Tuesday, July 1, 2014

हिन्दी नहीं अंग्रेजी है क्षेत्राीय भाषाओं की दुश्मन

राजभाषा हिन्दी को लेकर अनावश्यक विवाद पैदा हो गया है। केन्द्रीय गृह मंत्रालय के अध्ीनस्थ राजभाषा विभाग द्वारा सोशल मीडिया में हिन्दी का इस्तेमाल करने संबंध्ी निर्देश के बाद जिस तरह की प्रतिक्रिया राजनैतिक हलकों में देखने को मिली है, उससे लगता है कि यह विवाद महज राजनैतिक है। यही आदेश राजभाषा विभाग ने मार्च 2014 में यूपीए के शासनकाल में भी जारी किया था। लेकिन तब न तो तमिलनाडु की मुख्यमंत्राी जयललिता और डीएमके नेता एम. करुणानिध् िने प्रधनमंत्राी या केन्द्र सरकार को चिट्ठी लिखी और न ही अखिलेश यादव, उमर अब्दुल्ला, वृंदा करात आदि ने हिन्दी के साथ-साथ अन्य भाषाओं को भी महत्व दिए जाने की बात कही थी।
राजभाषा विभाग की गलती यह है कि उसने दूसरी बार यह निर्देश केन्द्र में भाजपानीत एनडीए सरकार बनने के तुरंत बाद जारी किया। यह भी नहीं कहा जा सकता है कि इसके पीछे प्रधनमंत्राी नरेन्द्र मोदी या गृहमंत्राी राजनाथ की प्रेरणा थी यानी मोदी सरकार जनसंघ के ‘हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान’ एजेंडे को लागू करवाना चाहती है। भाजपा ही क्यों, देश की बहुसंख्य जनता जिसमें शीर्ष राजनेता, प्रशासनिक अध्किारी, योजनाकार और नीति निर्माता भी शामिल हैं, सभी चाहते हैं कि राजभाषा हिन्दी का उत्थान हो और उसे राष्ट्रभाषा का दर्जा मिले। अन्यथा बैंको सहित सभी सरकारी दफ्रतरों में ‘कृपया हिन्दी को व्यवहार में लाएं’ क्यों लिखा होता। यही नहीं प्रति वर्ष सितंबर महीने में ‘हिन्दी पखवाड़ा’ मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य ही हिन्दी का प्रचार-प्रसार है। इन बातों का तो कभी किसी नेता, साहित्यकार या अधिकारी ने विरोध् नहीं किया। आखिर इस बार ऐसा क्या हो गया कि जिससे राजनेताओं और वृ(िजीवियों को हिन्दीतर क्षेत्रों में हिन्दी थोपे जाने का अंदेशा हो गया और राजभाषा विभाग को सपफाई देनी पड़ी कि यह निर्देश केवल केन्द्र सरकार के विभागों और हिन्दी भाषी राज्यों के लिए था?
गहराई से देखा जाए तो विवाद हिन्दी और तमिल, उर्दू या अन्य भारतीय भाषाओं के बीच का नहीं बल्कि अंग्रेजी के वर्चस्व का है। इस बार का विवाद तो पूरी तरह अंग्रेजी द्वारा खड़ किया गया है। राजभाषा विभाग के जिस निर्देश को हिन्दी अखबारों और चैनलों ने विशेष महत्व नहीं दिया गया उसे अंग्रेजी अखबारों और चैनलों ने जरूरत से ज्यादा स्थान दिया। 27 मई को राजभाषा विभाग ने सर्कुलर जारी कर दिया गया लेकिन नेताओं की संज्ञान में यह बात 15 जून के बाद आई, जबकि प्रधनमंत्राी द्वारा भूटान की संसद को हिन्दी में संबोध्ति करने पर कई अंग्रेजी अखबारों ने ‘हिन्दी डिप्लोमैसी’ जैसे शीर्षक के साथ समाचार और विश्लेषण प्रकाशित किए। इसके बाद ही जयललिता, एम. करुणानिधि, एस. रामदास, वायको सहित तमिल साहित्यकारों और वु(िजीवियों ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर की।
हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के बीच इस तरह के विवाद उस वर्ग द्वारा पैदा किए जाते रहे हैं, जो स्वतंत्राता प्राप्ति के समय से ही अंग्रेजी को बनाए रखने और उसे पफलने-पफूलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। स्वतंत्राता आन्दोलन के दौरान गांध्ी जी ने सापफ कर दिया था कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया जाएगा। अरविंद घोष, जिनकी मातृभाषा बांगला थी, कर्मभूमि तमिल भाषी पुडुचेरी थी और जो अंग्रेजी के विद्वान थे, ने भी देश की एकता और अखंडता के लिए सभी भारतीय भाषाओं का उत्थान करने और हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की सलाह दी थी। चूंकि उस समय अंग्रेजी ही राजकाज की भाषा थी इसलिए स्वतंत्राता प्राप्ति के बाद 1949 में सरकार ने ‘त्रिभाषा सूत्रा’ का प्रतिवेदन पारित किया जिसे 1950 में भारत का संविधन लागू होने पर संविधन में शामिल किया गया।
त्रिभाषा सूत्रा में हिन्दी व एक क्षेत्राीय भाषा को प्रमुखता दी गई थी और अंग्रेजी को वैकल्पिक भाषा के रूप में रखा गया था। यदि त्रिभाषा सूत्रा सपफल हो गया होता तो आज यह विवाद ही पैदा नहीं होता। हिन्दीतर राज्यों में यह सही तरीके से लागू हो गया था लेकिन हिन्दी भाषी राज्यों ने किसी क्षेत्राीय भाषा के बदले संस्कृत को तरजीह दी। इसके पीछे भी भाषा को संवाद और ज्ञान-विज्ञान का माध्यम बनाना नहीं बल्कि सरकारी नौकरियां हासिल करना यानी रोजी-रोटी का सवाल प्रमुख था। इससे जहां हिन्दीतर राज्यों में हिन्दी के प्रति अविश्वास पैदा हुआ, जिसकी परिणति 1960 के दशक में दक्षिण में ‘हिन्दी विरोध्ी आन्दोलन’ के रूप में हुई। ;ज्ञात हो कि एम. करुणानिध् िउसी आन्दोलन की उपज हैं।द्ध वहीं दूसरी ओर अंग्रेजी संवाद, आजीविका और आर्थिक-सामाजिक वर्चस्व की भाषा बनकर दिन दूनी -रात चैगुनी की गति से देश में विस्तार करती गई।
आज स्थिति यह हो गई है कि वु(िजीवियों का एक बड़ा वर्ग अंग्रेजी का विरोध् तो करता है और न चाहते हुए भी उसे अपनाने के लिए मजबूर है। रोजी-रोटी और रोजगार अंग्रेजी में ही सुलभ हैं, सरकारी और आर्थिक तंत्रा पूरी तरह अंग्रेजी में चलता है। इस कारण पढ़ाई-लिखाई का माध्यम भी अंग्रेजी हो गई है। देश का कोई भी हिस्सा हो प्राइवेट स्कूलों की शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी ही है। सरकारी स्कूलों जिनका माध्यम हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाएं हैं, उनमें कोई भी अपने बच्चों को नहीं पढ़ाना चाहता। इंजीनियरिंग, मेडिकल, बिजनेस, आईटी, उच्च प्रशासनिक सेवाओं और साध्नों-संसाध्नों में इन्हीं अंग्रेजीदां लोगों का वर्चस्व है। अंग्रेजी की इस हैसियत के आगे हिन्दी ही नहीं कोई भी भारतीय भाषा कहीं नहीं टिकती।
दूसरी ओर, सवा अरब की आबादी वाले भारत में एक प्रतिशत से कम लोगों की मातृभाषा या मुख्य भाषा अंग्रेजी है, एक चैथाई आबादी यानी लगभग 30 प्रतिशत ऐसे हैं जो अंग्रेजी जानते हैं या जानना चाहते हैं। वही लोग अंग्रेजी भाषा के माध्यम से देश में राज करना चाहते हैं। ऐसे लोग ही अंग्रेजी को महत्व दिए जाने का तर्क भी यह कहकर देते हैं कि अंग्रेजी हमें दुनिया से जोड़ती है, अंग्रेजी विज्ञान व प्रौद्योगिकी की भाषा है और अंग्रेजी ही  बाजार की भाषा है। इसलिए शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होनी चाहिए है। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि जर्मनी, जापान, प्रफंास, चीन आदि जितने भी गैर अंग्रेजी भाषी राज्य हैं उन्होंने न केवल अपनी भाषा के बल पर तरक्की की है बल्कि सामान्य बोलचाल की भाषा के रूप में भी वहां अंग्रेजी प्रतिवंध्ति है।
इसके ठीक विपरीत भारत की स्थिति है, जहां सोशल मीडिया में हिन्दी के इस्तेमाल करने करने के निर्देश पर बवाल खड़ा हो जाता है। जबकि हिन्दी ही एक ऐसी भाषा है जो देश में बहुसंख्य आबादी द्वारा बोली जाती है और दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों को छोड़ दिया जाए तो सभी लोग इसे समझते हैं। हिन्दी ही दुनिया की दूसरी बड़ी भाषा है जिसे सबसे अध्कि लोग बोलते है। दक्षिण भारत की चार भाषाओं - तमिल, तेलगू, मलयालम और कन्नड़ को छोड़कर देश की बाकी सभी भाषाएं हिन्दी के समान ही संस्कृत से पैदा हुई हैं।
यह विरोधभासी स्थित आज 2014 में पैदा नहीं हुई है। बल्कि स्वतंत्राता प्राप्ति के समय से ही अंग्रेजीदां लोगों ने देश की सत्ता, संसाध्नों और विकास के तमाम स्रोतों पर अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए इसे न केवल जीवित रखा बल्कि हरसंभव उसे बड़ाया है। यह एक अच्छी बात है कि मोदी सरकार भारत को एक सशक्त राष्ट्र बनाने का दावा कर रही है। कोई भी राष्ट्र तब ही सशक्त हो सकता है जबकि उस राष्ट्र की जनता को विकास के समान अवसर उपलब्ध् हों। जिस तरह आज देश में मुट्ठीभर अंग्रेजीदां लोगों का वर्चस्व बना हुआ है उसके चलते न तो मोदी सरकार का दावा पूरा होने वाला है और न ही भारत की स्थिति सुध्रने वाली है। रही बात बहुभाषी भारतीय जनमानस की परस्पर एकता और भाषायी सहिष्णुता की तो इसके लिए साहित्य और ज्ञान-विज्ञान के आदान-प्रदान को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। साथ ही इंजीनियरिंग, मेडिकल, बिजनेस, आईटी, उच्च प्रशासनिक सेवाओं में अंग्रेजी के बदले हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं को महत्व दिया जाना चाहिए और अंग्रेजी भाषी प्राइवेट शिक्षण संस्थाओं पर यथासंभव अंकुश लगना चाहिए। सबसे महत्वपूण यह है कि संसद और विधन मंडलों में राजनेता उसी भाषा में अपनी बात कहें जिस भाषा में वे जनता से वोट मांगते हैं। इसी से देश में भाषा से कारण पैदा होने वाले विवाद खत्म होंगे और विकास का मार्ग प्रशस्त होगा।

