कोरोना संकट का एक वर्ष और पंचायती राज संस्थाएं (3)

प्रवासी श्रमिकों का शहरों से गांवों को पलायन कोरोना काल की सबसे दर्दनाक तश्वीर है। लॉकडाउन से शहरों में कल-कारखाने, बाजार, निर्माण कार्य, रेहड़ी-पटरी व फटकर व्यापार और अन्य कामकाज बंद होने से जब श्रमिकों के पास आजीविका का कोई जरिया नहीं रहा तो उन्होंने अपने गांव लौटने में ही भलाई समझी। इसके लिए उन्हें कितनी मुश्किलों और जलालतों से गुजरना पड़ा, यह 68 दिनों के लॉकडाउन के दौरान पूरे देश ने देखा। लेकिन उनके समक्ष सबसे बड़ा सवाल यही था कि गांव लौटकर वे क्या करेंगे, कैसे अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण करेंगे? गांव में रोजगार का जरिया होता तो वे शहर जाते ही क्यों? 

गांव में मनरेगा एकमात्र ऐसा जरिया है, जिससे वे अपनी तात्कालिक जरूरतें पूरी कर सकते थे। मनरेगा मांग आधारित योजना होने के साथ-साथ उसमें एक निश्चित समय (15 दिन) के अंदर भुगतान की की व्यवस्था है। इसमें सामूहिक योजनाओं के साथ-साथ व्यक्तिगत योजनाओं के लिए भी काम और आर्थिक सहायता जरूरतमंद लोगों को मिलती है। प्रवासियों को उम्मीद थी कि इससे वे अपनी तात्कालिक जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ कृषि, पशुपालन, बागवानी के कार्य कर सकेंगे। लिहाजा गांव लौटे प्रवासियों में अधिकतर ने मनरेगा के तहत काम करने के लिए पंजीकरण कराना शुरू किया। परिवार के जॉबकोर्ड में अपना नाम दर्ज कराया अथवा नए जॉबकार्ड बनवाए।  

मनरेगा बजट और मजदूरी में वृद्धि 

मनरेगा पर ग्रामीणों की निर्भरता और प्रवासियों की उम्मीदों को ध्यान में रखते हुए सरकार ने मनरेगा बजट में वृद्धि करने की घोषणा कर  दी। वित्तीय वर्ष 2020-21 के बजट में मनरेगा के लिए 61,500 करोड़ रुपए का प्रावधान किया था, जो कि उससे पहले वर्ष की तुलना में करीब 13 फीसद कम था। लॉकडाउन के बाद सरकार ने इसमें 40,000 करोड़ रुपए बढ़ाकर 1,00,500 करोड़ रुपए कर दिया। साथ ही मनरेगा की मजदूरी भी 182 रुपए से बढ़ाकर 202 रुपए रोजना कर दी गई। यह घोषणा करते हुए वित्त मंत्री मनरेगा के तहत कुल 300 करोड़ मानव दिवस काम के पैदा किए जा सकेंगे। 

मनरेगा बजट और मजदूरी में वृद्धि करने की इस घोषणा के साथ ही पंचायतों को निर्देश दिया गया कि वे प्रवासियों को रोजगार उपलब्ध कराने में किसी तरह की कोताही न बरतें। इससे पंजीकृत मनरेगा श्रमिकों की संख्या में अचानक वृद्धि हो गई। भारी संख्या में लोगों ने व्यक्तिगत योजनाओं के अंतर्गत मेड़बंदी, बकरीबाड़ा, गौशाला, हॉज व तालाब निर्माण आदि के लिए आवेदन किए। अधिकतर प्रवासियों ने आगे शहर लौटने के बजाय गांव में रह कर ही खेती-किसानी और पशुपालन करने का निर्णय ले लिया। 

लॉकडाउन की बदइंतजामियों से पैदा असंतोष को दबाने के लिए जल्दबाजी में लिए गए सरकार के फैसले के समान ही प्रवासियों की उम्मीदों पर भी पानी फिर गया। असल में मनरेगा के तहत सालभर में 100 दिन रोजगार की गारंटी प्रतिव्यक्ति न होकर प्रतिपरिवार होना इसकी बड़ी खामी रही है। पहले से ही जिन परिवारों के जॉबकार्ड बने थे, उन परिवार के सभी सदस्यों को 100 दिन का काम नहीं मिल रहा था। परिवार में काम करने योग्य वयस्क सदस्यों की संख्या बढ़ने से काम के दिन और भी कम हो गए। इससे लॉकडाउन खत्म होने के साथ ही प्रवासियों ने शहर लौटना शुरू कर दिया। सितंबर आखिर तक गांवों में जितने प्रवासी लौट आए थे दिसंबर आखिर तक उनमें से 10 से 15 प्रतिशत ही गांवों में रह गए थे।

