कोरोना संकट: अंधकारपूर्ण भविष्य की और बढ़ रही एक पूरी पीढ़ी

कोरोना महामारी की भयावहता ने देश/दुनिया को आर्थिक संकट की और धकेलने के साथ ही समाज को मनोरोगी बनाना शुरू दिया है। समाज का बहुत बड़ा समुदाय जिसमें मुख्यतः छात्र-युवा आते हैं इसकी चपेट में है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के ताजा आंकड़ों  के अनुसार 17 मई 2021 तक दुनिया में संक्रमितों की संख्या 16,45,23,394 और इससे मरने वालों की संख्या 34,12,032 हो गई थी। भारत में यह संख्या क्रमशः 2,57,72,440 और 2,87,122 हो गई थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस पर भी नाराजगी जाहिर की है कि कई देशों द्वारा कोरोना संक्रमितों और उससे मरे लोगों के आंकड़े छिपाए है, जिनमें भारत भी एक है। ऐसे में कोरोना से संबंधित आंकड़ों की बात करना बेईमानी लगता है।

हालांकि हम अभी भी कोरोना संकट को लेकर ‘‘गोमूत्र’’ व ‘‘गोबर’’ से नहीं उबर पाए हैं और कोरोना के उपचार में सरकार की नाकामियों व नीतिगत फैसलों के विवाद में उलझे हुए हैं। लेकिन दुनिया के अधिकतर देशों ने इसके दूरगामी सामाजिक और आर्थिक प्रभावों पर काम करना शुरू कर दिया है। इटली और स्पेन ने एक साल पहले ही इसका अध्ययन कर योजनाएं बनाना शुरू कर दिया था। उसके बाद ग्रेट ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, जापान आदि देशों में भी कोरोना संकट के दौरान व्यापारियों की लूट को रोकने से लेकर उसके दूरगामी प्रभावों को कम करने लिए योजनाएं और नीतियां बनाई गई हैं।

भारत की स्थिति इसके उलट है। यहां न केवल व्यापारी सहित निजी अस्पतालों और शिक्षण संस्थानों को लूट की छूट मिली हुई है बल्कि इस सरकार स्वयं डीजल, पेट्रोल, कृषि उर्वरकों और अन्य उपभोक्ता सामग्रियों के दाम बढ़ाकर जन सामान्य के संकट बढ़ाने में लगी हुई है। इसके लिए आंकड़े या प्रमाण देने की जरूरत नहीं, आम आदमी इसे बल्कि झेल रहा है। रेहड़ी-पटरी के व्यापारी से लेकर किराने के दुकानदार सभी आम आदमी की मजबूरी का फायदा उठाने के लिए कोर कसर नहीं छोड़ रहा। उन पर शासन का कोई अंकुश नहीं है।

दुनियाभर में आर्थिक संकट के बाद अथवा उससे जुड़ा सबसे बड़ा संकट नई पीढ़ी अर्थात छात्र-युवाओं के भविष्य का संकट कोरोना महामारी की सबसे बड़ी चुनौती है। दुनिया के विकसित ही नहीं एशिया और अफ्रीका के कई विकासशील देशों ने भी इस समस्या के दूरगामी प्रभावों को कम करने के लिए काम शुरू कर दिया है। लेकिन भारत में अभी तक मसला ऑनलाइन क्लासों और परीक्षाओं से आगे नहीं बढ़ पाया है। देश के प्रतिष्ठित श्विविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों में चिंता ऑनलाइन क्लासों की व्यावहारिकता और परीक्षाओं तक सीमित है।

अक्सर कहा जाता है कि भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। देश में 15 वर्ष से लेकर 35 वर्ष तक के युवाओं की आबादी लगभग 50 करोड़ है, जिसमें से 15 से 25 वर्ष के लोगों की आबादी करीब 25 करोड़ है।  इसी आबादी पर देश का भविष्य टिका हुआ है। आमतौर पर 15-25 वर्ष की उम्र में व्यक्ति अपनी शिक्षा और कैरियर को लेकर सर्वाधिक सजग रहता है। लेकिन कोरोना संकट और उसका सामना करने में शासन की अदूरदर्शितापूर्ण नीतियों के कारण उसका और वर्तमान और भविष्य दोनों ही दांव में लगे हैं। जाने-अनजाने में एक पूरी पीढ़ी को अंधकारपूर्ण भविष्य की और धकेला जा रहा है।