बड़े बांधें के विरु( एकजुट हो रहे हैं लोग

गुजरात सरकार के सरदार सरोवर बांध् की उफंचाई 121.92 मीटर से बढ़ाकर 138.73 मीटर करने यानी करीब 17 मीटर बढ़ाने के पफैसले कि विरु( नर्मदा घाटी में उग्र आक्रोश पैदा हो गया है। नर्मदा बचाओ आन्दोलन के बैनर तले किसान, मजदूर, आदिवासी, मछुवारे इस पफैसले के विरोध् में कानूनी और जमीनी लड़ाई लड़ने के लिए लामबंद हो रहे हैं। आन्दोलनकारियों का आरोप है कि सरकार ने पुनर्वास और पर्यावरण की शर्तों को पूरा किए बिना बांध् की उफंचाई बढ़ाने का निर्णय लिया है। डूब क्षेत्रा के अंतर्गत स्थित 245 गांवों में अभी भी 48,000 परिवार यानी लगभग ढाई लाख लोग रह रहे है, जिनमें 45,000 परिवार अकेले मध्य प्रदेश के है। इसके अतिरिक्त बांध् की उफंचाई बढ़ाने से पहले पर्यावरण सुरक्षा के लिए निर्धरित शर्तों को भी पूरा नहीं किया गया है।
प्रसि( सामाजिक आन्दोलनकारी मेध पाटकर का कहना है कि सरदार सरोवर बांध् की उफंचाई बढ़ाए जाने के मामले में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्राी शिवराज सिंह चैहान ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई है तो प्रधनमंत्राी नरेन्द्र मोदी गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्राी के रूप में पेश आए है। नई दिल्ली में दो दिवसीय ध्रना-प्रदर्शन पर बैठे नर्मदा घाटी के बांध् प्रभावित किसानों, आदिवासियों, मछुवारों और मजदूरों को संबोध्ति करते हुए मेध पाटकर ने कहा कि इस आन्दोलन के जरिए वह सरादार सरोवर बांध् परियोजना की सच्चाई को उजागर करेंगी और देशभर में बड़े बांधें के विरु( चल रहे जनान्दोलनों को एकजुट करेंगी। ये लोग सरादार सरोवर बांध् परियोजना से प्रभावित मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र के कई जिला मुख्यालयों में रैलियों एवं ध्रने-प्रदर्शन के बाद केन्द्र सरकार से अपनी गुहार लगाने दिल्ली आए थे। उनका मांग है कि सरादार सरोवर बांध् की उफंचाई बढ़ाने से पहले सरकार उनका पुनर्वास सुनिश्चित करे और उनकी आजीविका के साध्न उपलब्ध् कराए, बिना पुनर्वास के विस्थापन उनके लिए जल समाध् िलेने जैसा ही है।
विस्थापन, निश्चित ही बड़े बांधें के कारण पैदा होने वाली एक बड़ी समस्या है। इसके जवाब में सरकार लोगों ‘जमीन के बदले जमीन’ देने का वास्ता देती है और बड़े बांधें के पक्ष में अध्कि बिजली एवं पीने व सिंचाई का पानी मिलने, रोजगार मिलने एवं बांध् नियंत्राण जैसे तर्क देती है। लेकिन बड़े बांधें से होने वाले जो पफायदे सरकार गिनाती है वे कभी भी पूरे नहीं होते। उल्टे इससे सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय विसंगतियां बढ़ जाती हैं। यही कारण है कि आज भारत ही नहीं पूरी दुनिया में बड़े बांधें का विरोध् हो रहा है। यूरोप और अमेरकिा के कई देशों ने तो बड़े बांधों के बदले छोटे और कम उफंचाई वाले बांध् बनाना शुरू कर दिया है।
इंस्टीट्यूट पफाॅर डेमोक्रेसी एण्ड सस्टेंनेब्लीटी के निदेशक डाॅ. राजेन्द्र रवि बड़े बांधें को मानव सभ्यता के लिए आत्मघाती मानते हुए कहते हैं, ‘बड़े बांधें के निर्माण से पहले पन बिजली उत्पादन और सिंचाई व पीने के पानी की आपूर्ति का एक निश्चित लक्ष्य रखा जाता है लेकिन वह कभी पूरा नहीं होता। बांध् से झील बनती है उसमें पानी का स्तर कभी समान नहीं रहता। वर्षा )तु में वह भर जाता है तो उससे बांध् के टूटने का खतरा पैदा हो जाता है इसलिए झील के पानी को छोड़ना पड़ता है, इससे अकारण बाढ़ की स्थिति पैदा हो जाती है। इसी तरह जब झील में पानी कम हो जाता है तो पूरा पानी रोककर नदी के प्रवाह क्षेत्रा को सूखे व अकाल की स्थिति का सामना करने के लिए मजबूर कर दिया जाता है। दोनों ही स्थितियों में न तो लक्ष्य के मुताबिक न बिजली पैदा हो पाती है, न पानी मिलता है और न ही बाढ़ नियंत्राण हो पाता है। इसके अलावा बड़े बांधें से गांव, कस्बे, जंगल आदि उसमें डूब जाते हैं तो पूरी सभ्यता और पारिस्थितिकी व्यवस्था नष्ट हो जाती है।
बड़े बांधें के पक्ष में एक और तर्क स्थानीय लोगों को रोजगार मिलने का दिया जाता है। इस तर्क के बल पर स्थानीय यानी बांध् से प्रभावित होने वाले लोगों को तैयार किया जाता है। करीब दीन दशकों से किसानों, मजदूरों और समाज के कमजोर लोगों के अध्किारों के लिए संघर्षरत जन संघर्ष वाहिनी के नेता भूपेन्द्र सिंह रावत इसे सरकार और बांध् निर्माता कंपनियों का बसे बड़ा झूठ कहते हैं। श्री रावत कहते हैं कि बड़े बांधों के कारण कृषि, पशुपालन एवं इनसे संबंध्ति व्यवसायों से आजीविका चलाने वाले जितने लोग बेघर एवं बेरोजगार हो जाते हैं, उसका दसवें हिस्से को भी बांध् परियोजना में काम नहीं मिलता और वह भी केवल परियोजना का निर्माण होने तक। उसके बाद तो स्थानीय लोग उसमें अपवाद स्वरूप ही रह जाते हैं।
बांध् परियोजना का निर्माण आरंभ करने से पहले नियमानुसार उससे प्रभावित होने वाले लोगों का पुनर्वास करना जरूरी है। अलग-अलग मामलों में न्यायालय ने भी सरकारों को यह आदेश दिया है। लेकिन व्यवहार में पहले तो बांध् से प्रभावित होने वाले लोगों का आकलन सही तरीके से नहीं किया जाता। मसलन टिहरी बांध् परियोजना को ही लें तो सरकार उन्हीं लोगों को बांध् प्रभावित मानती हैं जिनके घर, खेत डूब क्षेत्रा में आ चले गए जबकि टिहरी बांध् से बनी झील से लगे क्षेत्रों के लोगों को भी इसका खामियाजा कई तरह से भुगतना पड़ रहा है, झील के कारण स्थानीय स्तर पर जलवायु बदलने से उनकी कृषि पर बुरा प्रभाव पड़ा है, आवागमन मुश्किल हो गया है और उनके रोजगार छिना है लेकिन सरकार की नजरों में वे बांध् प्रभावित नहीं हैं।
