चमोली आपदा: विकास के विनाशकारी मॉडल को प्रकृति की चेतावनी


विकास का विनाशकारी मॉडल प्रकृति और समाज दोनों के लिए कितना घातक हो सकता है, चमोली, उत्तराखंड की त्रासदी ने एक बार फिर इसका अहसास कराया है। 7 फरवरी, 2021 को सुबह करीब 10 बजे नंदा देवी पर्वत का एक हिस्सा टूटने से ऋषिगंगा और धौलीगंगा नदिया में भयानक बाढ़ आ गई थी, जिससे ऋषिगंगा पावर प्रोजेक्ट तबाह हो गया और निर्माणाधीन तपोवन पावर प्रोजेक्ट को भी भारी नुकसान हुआ है। दोनों परियोजनाओं में कार्यरत 50 से 60 लोगों के मारे जाने की खबर है, अपुष्ट खबरों के अनुसार मरने वाले लोगों की संख्या 150 तक हो सकती है। 

अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि यह आपदा ग्लेशियर आउटब्रस्ट होने से आई है या ग्लेशियर टूटने से, लेकिन स्थानीय स्तर से लेकर महानगरों तक इसे प्रकृति का प्रकोप कहा गया है। कुछ लोगों ने इसे दैवीय प्रकोप बताते हुए इसके आगे मनुष्य और विज्ञान की असमर्थता की बात कही है तो अधिकतर लोगों के मुताबिक यह आपदा विकास के विनाशकारी मॉडल और भौतिक संसाधनों के अवैज्ञानिक दोहन को प्रकृति की चेतावनी है। 

यह वही क्षेत्र है जहां 1970 के दशक में भयावह भूस्खलनों के बाद ‘वन बचाओ’ आंदोलन का आगाज हुआ था, जो बाद में ‘चिपको आंदोलन’ के नाम से विश्व प्रसिद्ध हुआ। इस आपदा में नेस्तनाबूत ऋषिगंगा पावर प्रोजेक्ट के ठीक ऊपर चिपको आंदोलन की प्रेरणास्रोत गौरा देवी का गांव रैणी स्थित है। ऋषिगंगा पावर प्रोजेक्ट को लेकर शुरू से ही सवाल खड़े किए जाते रहे हैं। ऑल वेदर चारधाम परियोजना के अध्ययन के लिए गठित रवि चोपड़ा समिति ने भी इस योजना को स्वीकृति दिए जाने से लेकर इसकी व्यावहारिकता पर सवाल उठाए थे। यहां तक कि इसके विरुद्ध उत्तराखंड हाइकोर्ट में याचिका भी दायर की गई थी। 

यह पहला मौका भी नही है जबकि उत्तराखंड को प्रकृति के प्रकोप का सामना करना पड़ा है। 2010-11 से कमोवेश हर साल ही विनाशकारी भूस्खलनों एवं बाढ़ के कारण पूरे पर्वतीय क्षेत्र को जान-माल का भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है, इस बीच 2013 की केदारनाथ आपदा के घाव तो अभी तक भरे नहीं है। हर बार ही आपदा के बाद उसके कारणों, जान-माल के नुकसान और उससे बचाव के तरीकों पर विमर्श होता रहा है। राज्य और केंद्र सरकारें नुकसान की भरपाई और आपदा से बचाव और सुरक्षा के लिए धन आवंटित कर देती हैं। यह सिलसिला पिछले एक दशक से अनवरत चलता आ रहा है। लेकिन पहाड़ को भौतिक आपदाओं को रोकने और हिमालयी प्रकृति और समाज को बचाने के लिए ठोस रणनीति बनाने अभी उनसे कैसे बचाया जाए, इसके लिए अब तक कारगर कदम नहीं उठाए जा सके हैं। 

भूगर्भ विज्ञानियों के अनुसार हिमालय दुनिया की नवीनतम संरचना है, इस क्षेत्र में अभी भी भूगर्भीय हलचलें होती रहती हैं। समय-समय पर आने वाले भूकंप इसके प्रमाण हैं। लेकिन प्रकृति की संवेदनशीलता को लेकर हमारी सरकारें और योजनाकार कितने सजग हैं, इसका अनुमान इस क्षेत्र में बन रही जल विद्युत परियोजनाओं से लगाया जा सकता है। अकेले उत्तराखंड में छोटी-बड़ी 500 से अधिक जल विद्युत परियोजनाएं हैं, कुछ बन चुकी हैं अधिकतर निर्माणाधीन हैं, जिनमें एक भारत-नेपाल सीमा पर महाकाली नदी पर 5000 मेगावाट की पंचेश्वर जल विद्युत परियोजना है। जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और पूर्वोत्तर, खासकर अरुणाचल प्रदेश की योजनाओं को इसमें शामिल कर दिया जाए तो यह संख्या और भी अधिक हो जाएगी।

