लॉकडाउन लागू होने से पहले ही पंचायजी राज संस्थाओं, मुख्यतः ग्राम पंचायतों की जिम्मेदारी बढ़ गई थी। केंद्र और राज्य सरकारों के निर्देशानुसार जिला प्रशासन ने ग्राम पंचायतों को कोविड-19 के रोकथाम के लिए आवश्यक उपाय करने के आदेश दे दिए गए थे। स्थानीय लोगों की आरंभिक जांच, क्षेत्र में प्रवेश करने एवं जाने वाले लोगों की मेडिकल स्क्रीनिंग के लिए चेकपोस्टों और क्वारंटीन केंद्रों का निर्माण, गांव लौटे प्रवासियों की थर्मल स्कैनिंग, आइसोलेशन केंद्रों में उनके खाने-पाने और रहने की व्यवस्था, नियमित स्वच्छता अभियान के तहत सार्वजनिक स्थानों, रास्तां वगलियों में सोडियम हाइपोक्लोराइट, ब्लीचिंग पावडर का छिड़काव, ग्रामीणों को मास्क, सेनेटाइजर, साबुन आदि वितरित करना, बेघर लोगों को पका हुआ भोजन और अन्य जरूरतमंदों को राशन उपलब्ध कराने आदि जम्मेदारियां पंचायतों को सौंपी गई। पंचायत प्रतिनिधियों और कर्मचारियों ने आशा व आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और स्थानीय स्कूल के शिक्षको के सहयोग से इन जिम्मेदारियों का कुशलतापूर्वक निर्वाह किया।
अधिकतर राज्यों में कोविड-19 का सामना करने के लिए पंचायती राज संस्थाओं कोे विशेष आर्थिक अनुदान देने की घोषणा की गई थी, जो कि अलग-अलग राज्यों में ग्राम, ब्लॉक और जिला पंचायतों के लिए 10 हजार से 1 लाख रुपए तक थी। कुछ राज्यों में इस कार्य के लिए केंद्रीय वित्त आयोग और राज्य वित्त आयोग से स्वीकृत अनुदान से व्यय करने के लिए अधिकृत किया गया। लेकिन अधिकतर राज्यों में पंचायतों के लिए घोषित यह विशेष आर्थिक सहायता प्राप्त नहीं हुई। यहां तक कि क्वीरंटीन केंद्रों में प्रवासियों के खाने और रहने आदि के लिए प्रचायतों द्वारा किए गए व्यय की भरपाई भी नहीं हुई।
15वें वित्त आयोग की पहली किस्त जारी
इसी बीच सरकार ने 15वें वित्त आयोग द्वारा पंचायती राज संस्थाओं के लिए अनुशंसित पहली किस्त जारी कर यह दिखाने का प्रयास किया कि वह पंचायत सशक्तिकरण के लिए प्रतिबद्ध है। 15वे वित्त आयोग ने देश के सभी 28 राज्यों की 2.63 लाख पंचायतों के लिए 15,187.50 करोड़ रूपए की अनुशंसा की है। वित्त वर्ष 2020-21 में पंचायतों कं लिए यह राशि 60,750 करोड़ रूपए निश्चित है। वित्त आयोग की पहली किस्त जारी करते हुए केंद्रीय पंचायती राज मंत्री ने इसे अब तक पंचायती राज संस्थाओं को द्वारा किसी एक वर्ष में किया गया सबसे अधिक आवंटन बताया वहीं यह भी स्पष्ट कर दिया कि इस धनराशि का उपयोग पंचायतों किन कार्यों के लिए कर सकेंगी।
यहीं नहीं, सरकार ने केंद्रीय वित्त आयोग द्वारा अनुशंसित धनराशि में पहली बार ग्राम पंचायतों के साथ ही ब्लॉक पंचायतों व जिला पंचायतों को भी अनुदान देने का ऐलान कर दिया। वित्त आयोग द्वारा अनुशंसित धनराशि में से ग्राम पंचायतों के लिए 70-85 प्रतिशत, ब्लॉक अथवा मध्यवर्ती पंचायतों के लिए 10-25 प्रतिशत और जिला जिला पंचायतों के लिए 5-15 प्रतिशत की सीमा तय की गई है, और जहां दो-स्तरीय पंचायत प्रणाली है उन राज्यों में अनुदान ग्राम ग्राम पंचायतों के लिए 70-85 प्रतिशत और जिला जिला पंचायतों के लिए 15-30 प्रतिशत के बैंड में होगा। पंचायतों के लिए तय यह अनुदान 50-50 प्रतिशत के दो भागों - बेसिक (न्दजपमक) अनुदान और बद्ध (ज्पमक) अनुदान, में होगा। बेसिक अनुदान वेतन और स्थापना व्यय को छोड़कर विशिष्ट आवश्यकताओं में और बद्ध अनुदान मूलभत सेवाओं के लिए व्यय किया जाएगा।