इसके साथ ही जिन लोगों को बांध् प्रभावित माना जाता है तो उनका भी पुनर्वास नहीं हो पाता है या पुनर्वास महज कागजी होता है। माटू जन संगठन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा टिहरी बांध् विस्थापितों के संबंध् में दायर याचिका की सुनवाई पर उच्च न्यायालय ने 3 नवंबर 2011 को टीएचडीसी को टिहरी बांध् विस्थापितों के पुनर्वास के लिए 102.99 करोड़ रुपए देने का निर्देश दिया था जबकि सरकारें 2005 में ही पूर्ण पुनर्वास की घोषणा कर चुकी थी। इस तरह देशभर में कई मामले हैं जिनमें सरकार के अनुसार विस्थापितों का पुनर्वास हो गया है और व्यवहार में वे अभी भी दर-ब-दर है। पर्यावरणविद वाॅल्टर पफर्नांडीज के अनुसार अब तक देश में बड़े बांधें के कारण करीब 3 करोड़ लोग विस्थपित हुए हैं। इनमें आध्े से भी कम लोगों का ही पुनर्वास हुआ है।
पुनर्वास के नाम पर होने वाला घोटाला भी विस्थापन से जुड़ा एक और पहलू है। नर्मदा बचाओ आन्दोलन के अनुसार मध्य प्रदेश में पुनर्वास के नाम पर 1,000 करोड़ का घोटाला हुआ है। 3,000 पफर्जी रजिस्ट्रियां बनाकर नेताओं, अपफसरों और दलालों ने विस्थापित गरीबों का हक मारा है। पांच साल पहले प्रकाश में आए इस घोटाले की अभी भी जांच चल रही है। इसी तरह का मामला कुछ समय पहले टिहरी के विस्थापितों के पुनर्वास के संबंध् में भी सामने आया था, जिसमें तत्कालीन मुख्यमंत्राी के करीबी लोगों द्वारा विस्थापितों को मिली जमीन पफर्जी रजिस्ट्रिी बनकार बेचेे जाने की बात कही गई थी।
सरकार कहती है कि बड़े बांध् बाढ़ नियंत्राण में कारगर भूमिका निभाते हैं। लेकिन सत्यता इसके विपरीत है। बड़े बांध् अक्सर भयंकर बाढ़ का कारण बनते हैं। कुछ वर्ष पहले गुजरात में मोरवी बांध् के टूटने पर तीन गांव बह गए थे। ओड़ीसा के हरीकुंड बांध् का पानी छोड़े जाने से भी भयंकर तबाही मची थी। हाल ही में हिमाचल प्रदेश में ब्यास नदी पर बने लारजी बांध् का पानी छोड़े जाने से 25 छात्रों की मौत हो गई थी। हरियाणा में यमुना नदी पर बने हथिनी कुंड बैराज का पानी छोड़े जाने पर दिल्ली और उत्तर प्रदेश में बाढ़ जैसी स्थितियां पैदा हो जाती हैं। इस तरह लगभग सभी बड़े बांधें का पानी छोड़े जाने पर बाढ़ जैसी स्थितियां पैदा हो जाती हैं।
पर्यावरणीय क्षति अर्थात पारिस्थितिकी असंतुलन बड़े बांधें कारण होने वाला ऐसा नुकसान है जिसकी कभी भरपाई नही हो सकती। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय बड़े बांधें निर्माण से पहले पर्यावरणीय नुकसान का आकलन तो करता है और क्षतिपूर्ति की शर्तें भी रखता है लेकिन उससे जो तात्कालिक और स्थाई नुकसान होते हैं उनसे बचाव का कोई तरीका नहीं है। जून 2013 में उत्तराखण्ड में आई विनाशकारी आपदा का मुख्य कारण ही प्रकृति की संवेदनशीलता को देखे बिना बनाए जा रहे बांध् रहे हैं। इस तरह की घटना पूर्वाेत्तर के राज्यों में भी आए दिन होती रहती हैं, जहां कि सैकड़ों बड़े बांध् बनाए जा रहे हैं। इसके साथ बड़े बांध् से बनने वाली झील सें बहुमूल्य वन संपदा और जीव जंतु नष्ट हो जाते हैं, जो जीवन चक्र और प्रकृति के बीच संतुलन बनानए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यही नहीं बड़े बांधें के कारण नदी के पानी का स्वरूप बदल जाता है, बांध् से नदी में बाद बनने लगती है जिसमें नदी का पानी जल्दी प्रदूषित हो जाता है।
पर्यावरणविदों की सबसे बड़ी चिंता आज भूमंडलीय उफष्णता यानी ग्लोबल वार्मिंग है। बड़े बांध् ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने में अहम् भूमिका निभाते हैं। वैज्ञानिक कापफी पहले इस बात का खुलासा कर चुके हैं कि बड़े बांध् ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने वाली मिथेन गैस का उत्सर्जन करते हैं। भारत में इस समय 5100 बड़े बांध् हैं जो करीब 3.35 करोड़ टन मिथेन गैस उत्सर्जित करते हैं। दुनियाभर में इस तरह के बांध् और जलाशयों की संख्या 52 हजार के आसपास है जो मिथेन गैस उत्सर्जित करते हैं। वैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि बांध् की उम्र बढ़ने के साथ-साथ मिथेन गैस के उत्सर्जन में भी वृ(ि होती जाती है।
बड़े बांधें के भूमंडलीय दुष्प्रभावों को देखते हुए वर्ष 2000 में विश्व बांध् आयोग का गठन किया गया था। आयोग ने दुनियाभर के सभी बड़े बांधें को तोड़ने और भविष्य में छोटे बांध् बनाने की सलाह दी थी। हमारे देश में 126 बड़े बांध् ऐसे हैं जो सौ साल से अध्कि पुराने हैं। विश्व बैंक ने 1990 के दशक में ही भारत के 56 बड़े बांधें को खतरनाक मान लिया था। इसके बावजूद न तो बड़े बांधें को तोड़ा गया और न ही बड़े बांधें के निर्माण में कमी आई।
बहरहाल, सरदार सरोवर बांध् की उफंचाई बढ़ाए जाने से जहां नर्मदा घाटी के बांध् प्रभावित लोगों के समक्ष अस्तित्व संकट का खतरा बढ़ा है और वे अपने अध्किारों की रक्षा के लिए लड़ने, मरने को तैयार हैं तो वहीं बड़े बांधें को लेकर एक बार पिफर नए सिरे से विमर्श तेज हुआ है। सामाजिक आन्दोलनकारी और पर्यावरणविद बड़े बांधें से होने वाले नुकसान से बराबर आगाह कर रहे हैं। लिहाजा सरकार को बड़े बांधें के स्थान पर छोटे बांध और पन बिजली परियोजनाएं बनाने पर जोर देना चाहिए। विशेषज्ञों के अध्ययन से यह पहले ही स्पष्ट हो चुका है कि छोटी पन बिजली योजनाएं कम लागत पर बनने के साथ-साथ व्यय की तुलना में अध्कि बिजली रोजगार प्रदान करती हैं। उनसे न तो विस्थापन की समस्या पैदा होती है और नही पर्यावरण को क्षति पहुंचती है। नर्मदा घाटी से लेकर उत्तराखण्ड तक कई स्थानों में स्वैच्छिक स्तर पर इसका प्रयोग भी हुए है, जो कि सपफल साबित हुए हैं।

