स्वामित्व योजना: नौ दिन चले अढ़ाई कोस



कोरोना संकट का एक वर्ष और पंचायती राज संस्थाएं (4) 

कोरोना संकट शुरू होने के बाद भारत सरकार द्वारा आरंभ ‘स्वामित्व योजना’ घोषित तौर पर पंचायत सशक्तीकरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण निर्णय है, जिसमें गांवों के रिहायसी क्षेत्रों सहित कृषि भूमि, जंगल व गोचर और अन्य प्राकृतिक संसाधनों का ड्रोन द्वारा वीडियाग्राफी एवं फोटोग्राफी और धरातलीय सर्वेक्षण से डिजीटल मैंपिंग किया जाना तय है। मैपिंग का कार्य सर्वे ऑफ इंडिया को सौंपा गया और पंचायती राज और राजस्व विभागों को भू-अभिलेख उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी सौंपी गया। 

केंद्रीय पंचायती राज मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने स्वामित्व योजना के दिशा-निर्देश जारी करते कहा था कि इस योजना का लक्ष्य ग्रामीण लोगों को उनकी आवासीय संपत्तियों के दस्तावेज के साथ अधिकार प्रदान करना है ताकि वे आर्थिक प्रयोजनों के लिए अपनी संपति का इस्तेमाल कर सकें। योजना से ग्रामीण क्षेत्रों में नियोजन व राजस्व संग्रह को सुचारू बनाने और संपदा अधिकारों पर स्पष्टता सुनिश्चित करने में मिलेगी मदद संपत्ति संबंधी विवादों के समाधान में भी सहायता मिलेगी।

इसके तुरंत बाद 24 अप्रैल, 2020 को ‘राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस’ के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वामित्व योजना की शुरूआत करते हुए इस योजना को:आत्मनिर्भर भारत’ से जोड़ते हुए कहा कि इस योजना के अतर्गत प्रत्येक ग्रामीण को स्वामित्व कार्ड प्रदान किया जाएगा, जिसके आधार पर शहरी क्षेत्रों के समान ही ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोग कृषि, पशुपालन और अन्य कामों के लिए बैंको से ऋण ले सकेंगे।     

स्वामित्व योजना सात राज्यों - उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र कर्नाटक, उत्तराखंड आंध्र प्रदेश और हरियाणा समेत दो राज्यों - पंजाब एवं राजस्थान के सीमावर्ती पंचायतों में प्रायोगिक तौर शुरू किया गया है। कहा गया था कि वित्तीय 2020-21 की समाप्ति तक उक्त राज्यों के एक लाख गांवों में स्वामित्व योजना का कार्य पूरा कर लिया जाएगा और वर्ष 2024 तक देश के सभी 6,55,959 गांवों की डिजीटल मैपिंग का काम पूरा कर ग्रामीणों को ‘सपत्ति अथवा कार्ड’ उपलब्ध करा दिए जाएंगे। लेकिन योजना आरंभ होने के एक साल बाद भी न केवल जन सामान्य को बल्कि पंचायती राज संस्थाओं के निर्वाचित प्रतिनिधि और पंचायतकर्मी को भी इस योजना जानकारी नहीं हो पाई है। 

स्वामित्व योजना से जुड़ी ये सभी घोषणाएं और दावे उस दौर में किए गए जब लॉकडाउन से शहरों में कामकाज ठप्प हो जाने से करोड़ों लोग अपने गांव लौट रहे थे। उनके पास आजीविका का कोई जरिया नहीं था। कुछ लोग मनरेगा के तहत काम करने को तैयार थे लेकिन सभी मनरेगा जैसी न्यूनतम मजदूरी वाली स्कीम पर काम करने को तैयार थे और न ही सभी को मनरेगा काम मिल सकता था। स्वामित्व योजना की घोषणाओं से लगा था कि शहरों से लौटे प्रवासी गांव में रहकर कृषि, प्शुपालन और हस्तशिल्प संबंधी व्यवसाय के लिए बैंको से ऋण लेकर निजी व्यवसाय शुरू कर ाकेंगे। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसरी पैदा होंगे। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड आदि राज्यों में उत्साही युवाओं ने गांवों में छोटे स्तर पर फूड व फ्रुट प्रासेसिंग, डेयरी, फर्नीचर उद्योग, कृषि उपकरण निर्माण अािद काम की योजनाएं तक बना डालीं। लेकिन इस योजना का हश्र भी लगभग वही हुआ जो इससे पूर्व मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया जैसी योजनाओं का हुआ है। 