केंद्रीय पंचायती राज मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि पंचायतों के लिए इस फंड का उपयोग स्वच्छता व ओडीएफ अनुरक्षण, पेयजल, वर्षा-जल संचयन और जल पुनर्चक्रण की आपूर्ति और कोविड-19 से उत्पन्न चुनौतियों का सामना करने में करना सर्वाधिक उपयुक्त होगा। उन्होंने कहा, ‘‘पंचायती राज मंत्रालय सक्रिय रूप से राज्यों को उपरोक्त कार्यों में समर्थन देगा, जिनसे 15वें वित्त आयोग के अनुदानों का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित हो सके। इसके लिए उन्हें वेब/आईटी इनेबल्ड प्लेटफॉर्म प्रदान किया जाएगा, जिससे योजना निर्माण, निगरानी, लेखा कार्यों आदि के लिए पंचायतों के प्रत्येक स्तर पर धन प्रवाह सुनिश्चित हो सके।’’
ग्राम पंचायत विकास कार्यक्रम (जीपीडीपी) के तहत कहा गया है कि ग्राम पंचायतें ग्राम सभाओं के माध्यम से ग्रामीणों की सहमति और जरूरतों के अनुसार अपनी कार्ययोजना तैयार करेंगी और जिला योजना समिति उसे स्वीकृति प्रदान करेगी। हालांकि देश के कुछ राज्यों में ग्राम पंचायतों द्वारा प्रस्तुत कार्ययोजना को अस्वीकार करने की शक्ति जिला योजना समिति को भी नहीं है। लेकिन अधिकतर राज्यों में जिला योजना समिति उन्हीं योजनाओं को स्वीकृति प्रदान करती हैं जो राज्य अथवा केंद्र सरकार की प्राथमिकता में होती हैं, इस संबंध में पंचायतों के लिए दिशा-निर्देश भी जारी किए जाते हैं। केंद्रीय पंचायती राज मंत्री के उक्त कथन के स्पष्ट है कि अब न केवल ग्राम, ब्लॉक और जिला पंचायतें बल्कि राज्य सरकारें भी केंद्र की महत्वाकांक्षी योजनाओं को लागू करने के लिए विवश हो जाएंगी।
केंद्र सरकार का यह निर्णय पंचायती राज व्यवस्था के तहत ग्रामीण स्थानीय निकायों को स्वायत्तता दिए जाने की अवधारणा के विपरीत है। 1994 में वर्तमान पंचायत प्रणाली लागू होने के बाद से ही पंचायतों को पर्याप्त विधायी और वित्तीय शक्तियां प्रदान करने की बात कही जाती रही है। देश के कुछ राज्यों ने इस दिशा में उल्लेखनीय पहल भी की है। इसका प्रभाव उन राज्यों में कोरोना संकट का सामना करने में पंचायतों की भूमिका के रूप में देखने को भी मिला है, केरल इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण हो सकता है। लेकिन केंद्र सरकार ने 15वे वित्त आयोग की पहली किस्त जारी करते हुए इस तथ्य को नजरअंदाज किया और पंचायतों को अपने तरीके से चलाने का प्रयास किया है।
चित्र: ओडिशा के कोरधा जिले में गांव के बाहर बने चेकपोस्ट पर पंजीकरण कराते हुए प्रवासी।

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