भारत-चीन सीमा विवाद : भूमिहीन किसानों और आदिवासियों पर दिखने लगा है असर



भारत-चीन सीमा पर दोनों देशों की सेनाओं के बीच झड़प के बाद बाजार पर असर पड़ना शुरू हो गया है। एक तरफ भारत में चीनी सामान का बहिष्कार किया जा रहा है तो निवेश रोके जाने की खबरें भी आ रही है तो दूसरी ओर चीन ने भारत से खरीदे जाने वाले कई सामानों के आयात पर रोक लगा दी है। इसी का नतीजा है कि भारत से चीन सहित मलेशिया, ताइवान और जापान के लिए निर्यात किया गया चरोटा गुजरात के सूरत और महाराष्ट्र के मुंबई बंदरगाह पर रोक दिया गया है। अकेले छत्तीसगढ़ से भेजे गए चरोटा की मात्रा 5,000 टन बताई गई है। इसका असर छत्तीसगढ़ सहित मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार झारखंड आदि राज्यों के उन भूमिहीन किसानों और
आविासियों पर भी पड़ने लगा है, जिनके लिए चरोटा अमदनी का एक जरिया है।
औषधीय गुणों से भरपूर भारतीय चरोटा के चीन, मलेशिया, ताइवान और जापान मुख्य बड़ा ग्राहक देश है। इस बार चीन जापान मलेशिया और ताइवान ने मिलकर छत्तीसगढ़ से करीब 30,000 टन चरोटा आयात को मंजूरी दी थी। छत्तीसगढ़ सहित कई अन्य राज्सों से गांव-गांव से संग्रहीत कोरोना ण की मात्रा निर्यातकों तक पहुंचने के बाद इसकी ग्रेडिंग, पैकिंग कर निर्यात के लिए बंदरगाहों तक पहुंचा दी गई। मार्च तक तो ठीक चला, उसके बाद पहले तो कोरोना वायरस ने उस पर बाधा डाली और अब सीमा विवाद ने शेष मात्रा को शिप पर चढ़ाने से रोक दिया है।
चीन द्वारा आयात पर रोक लगा दिए जाने के बाद निर्यातक चरोटा को ताइवान, मलेशिया और जापान भेजने के लिए दूसरे मार्ग की कर रहे हैं। यही नहीं सीमा विवाद के कारण भुगतान पर भी रोक लगा दी गई है। इसके असर छोटे व्यापारी और किसान भी प्रभावित हो रहे हैं। इस बीच निर्यातकों ने माल बंदरगाहों में अटके माल को वापस मंगाने की योजना बनाई है, ताकि निर्यात न होने से हुए नुकसान की भरपाई के लिए सरकार से मदद मांगी जा सके।

क्या है चरोटा?



चरोटा उत्तर भारत में खरफ की फसल के साथ एक खरपतवार सहित खाली जमीन, सड़क या रास्तों के किनारे और बंजर भूमि अपने आप पैदा होने वाला पौधा है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में इसे चक्रवत भी कहा जाता है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झांखंड, उत्तराखंड आदि राज्यों में इसे बखूबी से देखा जा सकता है। वर्षा ऋतु में बेकार पड़ी भूमियों में हरियाली बिखेरने वाला और अनुपयोगी समझा जाने वाला चरोटा 3-4 वर्षों से ग्रामीणों, खासकर आदिवासियों के लिए रोजगार एवं आमदनी का महत्वपूर्ण जरिया बन गया है।
आयुर्वेद से संबंधित संस्कृत साहित्य में चरोटा का उल्लेख चक्रमर्द नाम से मिलता है। अग्रेजी में सिकल सेना कहा जाता है। इसका वानस्पतिक नाम ‘कैसिया तोरा लिनन बेकर’ है। इसकी की ऊंचाई 30-90 सेमी होती है, पत्तियां तीन जोड़ी में बनती है। इसकी पत्तियों को मसलने पर विशेष प्रकार की गंध आती है। पोधें में पुष्प जोड़ी में निकलते है जो कि पीले रंग के होते है। फलियां हंसिया के आकार की 15-25 सेमी लम्बी होती है, जिनमें चमकीले हल्के कत्थई या धूसर रंग के बीज होते है।
झारखण्ड, छत्तीसगढ़, ओडीसा, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश  आदिवासी चरोटा की मुलायम पत्तियों का प्रयोग साग-भाजी के  रूप में करते है। इसकी पत्ती, तना, फूल, बीज एवं जड़ का उपयोग विभिन्न औषधीय प्रयोजनों के लिए किया जाता है। इसकी पत्तियों को पुल्टिस के रूप में घाव व फोड़े के उपचार के लिए किया जाता है। हाल के वर्षों में चरोटा के बीजों का उपयोग ग्रीन टी, चॉकलेट, आइसक्रीम के अलावा विविध आयुर्वेदिक दवाइयाँ बनाने में प्रयोग किया जा रहा  है। इसके  बीज को  भूनकर काॅफी के विकल्प के रूप में भी प्रयोग किया जाता है। इसकी पत्तियों में प्रोटीन, वसा, खनिज, फाइबर, कार्बोइड्रेट, .कैल्शियम, लोहा, कैरोटीन थाइमिन, विटामिन सी आदि भरपूर मात्रा में पाए जाने की बात वनस्पति विज्ञानी कहते हें।
ग्रामीण  धान की कटाई बाद चरोटा की कटाई शुरू कर देते है। फसल को सुखाने के बाद पत्तियों, तनों और बीजों को अलग-अलग किया जाता है। इसे बेचने के लिए उन्हें भटकना भी नहीं पड़ता है। व्यापारी  घर से ही इसे खरीद लेते है। छत्तीसगढ़ के बस्तर, रायपुर, बिलासपुर दुर्ग और सरगुजा जिलों के ग्रामीण इसका खासा मुनाफा कमा रहे है। चरोटा के बीज 40-50 रुपये प्रति किलो की दर से व्यापारी खरीद लेते हैं, जो आढ़तियों के जरिए मुंबई, सूरत, हैदराबाद, विशाखापटनम आदि शहरों में भेजतेे है। वहां से चीन, जापान, मलेशिया आदि देशों को इसका निर्यात किया जाता है। चरोटा के ओषधीय एवं आर्थिक महत्व को देखते हुए वनस्पति विज्ञानी इसकी उन्नत खेती की संभावनाएं तलाश रहे हैं। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर के सस्य विज्ञान विभाग के वैज्ञानिकों दस पर शोध कार्य आरंभ किया है।

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