हो सकता है आपने इन्हें टीवी बहसों में दमदार तरीके से अपनी बात रखते हुए सुना हो या फिर किसी जन आंदोलन, धरना-प्रदर्शन में सामान्य सामाजिक कार्यकर्ता की तरह बैनर पकड़े, नारे लगाते हुए देखा हो। सरल स्वभाव, मृदुभाषिणी चमक-दमक और प्रचार की भावना से रहित। दिल्ली की झुग्गी बस्ती में रहने वाली कोई घरेलू कामगार महिला हो या फिर झारखंड या छत्तीसगढ़ से आए आदिवासी हर कोई इनसे अपनी बात बहुत ही सहजता और बिना संकोच के कर सकता है।
ये हैं पारदर्शिता और जवाबदेही के सवालों को लेकर सक्रिय देश की प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज। 48 वर्षीय अंजलि भारद्वाज वर्तमान में जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एनएपीएम) की सह-संयोजक हैं।
यह एक बड़ी बात है कि आज जब देश के किसान, मजदूर, दलित, आदिवासी और कमजोर वर्गों के लोग अपने अधिकारों को लेकर आंदोलित हैं, मुख्यधारा का मीडिया सत्ताधीशों की चरण-वंदना में लगा हुआ है, सरकार द्वारा अभिव्यक्ति का गला घोंटा जा रहा है, प्रतिरोध की हर आवाज को दबाने के लिए सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और यहां तक कि कानूनविदों को जेल की सलाखों के पीछे भेज रही है, तो वही अमेरिका के जो वाइडन प्रशासन ने अंजलि भारद्वाज को ‘अंतरराष्ट्रीय भ्रष्टाचार रोधी पुरस्कार’ के लिए दुनिया के 12 साहसी लोगों में नामित किया है।
यह घोषणा करते हुए अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन ने कहा, ‘‘वाइडन प्रशासन यह रेखांकित करता है कि हम इन मुद्दों का सामना करने मे ंतब सफलता पाएंगे जब इसके लिए प्रतिबद्ध सहयोगियों समेहत निडर लोगों के साथ काम करेंगे। ये वो लोग हैं जिन्होंने भष्टाचार को खत्म करने के प्रयास किए और अंतरराष्ट्रीय भ्रष्टाचार रोधी मानको को पूरा करने के लिए काम किया।’’
ज्ञात हो कि लेडी श्रीराम कॉलेज (डीयू) से स्नातक और ऑक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी से डीएससी और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स से पीजी अंजलि भारद्वाज दो दशकों से भी अधिक समय से भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई लड़ रही है। 1999 में वह सूचना का अधिकार आंदोलन से जुड़ी और नेशनल कंपेन फॉर पीपुल्स राइट इंफोर्मेशन की सह संयोजक बनी। वह 2008 में गठित ‘आरटीआई आकलन एंड एडवोकेसी ग्रुप (आरएएजी) के साथ काम करती है, जिसे आरटीआई कानून के कार्यान्वयन के चालू आकलन के लिए स्थापित किया गया था।
अंजलि कहती हैं, लोग अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहते हैं, लेकिन उन्हें इसकी जानकारी नहीं है। आज सबसे बड़ी जरूरत यही है कि लोगों को जागरूक किया जाए। सूचना का अधिकार जनता के हाथों में एक सशक् हथियार है लेकिन उसे लगातार कमजोर किया गया है। इस ओर ज्यादा ध्यान किया जाना चाहिए।
निश्चित ही जो वाइडन प्रशासन का निर्णय स्वागतयोग्य है। इससे समाज के कमजोर वर्गों के लोगों के हित में और भ्रष्टाचारमुक्त प्रशासन के लिए संघर्षरत सामाजिक आंदोलनकारियों को प्रोत्साहित करेगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि भारतीय नेतृत्व अमेरिकी प्रशासन के इस निर्णय के पीछे की भावना को समझेगा।

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