पहले, स्कूली बच्चों की बात करें। देश में 24 मार्च, 2020 को लागू देशव्यापी लॉकडाउन के बाद से ही स्कूली पढ़ाई ऑनलाइन चल रही है। सेंट्रल बोर्ड सहित कई राज्य शिक्षा शिक्षा बोर्डों ने आधी-अधूरी या बिना परीक्षाओं ने छात्रों को पास घोषित कर दिया। तत्पश्चात नए एडमिशन भी अधिकतर ऑनलाइन ही कराए गए। कुछ समय के लिए शिक्षण संस्थानों को खोला जरूर गया लेकिन उस दौरान प्राइवेट स्कूलों ने केवल फीस वसूलने का काम किया। शिक्षा जगत के ही कई लोगों ने इसे सरकार द्वारा प्राइवेट को फीस वसूलने की छूट कहकर प्रचारित किया, जो सच भी है। इधर कोविड-19 की दूसरी लहर में फिर से स्कूल बंद कर दिए गए और ऑनलाइन पढ़ाई का दावा किया गया है।

ऑनलाइन पढ़ाई की हकीकत का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि देश के ग्रामीण क्षेत्रों में मात्र 15 प्रतिशत लोगों की ही इंटरनेट तक पहूंच है। 42 प्रतिशत लोग के पास ऑनलाइन पढ़ाई के लिए कंप्यूटर, लेपटॉप और स्मार्टफोन खरीदने और इंटरनेट का व्ययभार उठाने में असमर्थ है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों के जो छात्र मजदूरी से ऊपर उठ कर बेहतर जीवनयापन का कैरियर अपनाना चाहते हैं वे आर्थिक सामाजिक असमानता को लेकर दुःखी है। शहरी क्षेत्रों की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है। भारी संख्या में शहरी क्षेत्रों के छात्र, जिनके परिजन दिहाड़ी या असंगठित क्षेत्र में काम करके अथवा छोटा-मोटा व्यापार करके परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं, वे भी ऑनलाइन पढ़ाई का भार उठा पाने में असमर्थ है। परिवार की माली आर्थिक स्थिति के कारण स्मार्टफोन या कंप्यूटर न खरीद पाने से परीक्षा में फेल हो जाने के कारण कई राज्यों 10वीं और 12वीं के छात्रों द्वारा आत्महत्या की खबरें पिछले दिनों अखबारों की सुर्खियां बनी थीं।  

उच्च शिक्षा स्तर तक पहुंचते-पहुंचते पास होने और अच्छे मार्क्स लाने की समस्या में व्यावसायिक प्रशिक्षण, कोचिंग और रोजगार हासिल करने की चुनौती भी जुड़ जाती है। आमतौर पर 12वीं से आगे की पढ़ाई मुख्यतः वे छात्र की कर पाते हैं जिनकी पारिवारिक आर्थिक स्थिति बेहतर होती है। इधर लॉकडाउन के उच्च शिक्षा भी ऑनलाइन ही चल रही है। ग्रेट ब्रिटेन, कनाडा और अमेरिका जैसे देशों में भी अध्ययन के दौरान यह पाया गया है कि उच्च शिक्षण संस्थानों के औसत 60 प्रतिशत छात्र ऑनलाइन पढ़ाई में खुद को असहज पाते हैं। भारत मे ंतो ऑनलाइन पढ़ाने वाले शिक्षक तक भारी संख्या में इंटरनेट की अत्याधुनिक तकनीक से अपरिचित हैं। ऐसे में उच्च शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे छात्र-युवा पढ़ाई की गुणवत्ता को लेकर आशंकित हैं। रोजगार के अवसरों की सीमितता और बेरोजगारी की बढ़ती समस्या इस परेशानी को और बढ़ा देती हैं।

कोरोना संकट से पहले ही देश में बेरोजगारी एक बड़ी चुनौती बन गई थी। सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण, शासकीय पदों पर  ठेके पर नियुक्ति और प्राइवेट कंपनियों द्वारा छटनी से रोजगार को लेकर अत्यधिक बढ़ गई थी। कोरोना संकट ने इसे और भी गहरा दिया है। देश में ही नहीं विदेशों में भी रोजगार के अवसरों में कमी आई है। उच्च शिक्षा अथवा व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त कर विभिन्न क्षेत्रों में नोकरी के लिए विदेश जाने वाले युवाओं के रास्ते भी बंद होते नजर आ रहे हैं। एक अमेरिकी कंपनी द्वारा किए गए अध्ययन के मुताबिक कोरोना संकट के कारण वैश्विक स्तर पर विदेशों में रोजगार की संभावना 80 प्रतिशत तक कम हो सकती है। 

