दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल की लोकप्रियता से डर गए हैं। इसलिए केंद्र सरकार राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली (संशोधन) बिल ले आई है। इस बिल (जो संसद के दोनों सदनों में पारित हो चुका है) के जरिए एलजी यानी उपराज्यपाल के माध्यम से दिल्ली सरकार चलाना चाहते हैं।
ज्ञात हो कि इस बिल के लागू होने के बाद दिल्ली सरकार को कोई भी निर्णय लेने से पहले उपराज्यपाल की स्वाीकृति लेनी पड़ेगी। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली, अधिनियम 1991 के अनुसार भूमि, कानून व्यवस्था और पुलिस को छोड़कर सभी मामलों में अंतिम निर्णय का अधिकार दिल्ली की निर्वाचित सरकार का है। अब दिल्ली सरकार को विधायिका संबंधी फैसले लेने के लिए 15 दिन पहले और प्रशासनिक फैसले लेने के लिए 7 दिन पहले उपराज्यपाल से स्वीकृति लेनी होगी। यह एक संवैधानिक मसला है लेकिन दिल्ली के उपमुख्यमंत्री इसे अपने नेता की लोकप्रियता के रूप में देख रहे है।
माना कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात, पानी, बिजली समाज कल्याण आदि कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य किया है। दिल्ली सरकार नागरिकों को हर महीने 200 यूनिट बिजली और 20 हजार लीटर पानी निशुल्क दे रही है। दिल्ली के सरकारी स्कूलों की स्थिति में काफी सुधार हुआ है, वे अच्छे और महंगे प्राइवेट स्कूलों को टक्कर दे रहे हैं। इसी तरह दिल्ली की मोहल्ला क्लीनिक मॉडल की देश ही नहीं विदेशों में भी सराहना हो रही है। बसों में महिलाओं के लिए फ्री यात्रा की सुविधा है और सार्वजनिक बस सेवा में भी सुधार हुआ है। समाज कल्याण के क्षेत्र में भी अन्य राज्यों से बेहतर स्थिति है। सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार कम हुआ है। यह भी सच है कि दिल्ली में नागरिकों को मिल रही इन सुविधाओं को देख पड़ोसी राज्यों-हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के लोग सवाल उठाने लगे हैं कि जब दिल्ली में ये सब हो सकता है तो उनके यहां क्यों नहीं?
यही वजह है कि उपमुख्यमंत्री सहित आम आदमी पार्टी के हर नेता को लगता है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सहित उक्त राज्यों में सत्तारूढ़ भाजपा को डर है कि आने वाले समय में आप भाजपा को चुनौती देने की स्थिति में आ सकती है। राजनैतिक दृष्टि से देखा जाए तो यह आप नेताओं का भ्रम ही लगता है। बेशक आप ने दिल्ली में दो बार ऐतिहासिक बहुमत के साथ चुनाव जीत रिकॉर्ड कायम किया है। लेकिन पूरे देश की बात की जाए तो भाजपा ने सामने आप और नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के सामने अरविंद केजरीवाल की लोकप्रियता की असलियत सभी जानते हैं। दिल्ली को छोड़ पंजाब के अलावा किस राज्य में आप के विधायक हैं। दिल्ली में भी दिल्ली की सातों लोकसभा सीटें भाजपा के पास हैं और तीनों नगर निगमों में भाजपा ही सत्तासीन है। पिछले दिनों हुए नगर निगमों की पांच सीटों में से चार पर आप ने जीत जरूर दर्ज की है और गुजरात के स्थानीय निकाय चुनाव में सूरत मे उसने अच्छी बढ़त हासिल की है लेकिन इसे अरविंद केजरीवाल या आप की राष्ट्रीय लोकप्रियता का आधार नहीं माना जा सकता।
आप नेताओं को इस सत्यता का अहसास न हो, ऐसा नहीं हो सकता है। इधर उसने उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश विधानसभाओं के सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। लेकिन इन दोनों राज्यों में उसकी सांगठनिक स्थिति क्या है, से बात न केवल आप नेता जानते हैं बल्कि सत्तारूढ़ भाजपा सहित सपा, बसपा, कांग्रेस सभी इससे वाकिफ हैं। लगता यह है कि आप नेता आप नेता केजरीवाल की लोकप्रियता के बहाने असल सरकार से बचना चाहते हैं। वे यह तो कहते हैं कि राज्य में निर्णय लेने का अधिकार जनता द्वारा चुनी गई विधायिका और उसकी परिषद को होने चाहिए लेकिन वे इससे जुड़े संवैधानिक सवाल को उठाने से कतराते है।
