कोरोना संकट का एक वर्ष और पंचायती राज संस्थाएं (1)


वित्तीय वर्ष 2020-21 पंचायती राज संस्थाओं के लिए नई चुनौतियों और संभावनाओं वाला रहा है। कोरोना संकट के साथ ही शुरू इस वर्ष की शुरूआत से ही पंचायती राज संस्थाओं ने लॉकडाउन के कारण शहरों से अपने गांव लौटे प्रवासियों को रोजगार मुहैया कराने से लेकर कोविड-19 के रोकथाम में निर्णायक भूमिका का निर्वाह करना आरंभ कर दिया था। इसके लिए केंद्र सहित लगभग सभी राज्यों की सरकारों ने पंचायतों को अधिकतम सुविधाएं और संसाधन उपलब्ध कराने के बड़े-बड़े दावे किए। ये दावे किस हद तक पूरे हो पाए, इसके लिए जरूरी है कि सरकार द्वारा कोरोना संकट के दौरान और उसके बाद पंचायत संबंधी निर्णयों और दिशा-निर्देशों की पड़ताल की जाए।

महिला सशक्तिकरण  

कोरोना संकट शुरू होने से पहले केंद्र सरकार ने वर्ष 2020-21 को ‘पंचायतों में महिला सशक्तिकरण’ वर्ष के रूप में मनाने का ऐलान किया था। केंद्रीय पंचायती राज मंत्रालय ने पंचायतों के लिए दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा था कि इस वर्ष का विषय ‘समता सृजन’ और ‘महिलाओं की अधिकार प्राप्ति’ होगा। 8 मार्च 2020 को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर पंचायती राज मंत्रालय, भारत सरकार ने राज्यों के पंचायती राज सचिवों और ग्राम प्रधानों/पंचायत सचिवों को पंचायतों को निर्देश दिया गया कि पंचायतों में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए ग्राम पंचायत स्तर पर विशेष सभा और ‘महिला सभा’ आयोजित की जाएं। विशेष ग्राम सभाओं और महिला सभाओं का आयोजन सामुदायिक संसाधन व्यक्तियों (सीआरपी) आंगनवाड़ी, आशा, सखी तथा सहायक नर्स मिडवाइफ (एएनएम) कर्मियों की साझेदारी में होना चाहिए। ग्राम सभाएं पोषण पंचायत, भूमि अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा, पुनरू प्रजनन स्वास्थ्य तथा समान अवसर जैसे विषयों पर विचार-विमर्श करंे। साथ उन्हें ये हिदायत भी दी गई कि पचायतों में 8 मार्च से 22 मार्च, 2020 तक महिला और बाल विकास मंत्रालय के कार्यक्रम के अनुसार ‘पोषण पखवाड़ा’ आयोजित किया जाए।

ज्ञात हो कि पंचायती राज (संविधान संशोधन) अधिनियम के मुताबिक पंचायतों में महिलाओं को 33.3 प्रतिशत आरक्षण प्राप्त है। देश के 20 राज्यों ने महिला आरक्षण 50 प्रतिशत करने का कानून पारित किए हैं। परिणामस्वरूप देश की तीनों स्तरों करीब 2 लाख 60 हजार पंचायतों के 30.41 लाख निर्वाचित प्रतिनिधियों में से 13.74 लाख (45.2 प्रतिशत) निर्वाचित महिलाएं हैं। लेकिन व्यवहार में अभी तक 10 से 15 प्रतिशत निर्वाचित महिलाएं ही स्वयं काम करती हैं। कुछ राज्यों/क्षेत्रों में जरूर निर्वाचित महिला पंचायत प्रतिनिधि अपने दायित्वों का निर्वाह और अधिकारों का उपयोग कुशलतापूर्वक कर रही हैं, जिसे सुखद अपवाद कहा जा सकता है अन्यथा निर्वाचित महिलाओं के स्थान पर उनके प्रतिनिधि - पति, पुत्र, भाई, पिता व अन्य रिश्तेदार, ही काम करते हैं। 

इस दृष्टि से पंचायतों में महिलाओं की सक्रियता बढ़ाने और समुदायिक व्यवहार परिवर्तन के लिए केंद्र सरकार का निर्णय निश्चित ही प्रासंगिक है। इससे महिलाएं ग्राम विकास पंचायत योजना (जीपीडीपी) के तहत समुदाय की आवश्यकताओं और प्राथमिकताओं की पहचान करने सहित बजट बनाने, नियोजन, क्रियान्वन, निगरानी आदि मे महत्पवूर्ण भूमिका निभा सकती है। क्या बीते एक वर्ष के दौरान ऐसा कुछ हो पाया है? माना कि सामुदायिक व्यवहार को बदलने के लिए एक वर्ष की अवधि कोई मायने नहीं रखती। लेकिन सरकार द्वारा निर्देशित विशेष सभाओं, महिला सभाओं और ‘पोषण पखवाड़ा’ मनाने जैसे कार्यक्रम तो हो ही सकते हैं। कितनी पंचायतों में ये कार्यक्रम हुए और उनमें महिलाओं की भागीदारी कितनी हुई, इसी आधार पर उसका मूल्यांकन भी किया जा सकता है। 

कोरोना से बचाव और ग्रामीणों को जागरूक करने में कई स्थानों पर महिलाओं की अहम् भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता। इसमें निर्वाचित महिला पंचायत प्रतिनिधियों की अपेक्षा पंचायतकर्मी महिलाओं समेत आंगनवाड़ी, आशा, सखी, एएनएम आदि ही सक्रिय रही है। कुछ जगहों पर एनआरएलएम के तहत बने स्व-सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं द्वारा मास्क और पीपी किट बनाने जाने की खबरें जरूर मिली। उसके पीछे भी सामुदायिक भागीदारी और महिला सशक्रिण की अपेक्षा एनआरएलएम कर्मियों से प्रेरित आजीविका की भावना ही रही है। 

महत्वपूर्ण तथ्य ये भी है कि पंचयती राज मंत्रालय ने महिला सशक्तिकरण संबंधी उक्त दिशा-निर्देश को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘विजन 2024’ का हिस्सा होने की बात कही थी। आखिर, विजन 2024 क्या है? क्या पंचायती राज संस्थाएं उससे वाकिफ हैं? राजनीति और अर्थशास्त्र के जानकार इसे दो अलग-अलग रूपों में विश्लेषित करते हैं। पंचायती राज संस्थाओं और महिला सशक्तिकरण के मामले में कौन-सा विजन2024 का कौन सा अर्थ लागू होगा, इसका अनुमान 'समता सृजन’ और 'महिलाओं की अधिकार प्राप्ति’ लक्ष्य की उपलब्धियों के आधार पर लगाया जा सकता है।

महत्वपूर्ण तथ्य ये भी है कि पंचयती राज मंत्रालय ने महिला सशक्तिकरण संबंधी उक्त दिशा-निर्देश को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘विजन 2024’ का हिस्सा होने की बात कही थी। आखिर, विजन 2024 क्या है? क्या पंचायती राज संस्थाएं उससे वाकिफ हैं? राजनीति और अर्थशास्त्र के जानकार इसे दो अलग-अलग रूपों में विश्लेषित करते हैं। पंचायती राज संस्थाओं और महिला सशक्तिकरण के मामले में कौन-सा विजन2024 का कौन सा अर्थ लागू होगा, इसका अनुमान ‘समता सृजन’ और ‘महिलाओं की अधिकार प्राप्ति’ लक्ष्य की उपलब्धियों के आधार पर लगाया जा सकता है।

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