सीपीआर का खुलासा: ग्रामीण भारत में दो-तिहाई डाक्टरों के पास नहीं है कोई मेडिकल डिग्री




देश के ग्रामीण अंचलों में स्वास्थ्य सेवाओं की जर्जर स्थिति यो तो हमेशा ही चर्चा का विषय रही है। लेकिन कोरोना संक्रमण के विस्तार से इसमें और भी बढोत्तरी हुई है। खासकर, लाॅकडाउन के कारण शहरों में काम करने वाले प्रवासियों के अपने गांव लौटने से ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोना संक्रमण में हो रही वृद्धि से यह एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आई है। हालांकि भारत सरकार के नेशनल हेल्थ प्रोफाइल 2019 के मुताबिक देश के करीब 26,000 सरकारी अस्पतालों में 21,000 से ज्यादा ग्रामीण क्षेत्रों में हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि मरीज और उपलब्ध बेडों एवं प्रशिक्षित डाक्टरों की संख्या का अनुपात बेहद चिंताजनक है। इससे बड़ी चिंता की बात यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में जो डाक्टर हैं उनमें से दो-तिहाई के पास कोई मेडिकल डिग्री नहीं है।
इस तथ्य का खुलासा सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (सीपीआर) ने देश के 19 राज्यों में किए गए सर्वे के आधार पर किया है। सोशल साइंस एंड मेडिकल जर्नल में प्रकाशित सीपीआर की सर्वे रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रामीण भारत में तीन में से दो डाक्टरों के पास मेडिकल से जुड़ी कोई औपचारिक डिग्री नहीं है। 75 प्रतिशत गांवों में औसत एक हेल्थ केयर प्रोवाइडर है और औसत तीन प्राथमिक हेल्थ केयर प्रोवाडर हैं। इसमें से 86 प्रतिशत के पास प्राइवेट डाक्टर हैं और 68 प्रतिशत के पास कोई औपचारिक मेडिकल ट्रेनिंग भी नहीं है।
सीपीआर का इस सर्वे रिपोर्ट से विश्व स्वास्थ्य संगठन ;ॅभ्व्द्ध की रिपोर्ट ‘द हेल्थकेयर वर्कफोर्स इन इंडिया’ की टिप्पणियों को बल मिलता है। 2016 में प्रकाशित विö स्वास्थ्य संगठन की इस रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में 57.3 प्रतिशत लोगों के पास कोई मेडिकल क्वालिफिकेशन नहीं है। इसके अलावा 31.4 प्रतिशत लोगों ने सिर्फ सेकेंडरी स्कूल लेवल तक पढ़ाई की है।
मार्च, 2020 में जब कोरोना महामारी का असर भारत में दिखने लगा था और देशव्यापी लाॅकडाउन के बाद शहरों से प्रवासी मजदूरों ने गांव लौटना श्ुारू किया था तो इंडियन सोसाइटी ऑफ क्रिटिकल केयर और सेंटर फाॅर डेमोक्रेटिक स्टडीज जैसे कई संगठनों ने ग्रामीण क्षेत्रों में आवश्यक स्वास्थ्य सुविघाएं उपलब्ध न होने पर चिंता व्यक्त की थी कि जिस तरह से हजारों प्रवासी मजदूर अपने घर पहुंच रहे हैं, ऐसे में अगर मामले ज्यादा बढ़े तो ग्रामीण स्वास्थ्य सिस्टम के लिए इसे संभालना बड़ी चुनौती होगी।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि सरकार ने भी कोरोना संकट के इस दौर में ग्रामीण भारत के अंदर आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका काफी अहम होने की बात स्वीकार की है। उन्हें गांवों में लोगों की सेहत मॉनिटर करने से लेकर गांव लौटने वाले प्रवासियों के स्वास्थ्य की जानकारी इकट्ठा करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। जो कि ग्रामीण आबादी की तुलना में संख्या में न केवल कम हैं बल्कि आवश्यक स्वास्थ्य प्रशिक्षण भी उन्हें प्राप्त नहीं है और उनका वेतन भी काफी कम होती है। यही नहीं, कोरोना महामारी से लड़ने के लिए उनके पास न तो आवश्यक उपकरण हैं और न ही व्यक्तिगत सुरक्षा के उपाय।
ज्ञात हो कि देश में कुल 6 लाख, 62 हजार 599 गांव हैं, जिनमें से करीब 2 लाख 80 हजार गांवों की आबादी 1000 से कम और करीब तीन लाख गांवों की आबादी 1000 से 10,000 तक और लगभग 80 हजार गांवों की बादी 10 हजार से लेकर 15 हजार तक है। जबकि आशा कार्यकर्ताओं की संख्या लगभग 9 लाख 30 हजार और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र 5,335 हैं अर्थात एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र औसतन 120 गाँवों या कहें कि करीब 560 स्क्वायर किलोमीटर के ग्रामीण इलाके को कवर करता है। ऐसे में ग्रामीण आबादी की प्राइवेट प्रैक्टिसनर और झोलाछाप डाक्टरों पर निर्भरता को समझा जा सकता है।
सीपीआर स्टडी में यह भी सामने आया है कि बिहार और उत्तर प्रदेश में प्रशिक्षित डाक्टरों की तुलना में तमिलनाडु और कर्नाटक में अनौपचारिक प्रदाताओं का चिकित्सकीय ज्ञान अधिक है। सर्वे रिपोर्ट के लेखक जिष्णु दास, जो में जार्जटाउन विश्वविद्यालय, वाशिंगटन के मैककोर्ट स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी और वाल्श स्कूल ऑफ फॉरेन सर्विस के प्रोफेसर हैं, ने कहा है, ‘‘ग्रामीण जनसंख्या अधिक होने की वजह से वहां डाक्टरों के संबंध में अनौपचारिक प्रदाता ही एकमात्र विकल्प होते हैं। वे ही वहां मौजूद रहते हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य क्लीनिक या फिर एमबीबीएस डाक्टर इतने कम हैं, इसलिए ज्यादातर ग्रामीणों के लिए विकल्प भी नहीं हैं। केरल को छोड़कर लगभग हर राज्य में सामान्य बात है।‘‘

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