Monday, June 23, 2014

पहले ई-रिक्शा की श्रेणी तो तय करें गडकरी साहब

केन्द्रीय सड़क परिवहन, राजमार्ग और जहाजरानी मंत्राी नितिन गडकरी ने देश की परिवहन व्यवस्था को विश्व स्तरीय बनाने के लिए प्रतिब( हैं। प्रतिदिन 25 किलोमीटर सड़क का निर्माण करने के लिए भूमि अध्ग्रिहण कानून और मोटर वाहन कानून में संशोध्न उनकी प्राथमिकता है। मौजूदा मोटर वाहन कानून को अत्यंत पिछड़ा बताते हुए श्री गडकरी ने अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन और जापान की रिसर्च रिपोर्टों के अनुरूप नया मोटर वाहन कानून बनाने की बात कही है। इस कानून में 10 लाख से अध्कि आबादी वाले देश के 60 शहरों को इलैक्ट्रोनिक प्रणाली के दायरे में लाया जाएगा, जिससे कानून तोड़ने वाले के विरु( तुरंत कार्रवाही हो सकेगी।
इसके साथ ही परिवहन मंत्राी ने शहरों की आंतरिक परिवहन व्यवस्था में सुधार के लिए पं. दीन दयाल उपाध्याय के नाम से ‘दीन दयाल ई-रिक्शा योजना’ शुरू करने की घोषणा की है। इस योजना के तहत 650 वाट तक की बैटरी से संचालित इलैक्ट्रिक मोटर वाले ‘ई-रिक्शा’ चलाए जाएंगे, ये रिक्शे चार सवारी ले जा सकेंगे और उन्हें 25-25 किलो के दो नग यानी 50 किलो भार साथ ले जाने की अनुमति होगी। इन रिक्शों को चलाने के लिए किसी लाइसेंस की जरूरत नहीं होंगी। बड़े शहरों में नगर निगम और छोटे शहरों में नगर परिषद में 100 रुपए शुल्क से उनका रजिस्ट्रेशन होगा। यही नहीं ई-रिक्शा चालकों को 3 प्रतिशन ब्याज पर )ण भी उपलब्ध् कराया जाएगा। परिवहन मंत्राी का दावा है कि ‘दीन दयाल ई-रिक्शा योजना’ से लगभग 2 करोड़ लोगों का पफायदा होगा।
परिवहन मंत्राी की ये योजनाएं जब बनेंगी तब बनेंगी लेकिन उनकी इस घोषणा के बाद पिछली सरकार द्वारा अवैध् घोषित ई-रिक्शा दिल्ली की सड़कों पर बेध्ड़क दौड़ने लगे है। ई-रिक्शा के कारण हुई दुर्घटनाओं के चलते पिछली सरकार ने उन्हें अवैध् करार दिया था। केन्द्रीय परिवहन एवं भूतल मंत्रालय द्वारा गठित उच्च स्तरीय समिति की रिपोर्ट, जिसमें 80 प्रतिशत लोगों ने इस वाहन को असुरक्षित माना था, के आधर पर 24 अप्रैल 2014 को ई-रिक्शा को अवैध् घोषित कर दिया था। एक अनुमान के अनुसार दिल्ली महानगर में करीब डेड़ लाख ई-रिक्शा है। हालांकि इस वाहन को अवैध् घोषित किए जाने के बाद भी ये चोरी-छिपे चलते रहे और यातायात पुलिस उनकी ध्रपकड़ करती रही। लेकिन 17 जून को आयोजित ई-रिक्शा चालकों की रैली में श्री गडकरी द्वारा की गई घोषणा के बाद महानगर की सड़कों पर ई-रिक्शा बेध्ड़क दौड़ने लगे हैं, जबकि इस संबंध् में दिल्ली हाई-कोर्ट में दायर याचिका का अभी पफैसला आना है।
श्री गडकरी ई-रिक्शा की पैरवी करने वाले पहले राजनेता नहीं हैं। इससे पहले दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्राी अरविंद केजरीवाल ने उप राज्यपाल नजीब जंग से ई-रिक्शा को अवैध् घोषित करने वाले आदेश को वापस लेने की मांग की थी और आम आदमी पार्टी के तीन विधयकों ने हजारों ई-रिक्शा चालकों को लेकर उप राज्यपाल सचिवालय के बाहर प्रदर्शन भी किया था। लेकिन आम आदमी पार्टी द्वारा प्रचारित इस मुद्दे को हथियाने की होड़ में लगे भाजपा नेताओं द्वारा आयोजित ई-रिक्शा चालकों की रैली को संबोध्ति करते हुए परिवहन मंत्राी यह भी भूल गए कि जो बात वह कह रहे हैं वह कानून सम्मत है भी या नहीं।
पिछले दो दशकों से देशभर में ‘समान सड़क अध्किार’ के लिए संघर्षरत एवं इंस्टीट्यूट पफाॅर डेमोंक्रेसी एण्ड ससटेंनेब्लीटी के निदेशक डाॅ. राजेन्द्र रवि कहते हैं, ‘‘गडकरी साहब ई-रिक्शा के बारे में गैर कानूनी बात कह रहे हैं।  एक ओर वह नया मोटर वाहन कानून बनाने की बात करते हैं और दूसरी ओर ई-रिक्शा का स्टेट्स तय किए बिना उसमें कोई रोक न लगाने की घोषणा करते हैं।’’
डाॅ. रवि कहते हैं कि असली मुद्दा ई-रिक्शा की श्रेणी को लेकर है यानी उसके एन.एम.वी. ;गैर मोटर वाहनद्ध की श्रेणी में होने या न होने का है। यदि वह मोटर वाहन है तो निश्चित ही उसकी स्पीड होगी, स्पीड है तो दुर्घटनाओंकी संभावनाएं, आकलन और बचाव के पैरामीटर होंगे। किसी भी मोटर वाहन को चलाने के लिए लाइसेंस देते समय इन्हीं बातों को ध्यान में रखा जाता है। साइकिल रिक्शा और आॅटो रिक्शा के बीच भी यही पफर्क है। ई-रिक्शा किस श्रेणी में आता है, यह अभी तक यह नहीं है। पिछली सरकार ने जब ई-रिक्शा को अवैध् घोषित किया था तो 250 वाट की बैटरी से चलने वाले ई-रिक्शा की स्पीड 30 किमी प्रति घंटा बताई गई थी। दिल्ली की सड़कों में सार्वजनिक बसों की स्पीड भी लगभग इतनी ही रहती है। जबकि श्री गडकरी 650 वाट की बैटरी तक के ई-रिक्शा को बिना किसी लाइसेंस से और सामान्य रजिस्टेªशन से चलाने की बात कह रहे हैं। यों भी देश में सड़क दुर्घटनाएं एक बड़ी चिंता का कारण रही हैं। इससे शहरों में सड़क दुर्घटनाएं और बढ़ जाएंगी और कानून तोड़ने वाले जिम्मेदार लोगों को सजा दे पाना भी मुश्किल होगा।
दूसरा सवाल रोजगार के अवसरों को लेकर है। श्री गडकरी का दावा है कि ‘दीन दयाल ई-रिक्शा योजना’ से देशभर में दो करोड़ लोगों का पफायदा होगा। सामान्य सी बात है, एक साइकिल रिक्शा मुख्यतः दो और मुश्किल से तीन सवारी लेकर चलता है जबकि ई-रिक्शा कम से कम चार और सामान्यतः 7 सवारी लेता है। स्पष्ट है कि जहां 100 साइकिल रिक्शा चलते हैं उन्हें हटा दिया जाए तो वहां 50 से कम ई-रिक्शा रह जाएंगे। इसके साथ साइकिल रिक्शों का निर्माण छोटे स्तर पर होता है, जिसमें श्रम शक्ति का अध्कि उपयोग होता है और अध्कि लोगों को रोजगार मिलता है। ई-रिक्शा बड़ी कंपनियां बनाएंगी जो कि मोटर और बैटरी बनाती हैं। यानी रोजगार के अवसरों में दोहरी कटौती।
तीसरा मसला रिक्शों का इस्तेमाल करने वाले लोगों की सुविध का है। रिक्शे का इस्तेमाल लोग मुख्यतः बस स्टाॅप या रेलवे/ मेट्रो स्टेशन से अपने गंतव्य - घर, दफ्रतर आदि तक के लिए करते हैं। साइकिल रिक्शा चूंकि दो सवारी लेकर चलता है, एक सवारी होने पर वह अध्कितम दोगुना किराये पर कहीं भी आ या जा सकता है। ई-रिक्शा पहले तो अकेली सवारी लेगा नहीं यदि लेगा तो 4 से 6 गुना अध्कि किराए की मांग करेगा। ऐसी स्थिति में लोग या तो पैदल जाना चाहेंगे या पिफर आॅटो रिक्शा लेंगे जो कि ई-रिक्शा से अध्कि आरामदायक और सुरक्षित है।
चूंकि गडकरी साहब देश की परिवहन व्यवस्था को विश्व स्तरीय बनाना चाहते हैं और शहरों से पिछली सदी के प्रतीक साइकिल रिक्शा को हटाना चाहते हैं तो वह ‘दीन दयाल ई-रिक्शा योजना’ के तहत देशभर में ई-रिक्शा चला सकते हैं। लेकिन इससे न तो आए दिन होने वाली सड़क दुर्घटनाओं में कमी आने वाली है न रोजगार के अवसर बढ़ने वाले हैं और न ही रिक्शे की सवारी करने वाले लोगों की सुविध में बढ़ोत्तरी होने वाली है। इसी तरह का एक प्रयोग दिल्ली की सड़कों से साइकिल रिक्शों को हटाने के लिए शीला दीक्षित सरकार ने ‘इंवायरमेंट प्रफैडली’ रिक्शा चलाकर की थी। उसमें भी बैटरी से चलने वाली मोटर लगी थी लेकिन वह योजना कारगर नहीं हुई। देखना यह है कि नई सरकार की देशव्यापी ई-रिक्शा योजना कितनी कारगर हो पाती है।