भारत में सेंटर फॉर मौनिटरिंग औफ इंडियन इकोनॉमी के अनुसार ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों में भारी गिरावट आई है। पहले कोरोना संकट से पहले ग्रामीण बेरोजगारी 7.5 प्रतिशत और शहरी बेरोजगारी 14 प्रतिशत के आसपास थी वह अब शहरी और ग्रामीण दोनों ही स्तरों पर 14 प्रतिशत हो गई है। इसमें और गिरावट का अंदेशा है। देश की राजधानी दिल्ली, जिसके बारे में अक्सर कहा जाता था कि यहां हर आयुवर्ग के और हर स्तर की योग्यता रखने वाले लोगों के लिए रोजगार है। आज दिल्ली में बेरोजगारी बड़ी चुनौती बनी हुई है। दिल्ली में बेरोजगारी का औसत मार्च, 2020 में 6.6 प्रतिशत थी, वह मार्च, 2021 में 9.4 प्रतिशत, अप्रैल, 2021 में 27 प्रतिशत हो गई। इस महीने यानी मई, 2021 में इसके 35 प्रतिशत तक पहुंचने की अनुमान है।

कोरोना संकट में शिक्षा और रोजगार को लेकर छात्र-युवाओं की इस समस्या ने उन्हें मनोरोगी बनाना शुरू कर दिया है। मुझे नहीं पता कि यूरोपीय देशों की तरह भारत में छात्र-युवाओं वर कोरोना के मनावैज्ञानिक और सामाजिक व्यवहार प्रभाव पर कोई अध्ययन हुआ है या हो रहा है। लेकिन व्यवहार में समाज के हर तबके में इसका जो प्रभाव दिखाई दे रहा है, वह अत्यंत चिंताजनक नहीं है। सामान्य मध्यम वर्गीय परिवारों से लेकर साधन संपन्न और सुशिक्षित परिवारों तक के छात्र युवा आज शिक्षा और कैरियर की चुनौतिपूर्ण स्थितियों के कारण कई तरह की समस्याओं से जूझ रहे हैं। मां-बाप परेशान है कि बच्चे पढ़ाई नही ंकर रहे या अपने कैरियर को लेकर उदासीन हैं और बच्चों की समझ में कुछ नहीं आ रहा। 

स्कूल-कालेज बंद हैं, खेलने और मित्रों के साथ घूमने-फिरने या पढ़ाई व कैरियर की चर्चा की स्थितियां भी नहीं हैं। घर में बैठे-बैठे करें भी तो क्या करें। पढ़ाई कैसे होगी और आगे की तैयारी कैसे करें, रोजगार कहां मिलेगा जैसे सवाल हमेशा जेहन में रहते हैं। मन बहलाने के लिए इंटरनेट पर मूवी या कोई अन्य प्रोग्राम भी कब तक देखें? इन तमाम समस्याओं के कारण उनकी दिनचर्या और उनके व्यवहार में बड़ा बदलाव आया है। उनमें चिड़चिड़ापन, परिजनों की अवज्ञा, किसी भी काम को लेकर अनिच्छा, बात-बात पर उत्तेजित हो जाना, चिंताग्रस्तता और अवसाद की स्थितियां उनके ही नहीं पूरे देश और समाज के अनिश्चिततापूर्ण भविष्य को रेखांकित करती हैं। 

कोरोना संकट से जुड़ी ये समस्याएं भारत ही नहीं पूरी दुनिया की है। लेकिन अधिकतर देशों ने इस आर्थिक संकट से ज्यादा महत्व देते हुए इससे बचाव के कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। भारत में जहां सरकार ने शिक्षा और रोजगार को प्राइवेट सेक्टर की दया पर छोड़ दिया है वहीं उनके लिए प्रोपर गाइडलाइन का न होना भी चिंता का विषय है। ग्रेट ब्रिटेन में ऑनलाइन पढ़ाई और व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए छात्रों को विशेष इंसेंटिव देने की योजना लागू की गई है तो कनाडा में सरकार ने व्यासायिक प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे छात्रों को कारोगर शुरू करने के लिए व्यक्तिगत और सामूहिक रूप में आर्थिक सहायता/अनुदान की घोषणा की है। जर्मनी में प्रोजेक्ट आधारित अनुसंधान के लिए शिक्षण संस्थानों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसी तरह दुनिया के कई देशों में छात्र-युवाओं के वर्तमान और भविष्य को सुरक्षित करने पर काम हो रहा है। दुनिया के तमाम देशों देशों में छात्र-युवाओं के भविष्य को लेकर जो काम हो रहे हैं, वे भारत में क्यों नहीं हो सकते? क्या भारत में संसाधनों की कमी है या भारतीय लोग बौद्धिक रूप में पिछड़े हैं? यदि ऐसा है तो क्यों हमारे नेता देश को आर्थिक महाशक्ति बनाने और विश्वगुरु बनाने के बड़े-बड़े दावे करते हैं? 

इन सवालों पर हर उस भारतीय को सोचना चाहिए, जो अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित है।


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