव भी दिए हैं।
ओपीएम की इस चेतावनी के अनुरूप दुनिया के अधिकतर लोकतांत्रिक देशों ने कोविड-19 तात्कालिक एवं दूगामी प्रभावों का सामना के लिए स्थानीय शासन को अधिकतम स्वायत्तता प्रदान करना शुरू कर दिया है। संघात्मक शासन व्यवस्था का आदर्श सं.रा. अमेरिका, जर्मनी, कनाड़ा, रूस आदि ही नहीं एकात्मक शासन व्यवस्था के प्रतीक ग्रेट ब्रिटेन, स्पेन, इटली आदि ने भी कोविड-19 के पहले दौर में ही प्रादेशिक सरकारों को ये निर्देश दे दिया था कि स्थानीय शासन के अधिकार क्षेत्र में किसी तरह का हस्तक्षेप न करें।
इटली की केंद्रीय सरकार ने मई, 2020 में ही देश की सभी (20) प्रादेशिक सरकारों को कोविड-19 का सामना करने के लिए स्थानीय सरकारों (कम्यूनी और फ्राजिओनी) को पर्याप्त आर्थिक संसाधन हस्तातिंरित करने और उनके कामकाज में किसी तरह का दखल न देने निर्देश दे दिए थे, ताकि वे महामारी की प्रकृति और स्थानीय जरूरतों के अनुसार निर्णय लेकर काम कर सके।
उसी दौरान ग्रेट ब्रिटेन में नीतिगत मामलों को छोड़ शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सेवा, स्वच्छता आदि सभी कार्यों के संबंध में योजनाएं बनाने और उनपर अमल करने का अधिकार काउंटी काउंसिल, डिस्ट्रिक्ट काउंसिल, यूनीटेरी काउंसिल और म्युनिसपल डिस्ट्रिक्ट काउंसिल दिए जाने का ऐलान कर दिया था। इसके लिए केंद्रीय सरकार द्वारा पर्याप्त आर्थिक संसाधन भी उन्हें दिए गए।
अमेरिका में हालांकि, स्थानीय शासन व्यवस्था काफी सुदृढ़ है। स्थानीय शासन इकाईयां - काउंटी, टाउन एंड टाउनशिप ऑथेरिटीज, म्युनिसपल गवर्नमेंट और स्पेशल पर्पज लोकल गवर्नमेंट संघीय और प्रादेशिक सरकारों के समा नही अधिकार संपन्न है। कोरोना संकट शुरू होते ही सभी स्थानीय सरकारों ने स्थानीय जरूरतों के अनुसार अपने अधिकारों पर अमल करना शुरू कर दिया था।
जर्मनी, रूस, कनाडा, स्पेन, आस्ट्रिया, फ्रांस, बेल्जियम आदि ने भी कोविड-19 की पहली लहर के समय ही कोरोना संकट का सामना करने लिए स्थानीय शासन को स्वायत्तता प्रदान करने का ऐलान कर उन्हें संसाधन उपलब्ध कराना शुरू कर दिया था। अधिकतर देशों ने नीतिगत मामलों को छोड़कर सभी आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय मामलों में स्थानीय शासन हस्तांतरित कर दिए थे।
ओपीएम ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि विकसित ही नहीं विकासशील देशों में भी जहां स्थानीय शासन सुदृढ़ है, कोविड-19 कम मारक साबित हुआ है और उसके दूरगामी प्रभाव भी अन्य क्षेत्रों से कम हो सकते है। संस्था ने रियोडिजेनेरा व साओपोलो (ब्राजील) वेस्टर्न प्रोविंसी (दक्षिण अफ्रीका) और केरल (भारत) की तुलना न्यूयार्क (अमेरिका) से करते हुए कोविड-19 का सामना करने में स्थानीय शासन के कार्यों की सराहना की है।
सवाल ये उठता है कि आज जब देश कोरोना महामारी से त्रस्त है तो क्या भारत सरकार केरल का पंचायती राज मॉडल अपनाने के लिए देश के अन्य राज्यों को प्रेरित करेगी अथवा पंचायती राज अधिनियिम में संशोधन कर देश के सभी राज्यों में पंचायतों के संवैधानिक प्रावधानों को लागू करने की व्यवस्था सुनिश्चित करेगीी?
केरल की पंचायती राज व्यवस्था की मिसाल यों तो समय-समय दी जाती रही हैं, लेकिन कोरोना काल में संक्रमण रोकने से लेकर प्रभावितों को आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं, गरीबों को भोजन व राशन उपलब्ध कराने और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा करने में पंचायतों ने जो भूमिका निभाई है, वह देश के सभी राज्यों के लिए अनुकरणीय है। वहां ग्राम पंचायतों का आकार देश के अन्य राज्यों की तुलना में काफी बड़ा है लेकिन प्रत्येक ग्राम पंचायत अपने-आप में एक सरकार है। डिस्ट्रिक्ट बोर्ड और राज्य सरकार भी उनके कामकाज में दखल नहीं दे सकती। संविधान में 29 विषय ग्राम पंचायतों को हस्तांतरण किए जाने की बात कही गई है। केरल में कुल 32 विषय ग्राम पंचायतों को हस्तांतरित किए गए है।
कोविड-19 की दूसरी लहर में जहां देश अन्य राज्यों में अस्पतालों से लेकर अंत्येष्टि स्थलों तक त्राहि-त्राहि मची है, दवाईयों की कालाबाजारी, खस्ताहाल स्वास्थ्य सेवाओं, प्राइवेट अस्पतालों की लूट और प्रशासन द्वारा कोरोना से संबंधित आंकड़े छिपाए जाने की रिपोर्टाें से राज्य सरकारों की किरकिरी हो रही है वहीं केरल महामारी का डटकर मुकाबला कर रहा है। राज्य के मुख्यमंत्री पिनारई विजयन द्वारा केंद्र से प्राप्त रेमडेसिविर केंद्र को वापस करना एक मिसाल है, ताकि उसका देश के अन्य राज्यों में इस्तेमाल हो सके। यही नहीं, कोरोना संकट के चलते देश के बाकी हिस्सों में व्यापारियों ने तमाम वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें बढ़ा दी हैं, जिस पर प्रशासन का कोई नियंत्रण नहीं है तो केरल में पंचायतें और नगर निकाय बाजार व्यवस्था पर कड़ी नजर लगाए हुए हैं, ताकि कोई भी व्यापारी जनता की मजबूरी का फायदा न उठाने पाए।
इसके बावजूद यदि देश के अन्य राज्य केरल के पंचायती राज मॉडल को नहीं अपनाते और केंद्र सरकार कोई पहल नहीं करती तो यह देश का दुर्भाग्य होगा। पूर्व में जिस तरह मनमोहन सिंह सरकार ने प. बंगाल के थ्री-एफ फार्मुला और गुड-गवर्नेंस सिस्टम को पूरे देश में लागू करने की पहल की थी, उसी तरह वर्तमान मोदी सरकार को केरल मॉडल अपनाते हुए देश का कोरोना महामारी के तात्कालिक और दूरगामी प्रभावों को कम करने की पहल करनी चाहिए। यह पहल ही ‘‘आत्मनिर्भर भारत’’ की असली बुनियाद होगी।



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