बिल के समर्थकों, दूसरे शब्दों में कहें तो केजरीवाल के विरोधियों का कहना है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली (संशोधन) बिल पूर्णतः संवेघानिक है। यदि दिल्ली सरकार जनता द्वारा चुनी गई है तो संसद का चुनाव भी जनता ने ही किया है। इसका मतलब तो यही हुआ कि यदि केंद्र में किसी भी पार्टी का संसद के दोनों सदनों में बहुमत है तो जब चाहे और जैसा चाहे संविधान में बदलाव कर सकती है। केद्र और राज्यों में परस्पर विरोधी सरकारों के बीच असहमति आम बात है। आज जिन राज्यों में भी भाजपा विरोधी सरकारें हैं वहां राज्यपाल द्वारा राज्य सरकार के हर फैसले पर अवरोध पैदा करना जगजाहिर है। राज्यपालों पर हमेशा ही केंद्र का एजेंट होने का आरोप लगते रहे हैं। इसका ये मतलब तो नहीं कि संसद में बहुमत प्राप्त सरकार राज्यों की सरकार के अधिकार राज्यपालों को देने का विधान बना ले।
बीते 6-7 सालों में जिस तरह मोदी सरकार राज्यपालों के माध्यम से विरोधी दलों की सरकारों को गिराकर चुनाव जीते बिना भाजपा सरकार बनाती रही है, जिसमें राज्यपालों की अहम भूमिका रही है। उससे यही लगता है वह देशभर में गवर्नर राज कायम करना चाहती है। गोवा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, अरुणाचल और एक हद तक उत्तराखंड में भी यह हो चुका है। ऐसा तो वर्तमान संविधान लागू होने से पहले और ब्रिटिश शासन में (भारत सरकार अधिनियम 1935 लागू होने के बाद) भी नहीं हुआ था। अर्थात यह किसी प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की लोकप्रियता से कहीं बड़ा सवाल है।
सिसोदिया जी यह तो कहते हैं कि दिल्ली की निर्वाचित सरकार के अधिकारों की रक्षा के लिए वे यानी उनकी पार्टी सुप्रीम कोर्ट में जाएंगे। यह जरूरी ही नही एकमात्र विकल्प भी है। संसद द्वारा लिए गए निर्णय पर कोई भी फैसला सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ही कर सकती है। लगता है कि वे इस मामले को दिल्ली और केजरीवाल तक सीमित कर समस्या का एक किस्म से सरलीकरण कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में यह सवाल लाजिमी है क्या मनीष सिसौदिया और अन्य आप नेता अरविंद केजरीवाल को नरेंद्र मोदी के खड़ा करने की कोशिश कर चुनावी लाभ हासिल करना चाहते हैं?
केजरीवाल के विरोधियों का एक तर्क यह भी है कि वह शुरू से ही केंद्र सरकार विरोधी व्यवहार करते रहे हैं, केंद्र से सामंजस्य बनाकर शासन करने के बजाय उपराज्यपाल को अपने विरोधी मानते रहे हैं। इससे पहले भी दिल्ली और केेंद्र में अलग-अलग पार्टियों की सरकारें रही हैं, तब तो कभी केंद्र और दिल्ली के बीच टकराव नहीं हुआ। निश्चित ही यह आप की अंतर्निहित चेतना का मसला है। केजरीवाल सरकार और उपराज्यपाल के बीच विवाद की शुरूआत ही उस लोकपाल विधेयक को लेकर हुई थी, जिस के बल पर केजरीवाल का इंडिया अगेन्स्ट करप्शन आंदोलन एक राजनैतिक ताकत बना और दिल्ली के लोगों ने उसे सिर-माथे पर रखा। बाद के वर्षों में भी वे केंद्र सरकार के निजीकरण को बढ़ावा देने के विपरीत शिक्षा, स्वास्थ्य आदि सभी क्षेत्रों में सार्वजनिक क्षेत्र को मजबूत करने पर जोर रहा है। दिल्ली के तमाम प्राइवेट स्कूलों, छोटे-बड़े अस्पालों के मालिक यों ही उनके विरोधी नहीं बने।
भाजपा नेताओं का मौजूदा संशोधन बिल के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यही है कि केजरीवाल सरकार ने दिल्ली में आयुष्मान योजना लागू नहीं की, जो कि केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी स्वास्थ्य बीमा योजना है। हर कोई यह जानता है कि कोई भी स्वास्थ्य बीमा योजना केवल अस्पतालों में रोगी के उपचार पर होने वाले व्यय की गारंटी देती है, उपचार की नहीं। मसलन उत्तराखंड के दुर्गम स्थानों में सौ-डेड़ सो किमी तक कोई अस्पताल ही नहीं हैं, न यातायात की समुचित व्यवस्था है। न शहरों में सुविधा संपन्न सरकार अस्पताल है। वांल के लोगों को जैसे-तैसे शहर पहुंचकर प्राइवेट अस्पताल में उपचार कराना पड़ता है और उपचार कामयाब हो या न हो अस्पताल के बिल की भरपाई आयुष्मान योजना से हो जाएगी।यानी सरकार अस्पताल नहीं खोलेगी लेकिन प्राइवेट अस्पतालों का कोई नुकसान नहीं होने देगी। अर्थात केजरीवाल सरकार से पहले की भाजपा और कांग्रेस सरकारों ने ऐसी कोई पहल ही नहीं कि जिससे केंद्र की विरोधी सरकार को कोई आपत्ति होती। न नीतियों को लेकर मतभेद था और न ही योजनाओं के कार्यान्वयन पर असहमति।

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