द्वालीसेरा पिथौरागढ़ (उत्तराखंड) जिले में काली गंगा नदी के किनारे नेपाल सीमा से लगा छोटा सा गांव है। करीब 1200 की आबदी वाले इस गांव में कोराना संकट के कारण 100 से अधिक प्रवासी लौट आए थे, जिनमें से 60 से अधिक 25 से 40 साल तक की उम्र के हैं। वे दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात आदि राज्यों में होटलों अथवा प्राइवेट कंपनियों में काम करते थे। अप्रैल आखिरी सप्ताह और मई पहले सप्ताह के बीच जब ये लोग गांव लौटे थे तो गांव में रहकर ही खेतीबाड़ी के साथ कोई स्वरोजगार करना चाहते थे। नदी किनारे की उपजाऊ जमीन है और आम, केला, पपीता, लीची आदि फल भी ठीकठाक हो जाते हैं। लेकिन किसी भी काम के लिए बुनियादी तौर पर जितनी रकम चाहिए वह इन लोगों के पास नहीं है। ग्राम प्रधान प्रेम राम ने बताया कि इनमें से कुछ लोगों ने मनरेगा में काम करने की इच्छा जाहिर की है और कुछ मनरेगा की व्यक्तिगत योजनाओं के तहत गौशाला, मुर्गीबाड़ा या मछली पालन का काम करना चाहते हैं। लेकिन समस्या ये है कि गांव में पहले से ही सभी जाॅबकार्ड धारकों को उनकी जरूरत और कानून के मुताबिक काम नहीं मिल पा रहा है और व्यक्तिगत योजनाओं को स्वीकृति मिलने में 6 महीने से एक साल तक का समय लग सकता है। मनमोहन, संतोष, कैलाश आदि ऐसे ही युवा हैं जो गांव में अथवा निकटवर्ती जौलजीबी या पीपली कस्बों में फ्रुट प्रासेसिंग या इस तरह का कोई काम करना चाहते हैं। लेकिन गांव में रहकर काम की अनुकूल स्थिति न होने के कारण इनमें से अधिकतर ने शहरों को लौटने का मन बना लिया है।
यह स्थिति अकेले द्वालीसेरा गांव की नहीं है। राज्य के पर्वतीय क्षेत्र के अधिकतर गांवों की हालात इससे अलग नहीं है। कोरोना संकट के कारण जब प्रवासी अपने गांवों को लौट रहे थे तो राज्य सरकार का भरोसा था कि प्रवासी गांव लौटेंगे तो पहाड़ की वीरान वादियों में भी रौनक लाॅट आएगी। पलायन रोकने के लिए बनाए गए ‘ग्राम्य विकास और पलायन आयोग’ ने उत्साहित होकर दावा भी कर दिया था राज्य के जिन 1,700 गांवों में से 550 से अधिक गांव फिर से आबाद हुए हैं। पलायन को रोकने के लिए सरकार ने दो-तीन साल पहले राज्य में करीब 1,500 ‘इंडस्ट्रियल ग्रोथ सेंटर’ विकसित करने की योजना बनाई थी। इसके लिए अलग से बजट भी दिया गया था। लेकिन अब इसकी कहीं बात नहीं होती।
कोरोना संकट के देखते हुए राज्य सरकार ने प्रवासियों को गांव में रोकने के उद्देश्य से 13 मई को ‘‘हेल्पिंग आउट पीपल एवरिव्हेयर (होप)’’ पोर्टल लांच किया था। इस पोर्टल पर प्रवासियों को अपनी शैक्षिक योग्यता, अनुभव और कार्यकुशलता की जानकारी देनी है। इस आधार पर रोजगार के इच्छुक प्रवासियों उचित प्रशिक्षण भी दिया जाना है ताकि वे स्वरोजगार कर सकें। लेकिन प्रवासियों को घर में ही रोजगार दिलाने की प्रदेश सरकार की मंशा परवान चढ़ती नहीं दिख रही।
सरकारी आंकड़ों के मुताबकि राज्य में 20 जून तक दो लाख 34 हजार के करीब प्रवासी लौट चुके थे। उनमें से मात्र 12 हजार 918 लोगों ने ही ‘होप’ पोर्टल में पंजीकरण कराया था। माना जा रहा है कि पंजीकरण नहीं करवाने वाले प्रवासी कोरोना संकट खत्म होने के इंतजार में हैं। स्थितियां सामान्य होने पर ये लोग फिर रोजगार की तलाश में शहरों को लौट जाएंगे। सच तो यह है कि इस बीच भारी संख्या में प्रवासी वापस शहरों को लौट सुके हैं।
यह स्थिति तब है जबकि प्रशासन गांव लौटै प्रवासियों को फोन और एनआईसी के माध्यम से बल्क मैसेज के जरिए होप पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन कराने के लिए प्रेरित कर रहा है। लेकिन युवाओं को न तो अफसरों की बातों पर भरोसा है और न ही सरकार की योजनाओं पर। हालांकि पिथौरागढ़ से उत्तरकाशी तक सभी जिलों के पग्राम प्रघान और स्थानीय निवासी चाहते हैं कि प्रवासी गांव में ही रह कर कोई काम - खेती, बागवानी, पशुपालन, व्यापार या कुटीर उद्योग, करें। लेकिन पिछले 20 सालों में कृशि क्षेत्र की जो उपेक्षा हुई है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को जिस तरह नश्ट किया गया है, उसमें यह आसान नहीं है। राज्य में भौतिक संसाधनों की कमी नहीं है यह बात हर कोई कहता है लेकिन उनका उपयोग कैसे स्थानीय लोगों के हित में हो, इसके प्रति राजनेताओं और योजनाकारों का नकारात्मक रवैया लोगों को रोजी-रोटी और जीवन यापन की बेहतर सुविधाओं के लिए पलायन करने को मजबूर करती है।


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