भारत, भले ही दुनिया की पांचवी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया हो और और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित तमाम अर्थशास्त्री आने वाले पांच सालों में दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने का दावा कर रहे हों लेकिन अभी भी देश की बहुत बड़ी आबादी के सामने आज भी भूख सबसे बड़ी चुनौती है। इसका खुलासा 12 अक्टूबर को जारी ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) अर्थात वैश्विक भूख सूचकांक से भी हुआ है।
जीएचआई-2023 के आंकड़ों के अनुसार दुनिया के 125 देशों की सूची में भारत 111वें स्थान पर है, जबकि भारत के पड़ोसी देशों की स्थिति बेहतर है। सूची में पाकिस्तान की रैंकिंग 102, बांग्लादेश की 81, नेपाल की 69 और श्रीलंका की 60 है। यही नहीं भारत की रैंकिग में लगातार तीसरे साल गिरावट दर्ज की गई है। 2022 में 121 देशों की सूची में भारत 107 स्थान पर और 2021 में 101वें स्थान पर था। दस वर्ष पूर्व 2013 में इस सूची में भारत की रैंकिंग 66 थी।
ज्ञात हो कि जर्मनी स्थित कंसर्न वर्ल्डवाइड और वर्ल्ड हंगर हेल्प नामक अंतरराष्ट्रीय स्वैच्छिक संस्था (एनजीओ) द्वारा हर साल 4 सूचकों (इंडीकेटर) के आधार पर गलोबल हंगर इंडेक्स को तैयार किया जाता है, जिनमें से इस इंडेक्स के चार में से तीन इंडिकेटर बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़े होते हैं और चौथा एवं सबसे महत्वपूर्ण इंडिकेटर ओपिनियन पोल पर आधारित होता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में बच्चों की
कमजोरी की दर 18.7 प्रतिशत दुनिया में सबसे ज्यादा है। यह अति
कुपोषण को दर्शाती है। दूसरा इंडीकेटर बच्चों के अल्पपोषण का है, इस
कारण बच्चे बीमार हो जाते हैं और उनकी अल्पायु में बच्चों की मृत्जिसमें दर 16.6
प्रतिशत बच्चे अल्पोषण के कारण बीमार रहते हैं और 3.1 प्रतिशत बच्चे
पांच वर्ष से कम उम्र में मृत्यु हो जाती है। तीसरा सूचकांक 15 से
24 वर्ष उम्र की लड़कियां एवं महिलाओं में खून की कमी यानी एनीमिया को
लेकर है, भारत में इस उम्र की 58.1 प्रतिशत लड़कियां एवं महिलाएं इस
समस्या का सामना कर रही है।
हालांकि भारत सरकार ने इस रिपोर्ट को गलत और और
भ्रामक बताते हुए कहा है कि ग्लोबल
हंगर इंडेक्स भारत की वास्तविक स्थिति को नहीं दर्शाता है और इसमें भारत की छवि
खराब करने का प्रयास किया गया है। ज्ञात हो कि भारत सरकार ने जीएचआई-2022 की
रिपोर्ट पर भी सवाल उठाए थे। तब सरकार ने कहा था कि गलत जानकारी देना ग्लोबल हंगर
इंडेक्स का हॉलमार्क लगता है। भारत को ऐसे देश के रूप में दिखाया जा रहा है जो
अपनी आबादी के लिए फूड सिक्योरिटी और पोषण की जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रहा है।
भारत सरकार का तर्क अपनी जगह है, लेकिन
जिस तरह भारत सरकार बीते ढाई-तीन सालों से देश की 80 करोड़ आबादी को
प्रतिव्यक्ति 5 किलो मुफ्त राशन देने का दावा कर रही है और इस
बीच देश में जिस तेजी से महंगाई और बेरोजगारी की समस्या बढ़ी है, वह
किसी से छिपा हुआ नहीं है। यही नहीं गांव-देहात से लेकर कस्बों, छोटे
शहरों और महानगरों तक में लोग सड़क किनारे अथवा घास-फूस की झोपड़ी में अपने
परिवार का भरण-पोषण करते देखे जा सकते हैं।
लेकिन वैश्विक भूख सूचकांक का आकलन इन स्थितियों को ध्यान में रखते हुए या ऐसे स्थानों का सर्वे कराकर नहीं किया जाता बल्कि संयुक्त राष्ट्र के भोजन और कृषि संगठन, विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ के उन आंकड़ों के आधार पर किया जाता है, जो उन देशों द्वारा उपलब्ध कराए जाते हैं। यही नहीं इसमें उन्ही देशों को शामिल किया जाता है जिन देशों के सभी आंकड़े संस्था को प्राप्त होते हैं।
आश्चर्य की बात तो यह है कि भारत सरकार इस कटु
सच्चाई को स्वीकार कर भूख की समस्या को हल करने के बजाय उसे विश्व समुदाय से
छिपाने का प्रयास करती रही है। वर्ष 2020 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति
डोनाल्ड ट्रंप की यात्रा के समय अहमदाबाद (गुजरात) में सड़क किनारे स्थित झुग्गियों
के आगे ऊंची दीवार इसलिए खड़ी कर दी गई थी कि ट्रंप उन झुग्गियों को न देख सकें।
हाल में देश की राजधानी दिल्ली में संपन्न जी-20 शिखर सम्मेलन के
दौरान भी झुग्गियों को उनके आगे बड़ी-बड़ी होडिंग लगाकर छिपाया गया था।
इन्द्र चन्द रजवार


0 टिप्पणियाँ