उत्तराखंड, ऐतिहासिक रूप में देश के उन क्षेत्रों में रहा है जहां सशक्त स्थानीय स्वशासन व्यवस्था थी। 1815 में इस क्षेत्र में अंग्रेजी शासन स्थापित होने से पहले स्थानीय स्वशासन इकाईयों को सभी विधायी और वित्तीय अधिकार तो प्राप्त थे और आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था भी उन्हीं के नियंत्रण में थी। इसी कारण उत्तराखंड सीमित भौतिक संसाधनों के बावजूद आत्मनिर्भर बना रहा और आपराधिक गतिविधियां भी नहीं होती थीं। आज भी, जौनसार भावर के आरक्षित क्षेत्रों में इसकी झलक देखने को मिलती है। लेकिन आज उत्तराखंड में पंचायतें राज्य और केंद्र सरकारों के हाथों की कठपुतली और पंचायती राज व्यवस्था आडंबर बनकर रह गई है।
हाल ही में, उत्तराखंड सरकार ने 15वें वित्त आयोग द्वारा राज्य में पंचायती राज संस्थाओं के लिए स्वीकृत करीब 90 करोड़ रुपए पंचायतों को हस्तांतरित किए जाने की घोषणा की है। इसका समाचार माध्यमों और सोशल मीडिया से जमकर प्रचार किया गया था। इससे पूर्व जब केंद्रीय वित्त आयोग ने यह धनराशि राज्य को हस्तांतरित की गई थी तब भी, यह खबर समाचार पत्रों की सुर्खियों में थी।
उत्तराखंड सरकार द्वारा जारी सूचना के मुताबिक उक्त धनराशि में से ग्राम पंचायतों को 27.20 करोड़, क्षेत्र पंखयतों को 20.40 करोड़ और जिला पंचायतों को 42.64 करोड़ रुपए हस्तांतरित कर दिए गए है। इसमें दो बातें कचोटने वाली हैं। अव्वल तो पंचायतों को धन का आवंटन राज्य सरकार के ही तय फार्मुले के विरुद्ध है, जिसमें कहा गया है कि राज्य और केंद्र द्वारा पंचायतों को दिए जाने वाले अनुदान का 70 प्रतिशत सीधे ग्राम पंचायतों को और 30 प्रतिशत क्षेत्र और जिला पंचायतों को दिया जाएगा। दूसरी बात, पंचायतों को हस्तांतरित धनराशि इतनी कम है कि उससे पंचायतों का कोई भला होने वाला नहीं है।
ब्लॉक और जिला पंचायतों की बात करना बेईमानी है, वहां धन के पंचायत के सदस्यों को धन के आवंटन का कोई तय फार्मुला नहीं है। चुनाव के समय ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में सदस्यों की जमकर खरीद-फरोक्त की असली वजह भी यही है। रही बात ग्राम पंचायतों की तो (भारत सरकार की वर्ष 2020 की स्थानीय शासन निर्देशिका के अनुसार) राज्य में कुल 7,791 ग्राम पंचायतें हैं। राज्य की 69.45 प्रतिशत ग्रामीण आबादी मे प्रति ग्राम पंचायत औसत आबादी 902 बैठती है। इस हिसाब से ग्राम पंचायतों को हस्तांतरित 27.20 करोड़ प्रत्येक ग्राम सभा के हिस्से में 34,912 रुपए आते हैं। चूंकि राज्य में पंचायतों के आकार में काफी असमानता है। न्यूनतम 500 की आबादी में एक ग्राम पंचायत का विधान है और मैदानी क्षेत्रों में कई ग्राम पंचायतों की आबादी 10 हजार से भी अधिक है। राज्य के पर्वतीय क्षेत्र में करीब 70 प्रतिशत ग्राम पंचायतों की आबादी औसत से भी कम है, उन्हें इस धनराशि में से 35 हजार से भी कम रुपए ही मिल पाएंगे। इसमें से भी 10 प्रतिशत कंटीजेंसी में यानी पंचायत के प्रशासनिक और आकस्मिक व्यय में खर्च हो जाएंगे तो बाकी से वे ग्राम सभा में क्या काम कर पाएंगे, समझा जा सकता है।ं
राज्य सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस धनराशि का उपयोग पंचायतें पंचायत क्षेत्र में साफ-सफाई, पेयजल, बिजली और सामुदायिक भवन और वर्तमान कोरोना संकट के दौर में कोरोना के संक्रमण की रोकथाम पर खर्च कर सकेंगी। राज्य में पंचायतों को कोई वित्तीय और विधायी शक्ति हस्तातंरित न होने से यह स्थिति और भी चिंताजनक हो जाती है।