Thursday, June 19, 2014

राजनैतिक टकराव को आमंत्रित करता राज्यपालों को पद छोड़ने का आदेश

यह तो पहले से ही कहा जा रहा था कि प्रधनमंत्राी नरेन्द्र मोदी किसी पर भरोसा नहीं करते, वह शासन अपने मजबूत हाथों से चलाते हैं। यूपीए सरकार द्वारा नियुक्त राज्यपालों को अपने पद से इस्तीपफा देने के आदेश से इसी बात की पुष्टि होती है। यद्यपि यह आदेश गृह सचिव अनिल गोस्वामी ने मौखिक रूप में दिया है परंतु इसके पीछे प्रधनमंत्राी की ही इच्छा बताई जा रही है। चर्चा है कि मोदी सरकार को यूपीए सरकार द्वारा नियुक्त राज्यपालों पर भरोसा नहीं है इसी कारण उन्हें पछ छोड़ने को कहा गया है।
इस आदेश के आधर पर उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बी. एल. जोशी और छत्तीसगढ़ के राज्यपाल शेखर दत्त ने इस्तीपफा दे दिया है जबकि पंजाब के राज्यपाल शिवराज पाटिल, पं. बंगाल के एम. के. नारायणन, असम के जे. बी. पटनायक, केरल की राज्यपाल शीला दीक्षित, राजस्थान की मारग्रेट अलवा, गुजरात की कमला बेनीवाल, त्रिपुरा के देवेन्द्र कांेवर ने इस्तीपफा देने से इंकार कर दिया है तो महाराष्ट्र के राज्यपाल शंकर नारायणन और कर्नाटक के राज्यपाल हंसराज भारद्वाज ने उचित प्राध्किार से आदेश मिलने पर विचार करने की बात कही है। इससे राज्यपालों को हटाए जाने और उनकी नियुक्ति को लेकर राजनैतिक टकराव की आशंका बढ़ गई है।
केन्द्र में सरकार बदलने पर पूर्ववर्ती सरकार द्वारा नियुक्त राज्यपालों को उनके पद से हटाना और नए राज्यपालों की नियुक्त नई बात नहीं है। 1977 में पहली बार केन्द्र में सत्ता परिवर्तन के साथ ही इसकी शुरूआत हो गई थी, जो आज एक परंपरा सी बन गई है। वर्तमान मोदी सरकार ने पांच राज्यों के राज्यपालों के इस्तीपफे मांगकर उसी परंपरा का निर्वाह किया है। संविधन मर्मज्ञों और विरोधी दलों के नेताओं ने विरोध् किया है और सरकारिया आयोग का हवाला देते हुए इसे संवैधनिक व्यवस्था से छेड़छाड़ बताया है।
ज्ञात हो कि भारत की संघीय व्यवस्था में राज्यपाल का पद संवैधनिक है। वह राज्य में संघ का प्रतिनिध्त्वि करता है और राज्य में कार्यपालिका का सर्वोच्च अध्किारी होता है, जिसकी नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और वह केन्द्र सरकार द्वारा नामित व्यक्ति होता है। सामान्यतः राज्यपाल की पदावध् िपांच वर्ष होती है जबकि स्वयं राज्यपाल अपने पद से इस्तीपफा दे सकता है अथवा राष्ट्रपति उसे पद से हटा सकता है। राज्यपाल को राज्य में कार्यपालिका, विधायी, वित्तीय और न्यायिक ;मृत्युदंड को छोड़करद्ध अध्किार प्राप्त होते हैं। राज्यपाल इन अध्किारों का उपयोग राज्य मंत्रिमंडल की सलाह पर, केन्द्र सरकार के निर्देश पर या स्वविवेक से करता है। भारत का कोई भी नागरिक जिसकी उम्र 35 वर्ष हो देश के किसी भी राज्य का राज्यपाल हो सकता है, प्रशासनिक सक्षमता और निष्पक्षता एक राज्यपाल की बुनियादी परंतु अघोषित योग्यता मानी जाती है।
राज्यपाल की इस संवैधनिक स्थिति का उपयोग केन्द्र सरकार अपने राजनैतिक हितों की पूर्ति के करने लगी है। आपातकाल के दौरान इंदिरा गांध्ी द्वारा अपनी ही पार्टी की राज्य सरकारों एवं मुख्यमंत्रियों के विरु( जमकर राज्यपालों का इस्तेमाल किया। नतीजतन 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने पर ऐसे राज्यपालों को पदच्युत कर दिया गया जो इंदिरा गांध्ी की कठपुतली कहे जाते थे। इसकी पुनरावृति 1980 में इंदिरा गांध्ी की सत्ता में वापसी के बाद हुई। इसके साथ ही राज्यपाल का पद विरोध्ी पार्टी विरोध्ी पार्टी द्वारा शासित राज्य सरकार को अस्थिरकर राजनैतिक उठापटक का माध्यम बन गया। दल-बदल विरोध्ी कानून बनने के बाद इसमें कुछ कमी जरूर आई लेकिन राज्यपालों पर केन्द्र सरकार का नियंत्राण समाप्त नहीं हुआ।
इसी बीच जब कई राज्यों के राज्यपालों ने अपने पदाध्किारों का उपयोग स्वविवेक अथवा राज्य के मंत्रिमंडल की सलाह पर करना शुरू किया तो केन्द्र सरकार ने अपनी पार्टी के निष्ठावान नेताओं को राज्यपाल बनाना शुरू कर दिया। इसी क्रम में ऐसे नेताओं को राज्यपाल बनाने की परंपरा की शुरूआत हुई जिन्हें सत्तारूढ़ पार्टी केन्द्रीय कैबनेट में शामिल नहीं कर पाती। यह प्रवृति पार्टी के निष्ठावान नेताओं का पुनर्वास और उन पर पार्टी की अनुकंपा कही जाने लगी।  मोदी सरकार द्वारा जिन राज्यपालों को पद छोड़ने के लिए कहा गया है और उनके स्थान पर भाजपा के जिन नेताओं को राज्यपाल नियुक्त किए जाने की चर्चा है वे सभी इसी श्रेणी में आते हैं।
राज्यपालों को उनका कार्यकाल पूरा होने से पहले पद से हटाने के मोदी सरकार के इस पफैसले का पिछली सरकार द्वारा ऐसा किए जाने की अपेक्षा इसका विरोध् अध्कि हो रहा है तो इसके दो कारण है। एक स्वयं प्रधनमंत्राी नरेन्द्र मोदी और दूसरा सर्वोच्च न्यायालय का वह पफैसला है जिसमें राज्यपालों को मनमाने तरीके न हटाए जाने की बात कही गई है। लोकसभा चुनाव के दौरान श्री मोदी ने बार-बार ‘नई राजनैतिक संस्कृति’ का विकास करने का दावा कर रहे थे। इसी कारण कांग्रेसी राजनीति से उफब चुकी युवा पीढ़ी उनके समर्थन में आगे आई थी। लेकिन प्रधनमंत्राी बनने के बाद उसी राजनैतिक संस्कृतिक को आगे बड़ा रहे हैं जिसका वह कड़ा विरोध् करते रहे हैं।
