सीमांत के गांवों में करीब तीन साल से बंद हैं मनरेगा स्कीमें



पिथौरागढ़ (उत्तराखंड) जिले के सीमावर्ती 7 गांवों - कूटी, गुंजी, बूंदी, नाबी, नेपलच्यू, गरब्यांग और रांगकाॅंग में नवंबर 2017 से मनरेगा के तहत होने वाले निर्माण कार्य बंद हंै। इसकी वजह इस क्षेत्र में इंटरनेट सुविधा न होने के कारण निर्माण कार्यों का जियो-टैग न हो पाना है। जबकि पंचायतों को केंद्रीय और राज्य वित्त आयोगों से प्राप्त अनुदान से होने वाले कार्य बराबर होते रहे हैं। व्यास घाटी के नाम से प्रसिद्ध यह क्षेत्र सामरिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है, यहां के लोग सीमा के स्वाभाविक प्रहरी के रूप में जाने जाते रहे हैं। उन्होंने अपनी उद्दात्त सांस्कृतिक विरासत और विशिष्ट जीवनशैली के चलते उत्तराखंड ही नहीं पूरे देश में अपनी पहचान बनाई है। इस क्षेत्र के लोगों की बौद्धिक प्रतिभा का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि करीब 12 हजार की आबदी वाले इस क्षेत्र के 300 से भी अधिक राजपत्रित अधिकारी, डाॅक्टर, इंजीनियर और बैंक मैनजर उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
इधर, नेपाल और भारत के बीच विवाद का कारण बने कालापानी, लिपूलेख और लिंपियाधूरा इसी व्यास घाटी में स्थित हैं। 1960 के भारत-चीन युद्ध से पहले भरत और चीन के बीच होने वाला व्यापार व्यास घाटी सहित उससे लगी दारमा और चैंदास घाटियों के लोगों के हाथों में था, तब यहां का ऊनी वस्त्र उद्योग उन्नत स्थिति में था। यहां के ऊनी वस्त्रों की भारत, चीन और नेपाल में काफी मांग थी। औसत 12000 फिट की ऊंचाई वाले इस क्षेत्र में सिंतबर के बाद बर्फ पड़ने लगती है जो मार्च तक रहती है। इस मौसम में इन गांवों के अधिकतर लोग मौसमी प्रवास के लिए धारचूला और उसके आसपास की निचली घाटियों में आ जाते हैं, जहां उनके गांवों के नाम से ‘खेड़े’ बने हुए हैं। रांगकाॅंग की ग्राम प्रधान अंजू देवी ने बताया कि पहले आमतौर पर व्यास घाटी के सीमावर्ती 7 गावांें के 40-50 प्रतिशत लोग ही सर्दियों में धारचूला और निचली घाटियों में चले जाते थे, जो मार्च में सर्दी कम होने पर गांव लौट जाते थे। लेकिन हाल के वर्षों में इस क्षेत्र के विकास के प्रति सरकार के उदासीन रवैए के कारण कई परिवार स्थाई रूप में वहीं बस गए हैं। अब यह क्षेत्र वर्षभर निर्जन सा रहने लगा है, जो कि इस क्षेत्र के लिए ही नहीं पूरे देश के लिए चिंताजनक विषय है।
जहां तक इंटरनेट न होने के कारण ग्रामीण विकास के कार्यों में बाधा पड़ने की बात है, यह न केवल धारचूला की बल्कि राज्य के लगभग पूरे ही पहाड़ी इलाकों में एक बड़ी समस्या है। यह अलग बात है कि पिथौरागढ़, बागेश्वर, रुद्रप्रयाग, चमोली, उत्तरकाशी जिलों सहित और देहरादून के कालसी और चकराता ब्लाॅकों में यह और भी अधिक है। धारचूला ब्लाॅक की ही तांकूल ग्राम पंचायत की प्रधान रुकमणि ने बताया कि इस क्षेत्र में मोबाइल नेटवर्क न होने के कारण सरकार ने ग्राम प्रधानों और पंचायतकर्मियों को सेटेलाइट मोबाइल दिए हैं लेकिन उससे बात हो सकती है, वह भी नेपाल के नेटवर्क से। जबकि बड़ालू ग्राम पंचायत (मूनाकोट ब्लाॅक) के प्रधान दिवाकर जोशी ने बताया कि यह बात ग्राम प्रधान संगठन कई बार सरकार के संज्ञान में लाए हैं कि इंटरनेट सुविधा न होने से ग्रामीण विकास और पंचायती राज के कार्यों पर प्रतिकूल असर पड़ रहा हैं। लेकिन सरकार से आश्वासन से ज्यादा कुछ नहीं हुआ है। लगभग यही बात मुनगाड़ (देहरादून) के ग्राम विकास अधिकारी प्रवीन कुमार भी कहते हैं।
राज्य के दर्जनभर से अधिक प्रचायत प्रतिनिधयों और पंचायतकर्मियों ने बताया कि प्रोपर इंटरनेट सुविधा न होने से न केवल विकास कार्यों की जियो-टैग नहीं हो पाती बल्कि मनरेगा श्रमिकों की मजदूरी ट्रांसफर होने और मस्टर रोल निकालने में कई दिन लग जाते हैं। इस बीच मनरेगा कामों में तेजी आने के साथ-साथ श्रमिकों की समस्या भी बड़ी है और वर्षाकाल में इंटरनेट कनेक्टीविटी भी कम हो जाती है इससेे समस्या और भी बढ़ गई है। उतरसू ग्राम पंचायत के ग्राम पंचायत विकास अधिकारी गोविंद सिंह चैहान ने बताया कि कई बार इंटरनेट न होने से बैंक ट्रांसफर में 10-10 दिन लग जाते हैं और श्रमिकों के मस्टर रोल निकालने में घंटों कंप्यूटर के सामने बैठा रहना पड़ता है। लगभग सभी पहाड़ी जिलों के पंचायत कर्मीयों और पदाधिकारी ग्रामीण क्षेत्रों में प्रोपर इंटरनेट सेवा बहाल करने की मांग वे अपने-अपने तरीके से सरकार के सामने रख चुके हैं लेकिन राजनेताआ और अधिकारी अब तक कोई पहल नहीं कर पाए है।
ज्ञात हो कि मनरेगा ग्रामीण लोगों की मांग पर आधारित रोजगार गारंटी स्कीम है, जिसमें काम मांगे जाने के पंद्रह दिन में रोजगार देना होता है और काम पूरा होने पर पंद्रह दिनों के अंदर मजदूरी का भुगतान करना होता है। लेकिन इंटरनेट सुविधा ठीक न होने से कभी जियो-टैंिगंग में तो कभी मस्टर रोल निकालने में और कभी बैंक ट्रांसफर में हफ्तो लग जाते हैं। इसका असर न केवन विकास कार्यों पर बल्कि जन सामान्य के कामकाज पर भी पड़ रहा है।
थ्चित्र: भारत-चीन सीमा का अंतिम गंाव कूटी और गुंजी गांव।

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