कोरोना संकट: सत्ता और संसाधनों का विकेंद्रीकरण है एकमात्र विकल्प

कोरोना महामारी हम सभी के लिए अस्तित्व संकट का सबब बनकर आई है। देश में बीते एक महीने से रोजाना 3 लाख से अधिक संक्रमण के नए मामले सामने आ रहे हैं और रोजना 3 हजार से अधिक लोगों की इससे मौत हो रही है। ये सरकारी आंकड़े हैं। वास्तवकिता में यह संख्या और भी अधिक होने का अनुमान है। शहर हो या देहात, हम में से कोई नहीं जानता कि कौन और कब इस बीमारी की चपेट में आ जाएगा। सभी मौत के साए में जी रहे हैं।

अस्तित्व संकट की चुनौती का यह सवाल, कोरोना संकट के मुकाबले हमारी कमजोर स्वास्थ्य सेवाओं के साथ-साथ आजीविका अर्थात रोजगार की अनिश्चितता के कारण भी पैदा हुआ है। कोविड-19 की पहली लहर मंे देशव्यापी लॉकडाउन के समान ही दूरी लहर में टुकड़ों में लागू लॉकडाउन से भी करोड़ों लोगों को आंशिक अथवा पूर्ण बेरोजगारी का सामना करना पड़ रहा है। 

जानकारों के मुताबिक देश की 135 करोड़ आबादी में से 50 करोड़ लोग काम करते हैं। इसमें कूड़ा बीनकर रोटी कमाने वालों से लेकर सर्वोच्च पदों पर आसीन सभी व्यक्ति शामिल हैं। इस श्रमशक्ति में सरकारी-अर्द्धसरकारी संस्थानों, सेना व सशस्त्र बलों, बड़े कॉर्पोरेट हाउसों में काम करने वाले और पेंशनरों की संख्या पांच करोड़ से कम है, जिनकी आजीविका कोरोना संकट में भी सुरक्षित है। 

बाकी 45 करोड़ में से 14 करोड़ किसान परिवार कृषि (पशुपालन और बागवानी सहित) पर निर्भर हैं। कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे किसान आंदोलन के चलते सरकार ने किया है कि देश में करीब 84 प्रतिशत किसानों के पास 2 हेक्टेयर से भी कम जमीन है। करीब 16 प्रतिशत यानी 1.24 करोड़ किसान परिवार ही पूर्णतः कृषि पर निर्भर हैं। वे भी कोरोना संकट के तात्कालिक आर्थिक प्रभावों का सामना करने में समर्थ हैं। बाकी करीब 43.76 करोड़ लोग, जो असंठित क्षेत्र के कर्मचार/मजदूर, छोटे व्यवसायी, रेहड़ी-पटरी के कारोबार और वेंडर्स हैं कोरोना संकट से बुरी तरह प्रभावित हैं। उनके समक्ष स्वास्थ्य सुविधाओं से ज्यादा अपने परिवार का भरण-पोषण की चुनौती है। बीते एक माह में मरने वाले लोगों की भी बड़ी तादाद रही है।

जाहिर सी बात है, इतनी बड़ी आबादी की आजीविका संकट का असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ना तय है। जब लोगों के पास पैसा ही नहीं होगा तो बाजार कैसे चलेंगे और फक्ट्रियों में उत्पादन कैसे होगा और अंततः टैक्सों से होने वाली सरकार की आय भी रुक जाएगी। आगे चलकर इसका असर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, संचार व्यवस्था और तमाम कल्याणकारी योजनाओं पर पड़ेगा। 

चूंकि, इस बार पहली लहर की तरह देशव्यापी लॉकडाउन के बजाय सरकार ने टुकड़ों में लॉकडाउन लगाया है और इसकी जवाबदेही भी राज्य सरकारों में छोड़ दी है, इससे बेरोजगारी की समस्या पिछले बार की तरह विस्फोटक रूप में सामने नहीं आई है। अन्यथा रोजी-रोटी और आजीविका की समस्या पिछली बार की अपेक्षा इस बार अधिक चिंताजनक है। पिछली बार सरकार ने कई राहत पैकेजों की घोघणा की थी और व्यवसायी वर्ग ने भी लोगों को संकट से बाहर निकालने में काफी यहयोग किया था। लेकिन इस बार न तो सरकार और न ही व्यापारी आगे आए हैं। 

समाधान क्या है?