दूसरी बात, 2004 में जब यूपीए बनने पर एनडीए सरकार द्वारा नियुक्त तीन राज्यपालों को हटा दिया था तो इसके विरु( भाजपा नेता ओ. पी. सिंघल ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी, 2010 में उस याचिका पफैसला सुनाते हुए सर्वाेच्च न्यायालय ने राज्यपालों को पद से हटाए जाने के ठोस और वैध् कारण होने की बात कही थी। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पैफसले में कहा था कि केन्द्र सरकार किसी भी राज्यपाल को उसका कार्यकाल पूरा होने से पहले केवल दुराचरण और अनियमितता के मामले में हटा सकती है। लेकिन गुजरात दंगों के मामले में न्यायालय के पफैसले का सम्मान करने की बात कहने वाले श्री मोदी का ध्यान इतने महत्वपूर्ण पफैसले की ओर नहीं गया।
बहरहाल, मोदी सरकार के इस पफैसले से एक राजनैतिक टकराव की आशंका बढ़ गई है। एक ओर भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं, जिनमें कल्याण सिंह, केसरीनाथ त्रिपाठी, यशवंत सिन्हा, कैलाश जोशी, बलराम दास टंडन आदि शामिल हैं, को राज्यपाल नियुक्त किए जाने की चर्चा है। ये नेता न केवल अपने-अपने राज्यों में प्रभावी है बल्कि पार्टी हाईकमान को भी प्रभावित करते हैं। जिस तरह गृहमंत्राी राजनाथ सिंह ने राज्यपालों को पद छोड़ने का तर्क दिया है इससे स्पष्ट होता है कि सरकार पर भाजपा अपने वरिष्ठ नेताओं को राज्यपाल बनाए जाने का दबाव बना हुआ है। दूसरी ओर यूपीए सरकार द्वारा नियुक्त अध्कितर राज्यपालों ने इस्तीपफा देने से इंकार करते हुए कहा है कि केन्द्र सरकार चाहे तो उन्हें बर्खास्त कर सकती है। इसी बीच कई राज्यपालों ने राष्ट्रपति से मुलाकात भी की है। राष्ट्रपति से मुलाकात करने के बाद उन्होंने स्पष्ट कहा है कि वे इस्तीपफा देने को तैयार नहीं हैं।
ध्यान देने की बात यह भी है कि सरकारिया आयोग की सिपफारिशें, सर्वोच्च न्यायालय का पफैसला और संविधन मर्मज्ञों की राय राज्यपालों को हटाए जाने के विरु( हंै। ऐसी स्थिति में महामहिम राष्ट्रपति केन्द्र सरकार की सिपफारिश को मान ही लेंगे कहना कठिन है। स्वतंत्रा भारत के इतिहास में ऐसा कई बार हुआ भी है कि जबकि महामहिम राष्ट्रपति ने केन्द्र सरकार की सिपफारिशों को मानने से इंकार किया है। इस समय देश की जनता प्रधानमंत्राी नरेन्द्र मोदी से कई उम्मीदें लगाए हुए है। उनके समर्थक ही नहीं विरोध्ी भी उनके भ्रष्टाचार, महंगाई और बेरोजगारी से मुक्ति दिलाने वाली और सुशासन कायम करने वाले दावे की अमलीजामा पहनाते हुए देखना चाहते हैं। ऐसी स्थिति में अनावश्यक संवैधानिक टकराव सरकार के प्रति अविश्वसनीयता को ही बढ़ाएगा। लिहाजा मोदी सरकार को राज्यपालों को उनके पद से हटाए जाने के बजाय राज्यपालों की नियुक्ति के तरीकों को दुरुस्त करना चाहिए। यही संविधन के मर्मज्ञ, पूर्व राज्यपाल और राजनीति के जानकार भी चाहते हैं।

Tuesday, August 2, 2011

डिप्रेशन के शिकार भारत में सबसे अध्कि

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में सबसे ज्यादा डिप्रेशन (अवसाद) के शिकार भारत में हैं। डिप्रेशन के मामले में भारत ने दुनिया के सभी देशों को पछाड़ कर टॉप किया है। वैसे खबर तो दिल दुखाने वाली हैं लेकिन जानना भी जरूरी है कि आखिर हम लोग क्यों इतना डिप्रेशन में हैं। यह हर भारतीय के लिए चिंता का विषय है कि आखिर क्यों हम इतना डिप्रेशन में।
विशेषज्ञों के अनुसार खर्चों की लंबी होती लिस्ट और जेब में आते कम पैसे तनाव का अहम् कारण है। हर आदमी इसी फिक्र में मरा जा रहा है कि सैलरी कम क्यों है और खर्च कम कैसे करें। दूसरी तरफ बेरोजगार आदमी की अपनी टेंशन है। काम मिलता नहीं, लेकिन पेट रोटी मांगता है। सरकार की रोजगार देने की योजनाएं महज दिखावा साबित होती हैं जब बेरोजगार आदमी की ट्रेन से कटकर मरने की खबर आती है।
इस मुद्दे को हलके में लेने का प्रयास न करें। ट्रैफिक जाम भारत के हर दूसरे व्यक्ति को जानलेवा लगता है। जाम में फंसे आदमी का हर पल तीन घंटे के समान गुजरता है। जाम में फंसकर कई योजनाएं दम तोड़ देती हैं। कई डील हाथ से निकल जाती हैं। प्यार की पुकार पर दौड़ा जा रहा प्रेमी जाम की चपेट में आकर असहाय महसूस करता है। सर्वे कहता है कि नौकरी पेशा आदमी अपने जीवन के 7 साल ट्रैफिक जाम में गुजार देता है।
गैस का कनेक्शन चाहिए या ड्राइविंग लाइसेंस। हर जगह घूस की मारामारी। सरकारी अफसर के पल्ले पड़कर डिप्रेशन का शिकार होना तय है। भारत के सरकारी कर्मचारी उस कीड़े की तरह हैं जो रुक-रुक कर काटता है और लगातार खून चूसता रहता है। अगर सरकारी कार्यालयों में एक बार जाने पर ही काम हो जाए तो हमारे जीवन के 1300 दिन बचेंगे।