वित्तीय वर्ष 2020-21 में स्वामित्व योजना के पहले चरण के काम के लिए 79.65 करोड़ रुपए स्वीकृत करने की बात कही गई थी। जनवरी 2021 में सरकार ने दावा किया कि योजना के पहले चरण में चयनित राज्यों के 23,300 गांवों में ड्रोन सर्वेक्षण का काम पूरा कर लिया गया और 1,432 गांवों के संपत्ति धारकों को ‘संपत्ति कार्ड’ दे दिए गए है। जबकि उसी दौरान यह भी कहा गया कि सर्वे ऑफ इंडिया को ड्रोन सर्वेक्षण के लिए ड्रोन कैमरे खरीदने के लिए 200 करोड़ रुपए आबंटित करने का प्रावधान किया गया है। इससे सर्वे ऑफ इंडिया 16 राज्यों के 2.50 लाख गांवों में डिज्ीटल सर्वे के लिए 500 ड्रोन टीमों का गठन करेगा।  

सरकार के इन तमाम दावों पर जमीनी स्तर पर कितना काम हुआ है ये बात पंचायती राज और राजस्व विभागों के उन अधिकारियों से छिपी नहीं है, जिन्हें यह काम सौंपा गया है। लेकिन इस बीच स्वामित्व योजना के नाम पर बजटीय प्रावधान निरंतर बढ़ता गया है। ऊपरी स्तर पर अधिकारियों की नजर उस बजट को ठिकाने लगाने पर है। स्कीम से जुड़े अधिकारियों का जोर इस बात पर रहा कि कैसे इस योजना के लिए स्वीकृत धन को ठिकाने लगाया जाए। स्वामित्व योजना के लिए ड्रोन की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए देश में ड्रोन मैनुफैक्चरिंग को बढ़ावा दिए जाने से लेकर विभिन्न कंपनियों से ड्रोन लेने की चर्चा सुर्खियों में रही। 

साथ ही, यह भी कहा गया कि 2022 तक स्वामित्व योजना से पूरे देश में कोर नेटवर्क कवरेज सुनिश्चित कर लिया जाएगा। एक बार कोर नेटवर्क स्थापित होने के बाद, कोई भी विभाग या राज्य एजेंसी इसका लाभ उठा सकेंगी। राजस्व, पंचायती राज, सार्वजनिक निर्माण, ग्रामीण विकास, कृषि, सिंचाई, शिक्षा, बिजली, स्वास्थ्य आदि सभी विभाग जीआईएस (भौगोलिक सूचना प्रणाली) आधारित एप्लीकेशन का उपयोग कर योजना निर्माण और उनके कार्यान्वयन के लिए इसका इस्तेमाल कर सकेंगे। इस पूरी कसरत से ग्रामीणों के जीवन में कितना सकारात्मक बदलाव आएगा अथवा पंचायतों को अपने क्षेत्राधिकार के अंतर्गत उपलब्ध संसाधनों के आधार पर ग्राम समाज के विकास के लिए योजनाएं बनाने का कितना मौका मिलेगा, यह न तो सरकार की प्राथमिकता में है और न ही योजनाएं बनाने और उन्हें कार्यान्वित करने वाले अफसरों की प्राथमिकता में। 


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