इन जल विद्युत परियोजनाओं को स्वीकृति देने में न केवल पर्यावरण कानूनों की अवहेलना हुई है बल्कि इनके निर्माण के लिए अपनाई जाने वाली तकनीक, पहाड़ों को काटने/तोड़ने के जिए और सुरंगें बनाने के लिए भारी मात्रा में विस्फोटकों के इस्तेमाल के जरिए प्राकृतिक संतुलन को चुनौती दी जा रही है। पर्यावरणविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने समय-समय पर इन पर रोक लगाने के लिए अबालत में याचिकाएं दायर की गई हैं, जिन पर अदालत ने रोक भी लगाई है, लेकिन राज्य व केंद्र सरकारें उसके विरुद्ध ऊपर अदालत में याचिका दायर कर रोक हटाती रही हैं।

जल विद्युत योजनाओं के समान ही, इधर ऑल वेदर चारधाम परियोजना से भी प्राकृतिक संतुलन को बड़ा झटका लगा है। इस योजना के तहत पिथौरागढ़ से उत्तरकाशी तक सड़कों को चौड़ा करने के लिए पहाड़ काटे जा रहे हैं और वनों का विनाश किया जा रहा है। इससे पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन की घटनाएं बढ़ी हैं। इसके अतिरिक्त उत्तराखंड राज्य बनने के बाद जिस तरह पर्वतीय क्षेत्रों में सड़कों का जाल बिछाने के काम में तेजी आई है, उससे भी यह संकट और बढ़ा है। ऐसा नहीं है कि भूस्खलन हमेशा ही सड़क निर्माण वाले क्षेत्र में आते हैं। कई बार निर्माण क्षेत्र से 10-12 किमी दूर अथवा उसके सामने वाली पहाड़ी तक में उसका असर होता है। बीते 20-25 सालों में पर्वतीय क्षेत्र के छोटे जल स्रोतों के सूखने की बड़ी वजह यह भी है। 

भौतिक आपदाओं में वृद्धि और सदियों से स्थानीय लोगों के पीने के पानी और कृषि व पशुपालन का का आधार रहे जल स्रोतों के सूखने के कारण है ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर पलायन भी तेज हुआ है। चीन और नेपाल सीमाओं से लगा होने के कारण यह क्षेत्र सामरिक दृष्टि से भी काफी संवेदनशील माना जाता है। इस लिहाज से इस क्षेत्र में यातायात सुविधाओं और संचार सेवाओं का विस्तार नितांत आवश्यक है। लेकिन प्रकृति और समाज के समक्ष अस्तित्व संकट पैदा करने वाले निर्माण-विकास से देश की सीमाएं सुरक्षित नहीं हो सकती।

जहां तक उत्तराखंड सरकार की बात है, राज्य सरकार ने पर्वतीय क्षेत्रों से हो रहे पलायन को रोकने के लिए ग्राम्य विकास और पलायन आयोग का गठन किया है। वह भी अब तक संरचनागत विकास व मूलभूत सुविधाओं की आपूर्ति और रोजगार के अवसरों की जैसी बुनियादी मांगों तक सीमित रहा है। विकास का स्वरूप क्या हो और प्रकृति व मनुष्य के बीच किस तरह सामंजस्य स्थापित किया जाए, इसे लेकर पलायन आयोग के पास कोई दृष्टिकोण नहीं है।

बहरहाल, चमोली जिले की इस आपदा के बाद उत्तराखंड में भौतिक आपदाओं से सुरक्षा के साथ-साथ के पर्वतीय क्षेत्रों के विकास को लेकर नई बहस शुरू हुई है। भूगर्भशास्त्रियों से लेकर पर्यावरणविदों और समाजिक विचारकों तक सभी का कहना है कि यदि पहाड़ की प्रकृति और संस्कृति को बचाना है तो विकास के मॉजूदा विनाशकारी मॉडल को बदला जाना चाहिए। इसके लिए निर्माण-विकास की अत्याधुनिक खोजों के साथ प्रकृति के स्थानीय विज्ञान और प्रकृति व समाज के सह-अस्तित्व का सहारा लिया जाना चाहिए।



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