हालांकि वर्ष 2021-22 का बजट पेश करने से पहले केंद्रीय वित्तमंत्री ने मनरेगा के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन के बड़े-बड़े दावे किए। कहा गया कि इस वर्ष लोगों को बीते वर्ष की तुलना में करीब 56 फीसदी अधिक कार्यदिवस रोजगार मिला है। लेकिन इस र्व्श उन्होंने मनरेगा के लिए मात्र 73,000 करोड़ रुपए का ही प्रावधान रखा। यह स्थिति तब है जब उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में मनरेगा नियमों के विरुद्ध काम कराए जाने के मामले प्रकाश में आए। मनरेगा योजनाओं के लिए स्वीकृत धनराशि का 60 फीसदी सामान्य रोजगार में और 40 फीसदी योजना में इस्तेमाल सामग्री और कुशल रोजगार में व्यय किए जाने का प्रावधान है। उ.प्र. और म.प्र. में करीब 27 लाख रुपए में बनाई गई गोशालाओं के निर्माण में 21 लाख (70 फीसदी) से अधिक व्यय सामग्री पर व्यय किया गया। इसी तरह स्कूलों के सोंदर्यीकरण, जल संरक्षण आदि योजनाओं में भी मनरेगा नियमों के विरुद्ध व्यय किया गया। यही नहीं कई राज्यों में 6-6 महीने तक मनरेगा श्रमिका की मजदूरी और सामग्री का भुगतान न किए जाने की खबरें भी आईं। 

मनरेगा योजनाओं के कार्यान्वयन में मनरेगा कर्मचारियों - ग्राम रोजगार सेवक, कनिष्क अभियंता, डाटा ऑपरेटर, जिला एवं ब्लॉक समन्वयक आदि का असंतोष भी एक बड़ी बाधा रही है। पंचायती राज और ग्रामीण विकास विभागों से संबद्ध ये सभी कर्मचारी 2006 से ही संविदा पर काम कर रहे हैं, जिन्हें न केवल ग्रेड-पे से वंचित रखा गया है अल्कि जो मनदेय दिया जाता है वह भी उसी स्तर के नियमित कर्मचारियों की तुलना आधे से भी कम है। इसी का नतीजा है कि अधिकतर राज्यों में मनरेगाकर्मी लंबे समय से आंदोलन की राह पर हैं। इसका ताजा उदाहरण उत्तराखं डमें 15 मार्च 2021 से मनरेगा कर्मियों की अनिश्चितकालीन हड़ताल है। बीते 4 अप्रैल को उन्होंने राजधानी देहरादून में सचिवालय की घेराव भी किया था। (फोटोग्राफ उसी आंदोलन की है।) देश के लगभग सभी राज्यों में कम या ज्यादा मनरेगा कर्मचारियों में इससे असंतोष बना हुआ है। इसका सीधा प्रभाव मनरेगा योजना की स्वीकृति से लेकर उनके भुगतान पर पड़ रहा है।

अर्थात लॉकडउन के तुरंत बाद सरकार ने जिस तरह मनरेगा बजट और मजूदरी में वृद्धि की थी उसका लाभ न तो गांवों को मिला और न ही प्रवासी मजदूरों को। प्रवासियों के गांव लौटने के बाद ये उम्मीद थी कि यदि गांव के लोग गांव में रह कर ही खेती-किसानी, पशुपालन और ग्रामीण हस्तशिल्प आधारित कारोबार करेंगे तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा। कुछ समय तक परेशानी जरूर होगी लेकिन आने वाले समय में इसके सुखद परिणाम निकलेंगे। लेकिन पंचायती राज व्यवस्था और ग्रामीण विकास के प्रति सरकार के उदासीन रवैए के कारण ऐसा कुछ भी न हो सका और ग्रामीण युवा फिर से शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हुए हैं।


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