निजीकरण: भारत को ग्रेट ब्रिटेन से सीखना चाहिए



यह सच है कि भारत समेत दुनिया के लगभग सभी देशों में निजीकरण को अर्थव्यवस्था की संजीवनी बूटी के रूप में देखा जाता रहा है। लेकिन देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक-आर्थिक विकास में यह कितना घातक साबित हुआ है, इस बात को विकासशील देशों की अपेक्षा विकसित देश अधिक समझे हैं। यह बात पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के ट्रेंड सेटर और निजीकरण की नीति का अगुवा कहे जाने वाले ग्रेट ब्रिटेन के अनुभव से समझा जा सकता है, जो कि भारत जैसे विकासशील देश के लिए अनुकरणीय हो सकता है।
ग्रेट ब्रिटेन में निजीकरण की पृष्ठभूमि 1980 के आसपास तैयार हो गई थी। निजीकरण वहां एक खास विचारधारा से प्रेरित कार्यक्रम था। इसके तहत निजी क्षेत्र और वित्त बाजार के जरिए जन सुविधाओं की दिक्कतों के समाधान का दावा किया गया था और तर्क दिया गया कि निजी क्षेत्र लाभ और प्रतिस्पर्धा की भावना से प्रेरित होकर उपभोक्ताओं को अधिकतम सुविधाएं प्रदान करता है। लेकिन जल्दी ही इसके सामाजिक दुष्परिणाम भी सामने आने लगे थे। खासकर शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली और परिवहन जैसी बुनियादी सुविधाओं के निजीकरण से सरकार और नीति निर्माता यह समझ गए थे कि इससे समाज के कमजोर लोगों की जीवनयापन की बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच कम हो जाती है और इसका असर राष्ट्र के विकास पर पड़ता है। लिहाजा निजीकरण को बढ़ावा दिए जाने के दो दशक पूरे होते-होते ग्रेट ब्रिटेन में नए सिरे से निजी संस्थानों के राष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया तेज हो गई। 
इससे पहले ब्रिटेन सरकार ने इस विषय पर जनता के विचार जानने के लिए ‘युवर गवर्नमेंट पोल्स’ (यूगोपोल्स) कराया था, जिसमें करीब 70 प्रतिशत लोगों ने शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा और रेलवे का राष्ट्रीयकरण किए जाने पर अपने विचार व्यक्त किए थे। इस बीच देश में लेबर पार्टी और कंजर्वेटिव पार्टी दोनों की सरकारें बनीं लेकिन दोनों ने जनता की अपेक्षाओं को ध्यान में रखते हुए सरकार ने प्राइवेट कंपनियों का राष्ट्रीयकरण जारी रखा।
सरकार की इस पहल को वहां के सामाजिक संगठनों और कामगारों की यूनियन का भरपूर समर्थन मिला। ब्रिटेन में प्राइवेट फाइनेंस इनिशिएटिव (पीएफआई) संस्था काम करती है. यह निजी क्षेत्र के कारोबारियों का शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, परिवहन आदि क्षेत्रों के सार्वजनिक प्रतिष्ठानों में निवेश के लिए प्रेरित करती है। वहां पर यही प्राइवेट-पब्लिक पार्टनरशिप का पैटर्न है। ब्रिटेन के नेशनल ऑडिट ऑफिस के आंकड़ों के मुताबिक नेशनल हेल्थ सर्विस की जिन परियोजनाओं 11 अरब पौंड की रकम दी गई है, इन परियोजनाओं के अंत तक सरकारी प्रतिष्ठान पीएफआई को 80 अरब पौंड की रकम वापस करेंगे।
कोरोना संकट के मौजूदा दौर में यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि किसी भी राष्ट्रीय अथवा अंतरराष्ट्रीय महामारी या संकट का सामना करने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, ऊर्जा आदि क्षेत्रों का राष्ट्रीयकरण होना आवश्यक है। ग्रेट ब्रिटेन सहित स्पेन, इटली, फ्रांस, जर्मनी आदि कई देशों ने इस दिशा में तेजी से कदम बढ़ाए हैं। ऐसे में भारत सरकार का रेलवे जैसे महत्वपूर्ण उपक्रम के निजीकरण की फैसला समझ में नहीं आता। शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा और कई राज्यों में सड़क परिवहन के निजीकरण के दुष्परिणामों को तो हम देख ही रहे हैं। भारत जैसे देश में जहां कि देश की बहुत बड़ी आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन को मजबूर है। निजीकरण को बढ़ावा दिए जाने से देश में जहां गरीबों की शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन आदि क्षेत्रों में पहुंच कम हुई है वहीं समाज के कमजोर वर्गों के सामने रोजगार का संकट भी बढ़ा है। रेलवे जो कि गरीबों की ‘जीवनरेखा’ कही जाती है, न केवल सर्वसुलभ परिवहन सुविधा उपलब्ध कराता है बल्कि सबसे ज्यादा रोजगार भी इसी क्षेत्र में मिलता है। भारत सरकार का यह फैसला न केवल देश की वस्तुस्थिति को नकारने वाला है बल्कि विश्व स्तर पर हो रहे बदलावों के भी खिलाफ है। 

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