
वैश्विक महामारी कोविड-19 के कारण जहां दुनियाभर में शिक्षा, स्वास्थ्य, पविहन, पेयजल अािद महत्वपूर्ण क्षेत्रों को सार्वजनिक क्षेत्र में लाए जाने वर विचार हो रहा है। साम्यवादी और समाजवादी कहे जाने वाले ही नहीं यूरोप और अमेरिका के पूंजीवादी देश भी इस विषय पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। लेकिन भारत सरकार ने ऐसे वक्त में देश के सावनिक क्षेत्र के सबसे बड़े उपक्रम भारतीय रेलवे’ के निजीकरण का ऐलान कर देश और दुनिया के आर्थिक, राजनैतिक विशेषज्ञों को हैरत में डाल दिया है।
हालांकि देश में रेलवे के निजीकरण की शुरूआत पिछले साल लखनऊ-दिल्ली ‘तेजस एक्सप्रेस’ प्राइवेट ट्रेन चलाने के साथ ही हो गई थी। लेकिन इस बार 1 जुलाई को सरकार ने 109 रूटों की 161 जोड़ी प्राइवेट ट्रेन चलाने की योजना को हरी झंडी दे दी है। इसके लिए सरकार ने निजी क्षेत्र के कारोबरियों से ‘योग्यता आवेदन’ यानी त्म्फन्म्ैज् थ्व्त् फन्।स्प्थ्प्ब्।ज्प्व्छ प्रस्तुत करने की अधिसूचना जारी कर दी है।
भारतीय रेल परिवहन निगम द्वारा जारी इस अधिसूचना में कहाग या है कि प्रादवेट कंपनियों को इसके लिए 35 साल तक कंसेशन पीरियड में रखा जाएगा। ज्यादातर ट्रेनें मेक इन इंडिया के तहत भारत में बनी होंगी। प्रत्येक ट्रेन में 16 कोच होंगे और वे 160 किलोमीटर प्रति घंटा अधिकतम रफ्तार से चलेंगी। इसमें रेलवे का हिस्सा नीलामी प्रक्रिया में हर ट्रेन में कम से कम 16 कोच होंगे। रेलवे ने यह भी कहा है कि इन ट्रेनों में से अधिकांश को मेक इन इंडिया के तहत भारत में ही बनाया जाएगा। रेलवेका दावा है कि इस कदम का लक्ष्य रखरखाव की कम लागत कम करना, कम ट्रांजिट टाइम के साथ नई तकनीक का विकास और रोजगार के अवसर बढ़ाना है। इससे रेलवे अर्थात भारत सरकार को 30,000 करोड़ की आय होगी।
खबर यह भी है कि सरकार रेल फैक्ट्रियों के कॉरपोरेटाइजेशन अर्थात व्यावसायीकरण पर भी विचार कर रही है। इसके लिए कैबिनेट ड्राफ्ट तैयार कर लिया गया है। अन्तिम मंजूरी के लिए जल्द कैबनेट के पास भेजा जाएगा। कहा गया है कि रेलवे में कॉरपोरेट कल्चर को बढ़ावा देने की नीति के तहत रेलवे की मैन्युफैक्चरिंग और प्रोडक्शन यूनिटों का व्यावसायीकरण होगा।
सरकार के इस फैसले का मुख्य विपक्षी पार्टी सहित वाम-लोकतांत्रिक विचारधारा से सरसोकार करने वाले अर्थशास्त्रियों, राजनैतिक विचाराकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कड़ा विरोध किया है। लेकिन मोदी सरकार के हर विरोध का तरह यह भी नक्कार खाने की तूती ही साबित हुआ है।
दरअसल, भारत में निजीकरण की शुरूआत 1985-87 के बीच राजीव गांधी शासन के शुरुआती दौर में हो गई थी। उसी का परिणाम है कि आज देश में शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्रों में प्राइवेट कंपनियों का दबदबा कायम हुआ है। लेकिन निजीकरण की वास्तविक शुरूआत पी.वी. नरसिंह राव सरकार ने तत्कालीन आर्थिक संकट कसा समाना करने के तर्क पर शुरू किया था। उसी का नतीजा है कि देश की अर्थ व्यवस्था उत्पादन और निर्यात के बदले आयात पर निर्भर होती चली गई। उदारीकरण के 10 वर्ष पूरे होते-होते कृषि, व्यापार और उत्पादन में विदेशी और निजी कंपनियों का दबदबा बढ़ गया था। कृषि समेत ग्रामीण उद्योगों का विकास अवरुद्ध होने से ग्रामीण बेरोजगारी बढ़ गई थी। यही नहीं देश के सार्वजनिक और निजी शिक्षण संस्थानों से शिक्षाप्राप्त कर युवा विदेशों को पलायन करने लगे। उस समय यानी उदारीकरण के 10 वर्ष बीत जाने पर जहां निजीकरण के प्रत्येक पहलू का विश्श्लेषण कर उसमें आवष्यक परिवर्तन करने की आवश्यकता थी। लेकिन तत्कालीन अटल बिहारी सरकार ने न केवल निजीकरण को बढ़ावा देना जारी रखा बल्कि केंद्र सरकार में ‘विनिवेश मंत्रालय’ सार्वजनिक उपक्रमों को औने-पौने दामों में निजी हार्थों में बेचना शुरू कर दिया। वर्तमान मोदी सरकार ने रेलवे और एलआईसी सहित चार दर्जन से अधिक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को निजी हाथों में सौंपने की जो योजना बनाई है वह असल में अटल सरकार की योजना का ही विस्तार है।
(क्रमशः अगले अंक में पढ़े निजीकरण का अगुवा ग्रेट ब्रिटेन बढ़ा राष्ट्रीयकरण की राह।)
चित्र: तेजस एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योग आदित्यनाथ, 4 अक्टूबर, 2019
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