Monday, March 7, 2011

सही उपचार से ही शत-प्रतिशत स्वस्थ रह सकता है मनुष्य

कोई भी व्यक्ति सिर्फ एक रोग का उपचार करके पूरी तरह स्वस्थ नहीं हो सकता। इसके लिए रोग के कारणों को पूरी तरह समाप्त करना होता है, बाहरी ही नहीं रोग के अन्दरूनी को भी समाप्त करना पड़ता है, तभी मनुष्य शत-प्रतिशत स्वस्थ होकर जीवन यापन कर सकता है।

यह कथन अत्याधुनिक स्वास्थ्य शिक्षा की डिग्री प्राप्त किसी विशेषज्ञ डॉक्टर का नहीं बल्कि अनौपचारिक रूप में होम्योपैथी के अनुसंधानकर्ता श्री सागर का है। हालांकि लोग उन्हें डॉक्टर साहब कहकर संबोधित करते हैं लेकिन वह जब भी किसी व्यक्ति का उपचार करते हैं तो स्वयं स्पष्ट शब्दों मंें लोगों को बता देते हैं कि वह कोई डिग्री या डिप्लोमधारी डॉक्टर नहीं हैं। वस्तुतः उन्होंने पिछले एक दशक के दौरान कैंसर, अल्सर, ऑर्थोपैडिक आदि बीमारियों से ग्रस्त ऐसे रोगियों का सफलतापूर्वक उपचार किया है, जिनके बारे में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), आर.आर. हॉस्पीटल, इन्द्रप्रस्थ अपोलो आदि प्रतिष्ठित और सुविधा संपन्न अस्पतालों के विशेषज्ञों ने हाथ खड़े कर दिए थे। स्वाभाविक रूप में ऐसे लोग उन्हें ‘भगवान’ मानते हैं।

हम बात कर रहे हैं, बिहार के मधेपुरा जिले के सिंहेश्वर स्थान में जन्मे 33 वर्षीय सागर की, जो वर्तमान समय में शिक्षा मंत्रालय में लिपिक पद पर कार्यरत हैं और पिछले 15-16 सालों से होम्योपैथी पर अनुसंधान कर रहे हैं। इस बीच उन्होंने दर्जनों असाध्य रोगों से ग्रस्त लोगों का उपचारकर उन्हें नया जीवन दिया है।

होम्योपैथी के प्रति अपने लगाव के बारे में बताते हुए सागर कहते हैं, ‘‘ जब मैं 9-10 में पढ़ता था तो हमारे पड़ोस के कुछ बच्चों को जौंडिस (पीलिया) हो गया था, उसका असर इतना अधिक था कि पटना, दिल्ली और मुंबई में उपचार के लिए ले जाने के बाद भी उन्हें नहीं बचाया जा सका। तब मेरे मन में यह विचार उठा था कि मुझे ऐसे बच्चों के लिए कुछ करना चाहिए। लेकिन उसी दौरान मेरी तबियत खराब हो गई, मैं भयंकर रूप से बीमार पड़ गया। मेरी बीमारी को डॉक्टरों ने लाइलाज बता दिया था। पिताजी (वीरेन्द्र मिश्र) होम्योपैथी के जानकार थे, उन्होंने कोलकाता से इसकी शिक्षा ली थी और निरंतर उसके अनुसंधान में लगे रहते थे। पिताजी ने स्वयं मेरा इलाज करना शुरू किया। उससे मेरे स्वास्थ्य में कुछ सुधार तो हुआ। लेकिन मैं पूरी तरह स्वस्थ नहीं हो सका। मैं अपने ऊपर होम्योपैथी दवाइयों की आजमाईश करने लगा, जिससे मेरी स्थिति कई बार जटिल हो जाती थी। धीरे-धीरे मैंने पिताजी से दवाइयों की कंपोजिशन सीख ली और उनका अपने ऊपर ही प्रयोग करने लगा।

इस तरह सागर करीब 7-8 वर्षों तक होम्योपैथी का प्रयोग अपने ऊपर करते रहे। इससे उन्हें इस बात का अहसास हुआ कि कोई भी बीमारी एक रोग के उपचार से ठीक नहीं हो सकती। वर्ष 2000 में वह एसएससी परीक्षा उत्तीर्णकर शिक्षा मंत्रालय में नियुक्त होग ये तो उन्होंने होम्योपैथी के अनुसंधान को तेजकर दिया। साथ वह अब अपने अध्ययन और प्रयोग को अमल में लाने पर विचार करने लगे।

अपने पहले उपचार के बारे में बताते हुए सागर कहते हैं, ‘‘ करीब 9 वर्ष पहले एक मित्र के माध्यम से उनकी मुलोकात दिल्ली कैंट में रहने वाली बाला देवी से हुई, तब उनकी उम्र 35 वर्ष थी। बाला देवी अल्सर से पीड़ित थीं, उस समय उन्हें 15 दिनों से भयंकर बुखार था। मैंने उन्हें एक खुराक खाने को दी, ककरीब आधे घंटे में उनका बुखार उतर गया। उनकी बीमारी को आर. आर. हॉस्पीटल के डॉक्टरों ने लाइलाज बता दिया था, उनके पति बुरी तरह नाउम्मीद हो गये थे। उन्होंने मेरे से अपनी पत्नी का उपचार करने को कहा। मैंने अपने बारे में उन्हें सबकुछ बताया और कहा कि मैं कोई डॉक्टर नहीं हूॅं, दवइयों को गलत असर भी हो सकता है। उन्होंने इसकी जिम्मेदारी अपने ऊपर ली और मैंने बाला देवी का उपचार शुरू कर दिया। दो वर्ष तक उन पर मौत का छाया बना रहा। धीरे-धीरे दवाइयों का असर होने लगा और वह स्वथ होने लगी। आज वह न केवल जीवित हैं बल्कि स्वस्थ भी हैं। उसके बद मैंने अल्सर सेपीड़ित उनकी बेटी और मानसिक रोग से ग्रस्त उनके बेटे का उपचार किया वे दोनों आज पूरी तरह स्वस्थ हैं।

आप किन बीमारियों का उपचार करते हैं? यह पूछने पर सागर कहते हैं, ‘‘ उपचार ते मैं सभी बीमारियों का करता हूॅं लेकिन मेरे पास अधिकतर वे ही रोगी आते हैं जिनका रोग असाध्य स्थिति में पहुंच गया हो और बड़े-बड़े अस्पतालों ने हाथ खड़े कर दिये हों।
रोगी के डाइग्नोसिस और उपचार के तरीकों के बारे में सागर कहते हैं, ‘‘ मेरे पास रोगी तमाम अस्पतालों की ठोकरें खाने और जीवन से नाउम्मीद होने के बाद आते हैं। मुझे उनके मनोभावों, शरीर के रूप-रंग और अंगों की दशा से रोग को समझने में कठिनाई नहीं होती है। मैं उपचार के लिए अधिक दवाएं भी नहीं देता। पहली बार स्वयं देने के बाद 40-45 दिन तक कोई दवा नहीं देता, आगे भी यह क्रम बना ही रहता है।