राज्य के सभी भौतिक संसाधनों पर राज्य और केंद्र सरकार के विभागों का कब्जा है। राज्य में वर्षभर कई स्थानों पर छोटे-बड़े मेलों का आयोजन होता है, जिनमें से कुछ राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय महत्व के भी हैं वे भी राज्य प्रशासनिक के नियंत्रण में हैं। काूननन स्थानीय भौतिक संसाधनों पर और मेले व अन्य धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों का अधिकार पंचायतों को दिया जाना चाहिए। बंगाल, केरल, कर्नाटक अािद राज्यों में जहां यह व्यवस्था है, वहां पंचायतें काफी सुदृढ़ हैं।
यही नहीं, राज्य में पंचायतों को विधायी शक्तियां भी अब तक हस्तातंरित नहीं हुई हैं। कहने को तो ग्राम पंचायत विकास योजना (जीपीडीपी) के तहत ग्राम पंचायतें स्वयं योजनाएं बना कर उन पर अमल कर सकती हैं, लेकिन स्वीकृति उन्हीं योजनाओं को मिलती है जो राज्य अथवा केंद्र सरकार की प्राथमिकता में होती है, इसके लिए ग्राम पंचायतों को गाइडलाइन जारी कर दी जाती है। इस कारण, पंचायती राज विभाग के अधिकारी/कर्मचारी विकास विभाग के मातहत के रूप में कार्य करने को विवश रहते हैं।
दूसरी ओर, ग्राम पंचायतों पर राज्य सरकार द्वारा इतना अधिक काम थोप दिया गया है कि पंचायत कर्मी ही नहीं प्रतिनिधि भी उसी में उलझ कर रह जाते हैं। ग्राम पंचायत स्तर पर एकमात्र ग्राम पंचायत विकास अधिकारी (पंचायत सचिव या मंत्री) पंचायती राज विभाग का एकमात्र अधिकारी/कर्मचारी होता है, उसके पास भी औसत 10 पंचायतों को (मैदानी क्षेत्रों में पांच) का दायित्व है। कहीं-कहीं तो एक ग्राम पंचायत सचिव के पास 18 ग्राम पंचायतों का दायित्व है। इस पर भी उन्हें वे काम भी करने होते हैं, जो पंचायती राज के तहत नहीं आते।
ग्राम पंचायतों पर कार्यों के दबाव का अनुमान मौजूदा कोरोना संकट के दौरान सोंपे गए दायित्वों से लगाया जा सकता है। राज्य सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोना संक्रमण से बचाव, संस्थागत और होम आइसोलेशन की मॉनिटरिंग, क्वारंटीन सेंटरों की व्यवस्था और संक्रमित लोगों के रिकॉर्ड रखने की जिम्मेदारी ग्राम पंचायतों को सोंपी है। इसके लिए वे केंद्रीय और राज्य वित्त आयोगों से प्राप्त धनराशि का 20 प्रतिशत (अथवा अधिकतम 20 हजार रुपए) व्यय कर सकते हैं। एक साल पहले यह धनराशि 10 हजार रुपए तय थी। लेकिन राज्य के लगभग सभी जिलों से कई ग्राम प्रधानों की शिकायत है कि अभी तक उन्हें इस मद में एक भी रुपया नहीं मिला है। राज्य सरकार ने 15वें वित्त आयोग की जो रकम ग्राम पंचायतों को हस्तांतरित किए जाने का प्रचार किया, वह भी अभी तक उनके खातें में स्थानांतरित नहीं हुई है। अधिकतर ग्राम पंधानों ने सरकारी आदेश पर कोरोना से बचाव और अन्य कार्यों पर अपनी जेब से खर्चा किया है और अभी भी कर रहे हैं, इसी उम्मीद में कि केंद्रीय और प्रांतीय अनुदान से मिलने वाली रकम में उसे एडजस्ट कर लेंगे। स्पष्ट है कि 15वें वित्त आयोग की पहली किस्त में मिली रकम से कोरोना संबंधी काम भी पूरे नहीं हो सकते। ऐसे मेें राज्य सरकार पंचायतों को हस्तांतरित धनराशि का प्रचार का असल मकसद क्या हो सकता?
वीडिओ: यह वीडिओ देहरादून जिले के कालसी विकास खंड की केटारी ग्राम पंचायत की प्रधान श्रीमती प्रमिला चौहान ने भेजा है। वह अपने सहयोगियों के साथ पंचायत क्षेत्र में कोरोना संक्रमण से बचाव और ग्रामीणों को जागरूक कर रही हैं। ज्ञात हो केटारी जौनसार भावर क्षेत्र के अंतर्गत और कालसी से निकट स्थित है, जहां सदियों से सुदृढ़ पंचायत व्यवस्था रही है। कालसी में सम्राट अशोक की स्तूप इस बात का जीवंत प्रमाण है।
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