कोरोना संकट की शुरूआत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘आत्मनिर्भर भारत’’ योजना का ऐलान कर संदेश दिया था कि कोरोना के कारण पैदा आर्थिक संकट का सामना करने के लिए देश के नागरिकों का आत्मनिर्भर होना जरूरी है। लेकिन उस आत्मनिर्भरता के पीछे भी सरकार अथवा वित्तीय संस्थानों से ऋण लेकर अपना कारोबार करने का प्रलोभन ही अधिक था। इस कारण देश के प्रशिक्ष्ति और साधन संपन्न परिवेश के लोग तो इसमें आगे आए लेकिन साधनहीन और कम पढ़े-लिखे ग्रामीण उससे अपना कोई संबंध नहीं बना पाए। जबकि इस समस्या का मुकाबला ऊपर से नहीं निचले स्तर से ही हो सकता है और इसके लिए जरूरी है सत्ता और संसाधनों का विकेंद्रीकरण।

अर्थात पंचायती राज संस्थाओं को उनके संविधान सम्मत विधायी और वित्तीय अधिकार प्रदानकर न केवल आर्थिक संकट का सामना किया जा सकता है, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्तकर जन सामान्य को बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं और उन्हें किसी भी महामारी अथवा आपदा के समय पर राहत और बचाव कार्यों के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। केरल और तमिलनाडु इसके प्रेरणादायक उदाहरण हैं, जहां पंचायती राज संस्थाओं को स्वायत्तता प्राप्त होने के कारण ही वे कोरोना के प्रभाव को सीमित रखने में समर्थ हो पाए हैं और वहां की अर्थव्यवस्था पर भी इसका प्रभाव कम पड़ा है।

पंचायतों को विधायी और वित्तीय स्वायत्तता प्राप्त होने से लोग सामूहिक रूप से (पंचायतों के जरिए) अपनी समस्याओं के समाधान और अपने संसाधनों के उपयोग की योजना बना सकते हैं। कृषि, पशुपालन और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों पर आधारित व्यवसाय कर सकते हैं। इससे गांवों में रोजगार के अवसर तो बढ़ेंगे ही लोगों की आमदनी बढ़ने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था, प्रकारांतर में देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। 

ऐसा नहीं है कि ग्रामीण क्षेत्रों के लोग गांव में रहकर ही अपना व्यवसाय करके आजीविका कमाना नहीं चाहते हैं। इसके लिए वर्षों से चली आ रही स्वरोजगार योजना के तहत भारी संख्या में लोग अपना व्यवसाय भी शुरू करते हैं। इधर राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार मिशन के तहत भी लोगों को स्वरोजगार के लिए प्रेरित किया जा रहा है। लेकिन स्वरोजगार की व्यावसायिक समझ न होने और संसाधनों पर जनता का अधिकार न होने से इस तरह की तमाम योजनाओं के अंतर्गत वे स्वरोजगार के नाम पर बड़े व्यावसायिक घरानों के एजेंट या देसी-विदेशी कंपनियों के उत्पादों के मैकेनिक बनकर रह जाते हैं। उन्हें सिर्फ बिकने वाले माल की कमीशन या उनकी दक्षता व मेहनत का मेहनाता ही मिल पाता है असली मुनाफा तो वे कंपनियां कमाती हैं जिनका वे माल बेचते हैं या जिनके सामान की रिपेयरिंग का काम करते हैं। स्वरोजगार के इस सोच को तभी बदला जा सकता है जब कि लोग अपने संसाधनों पर आधारित व्यवसाय करें। इसके लिए पंचायतों को विधायी और वित्तीय अधिकार मिलना अति आवश्यक है।  

फोटो: कोविड-19 की दूसरी लहर शुरू होने के बाद 19 अप्रैल, 2021 को दिल्ली के आनंद विहार बस अड्डे पर प्रवासी श्रमिकों की भीड़। 


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