आश्चर्य की बात तो यह है कि असाध्य रोगों का उपचार करने और रोगियों को नया जीवन देने के बावजूद सागर किसी रोगी से कोई शुल्क (फीस) नहीं लेते। यहॉं तक कि दवाइयों का व्यय भी स्वयं करते हैं। सागर कहते हैं, ‘‘ मैं चाहता हूॅं कि सभी स्वस्थ जीवन यापन करें। सही उपचार और रोग के कारणों को खत्म करके मनुष्य शत-प्रतिशत स्वस्थ रह सकता है। मेरा सपना एक ऐसा स्वास्थ्य केन्द्र खोलने का है जहॉं विभिन्न रोगों और उनके निदान के लिए अनुसंधान हो और प्रत्येक व्यक्ति को निःशुल्क न सही न्यूनतम शुल्क में स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध हो सके।

Monday, October 4, 2010

अनियमित जीवन यापन से बढ़ रही है हड्डी रोग की समस्या: डॉ. एस.एस.रावत

टेबल वर्क की अधिकता ए.सी. में बैठना, ए.सी. गाड़ियों में सफर करना, अनियमित दिनचर्या, एक्सरसाइज न करना आदि के कारण शहरी युवाओं में कमरदर्द की समस्या चिंताजनक गति से बढ़ रही है। यह कथन है हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. एस.एस. रावत का। 1995 में एम.एल.बी. मेडिकल कॉलेज, झांसी से एम.एस. (आर्थो) डॉ. एस.एस. रावत करीब 3 साल तक दिल्ली के प्रतिष्ठित अस्पतालों, गुरु तेगबहादुर, बत्रा और इन्द्रप्रस्थ अपोलो मंे बतौर रेजीडेंट डॉक्टर कार्य कर चुके हैं। 1998 में उन्होंने सेक्टर-10, नोएडा में रावत आर्थो क्लीनिक नाम से क्लीनिक खोला। आज इसी नाम से मयूर विहार-3, दिल्ली में भी एक क्लीनिक चला रहे हैं और भारद्वाज और कैलाश अस्पतालों मंे ‘विजिटिंग कंसल्टेंट’ के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। डॉ. रावत का कहना है कि यदि मनुष्य सादगीपूर्ण और अनुशासित जीवन यापन करें तो 80 वर्ष की उम्र तक स्वस्थ और सुखी जीवन यापन कर सकता है। प्रस्तुत है डॉ. एस.एस. रावत से इन्द्रचन्द रजवार की बातचीत के मुख्य अंशः-

हड्डियों के मुख्य रोग कौन-कौन से है ?
ज्यादातर कमर का दर्द, जोड़ों का दर्द और सरवाइकल स्पांडालाइसिस हड्डियों के रोगों से संबंधित कॉमन प्राब्लम है।

ये तो हड्डियों के रोगों के कारण होने वाली परेशानियां हैं, वे रोग कौन-कौन से है, जिनके कारण ये परेशानियां होती है?
हड्डीरोगों में कुछ तो पैदाइशी होते हैं, कुछ उम्र के साथ पैदा होते हैं और कुछ अनियमित जीवन यापन के कारण होते हैं।

पैदाइशी हड्डीरोग कौन-कौन से हैं ?
हड्डियों से जुड़ी पैदाइशी विकृति जिसे ‘कंजाइटेल डिस आर्डर कहा जाता है, इनमेें क्लब फुट मुख्य बीमारी है, इसमें बच्चे पैदा होते समय पंजे टेढ़े होते हैं, पांच की जगह 6 अंगुलियां होती हैं या दो अंगुलियां आपस में जुड़ी होती हैं। क्लवफुट से संबंधित हड्डीरोगों का ऑपरेशन से उपचार किया जाता है।

उम्र के साथ पैदा होने वाले हड्डी रोग कौन से है ?
इसे ओस्टियो प्रोसेसिस कहा जाता है। शरीर में कैल्सियम की कमी के कारण ओस्टियो प्रोससिस बढ़ जाता है, इसमें हड्डियों में दर्द रहने लगता है। आमतौर पर यह 50 की उम्र में शुरू होता है। महिलाओं में 45 वर्ष के आसपास शुरू हो जाता है।

ओस्टियो प्रोसेसिस का क्या परिणाम होता है?
कैल्सियम की कमी और लगातार हड्डियों में दर्द रहने से रीढ़ की हड्डियों के पिचकने के आसार बढ़ जाते हैं। छोटी सी चोट पर हड्डियां टूट जाती हैं। कुछ लोगों का कूबड़ भी इसी कारण से निकल आता है।

इसके अलावा कौन सी बीमारी उम्र के साथ पैदा होती है ?
ओस्टो आर्थराइटिस नाम की एक और हड्डियों की बीमारी है जो उम्र बढ़ने के साथ-साथ पैदा होती है, लेकिन अब यह कम उम्र के लोगों को भी होने लगी है। मुख्यतः शहरी युवाओं की जीवन शैली में आए बदलाव, जैसे-टेबल वर्क की अधिकता, ए.सी. में बैठने, ए.सी. गाड़ियों में यात्रा करने, अनियमित दिनचर्या, एक्सरसाइज का न होना, समय पर और पौष्टिक भोजन का न होना आदि कारणों से कमर दर्द रहने लगता है जो हड्डीरोग का लक्षण है। मोटापा बढ़ने से भी ओस्टो आर्थराइटिस होता है।

सरवाइकल स्पांडालाइसिस क्या है ?
सामान्य बोलचाल की भाषा में इसे रीढ़ की हड्डी का रोग कहा जाता है। अनियमित दिनचर्या के कारण 35-40 साल की उम्र के बाद रीढ़ की हड्डियां बढ़ने लगती हैं तो सरवाइकल स्पांजलाइसिस पैदा होता है। इधर युवाओं में कमर दर्द की बीमारी-ऑस्टो आर्थराइटिस के बाद सरवाइकल स्पांडालाइसिस की समस्या सबसे अधिक बढ़ी है।

क्या संक्रमण के कारण भी हड्डी रोग पैदा होते हैं ?
संक्रमण से पैदा होने वाले हड्डी रोगों को ऑस्टो मालाइसिस कहा जाता है जो मुख्यतः टी.बी. (क्षय रोग) और वैक्टीरिया के संक्रमण से होते हैं। बच्चों मंे हड्डियों का इंफैक्शन अधिक होता है। चोट लगने पर मालिश करने से वैक्टीरिया पैदा होते हैं जो हड्डीरोग का कारण बन जाते हैं।

हड्डीरोगों के मामले में देश में कितने लोगों को चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध है ?
हड्डीरोगों का अलग से आकलन नहीं किया जा सकता। सभी तरह की चिकित्सा सुविधाओं की स्थिति एक जैसी है, जो शहरों और महानगरों मंे पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं, यहां अच्छे सरकारी और प्राइवेट हॉस्पीटल और प्रशिक्षित डॉक्टर हैं और लगभग हर एक बीमारी का उपचार है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। कहीं-कहीं तो 10-12 लाख की आबादी में 10-12 विशेषज्ञ डॉक्टर भी नहीं हैं।

हड्डीरोगों से बचाव कैसे किया जा सकता है ?
अनुशासित और सादगीपूर्ण जीवन यापन हर तरह की बीमारी का बचाव है। यदि मनुष्य सादगीपूर्ण तरीके से रहे-पौष्टिक भोजन करे, नियमित रहकर जीवन यापन कर सकता है। जहां हड्डीरोग की बात है जिन लोगों को जोड़ों में दर्द रहता है, उन्हें ठंड से बचना चाहिए और चोट लगने पर मालिश नहीं करना चाहिए।

एक डॉक्टर होने के साथ आप अपनी सामाजिक भूमिका को किस रूप में देखते हैं ?
मैं व्यावसायिक फायदे के लिए किसी भी गरीब मरीज का इलाज करने से इंकार नहीं कर सकता। इसके अलावा मैं सेरेब्रल पाल्सी वाले मरीजों से कोई फीस नहीं लेता, निःशुल्क उपचार करता हूँ और साल में एक बार निःशुल्क चिकित्सा जांच शिविर का आयोजन करता हूं।