इतिहास की किताबों में पढ़ाया जाता है,
कभी भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था,
खेती-किसानी और ग्रामीण उद्योग अर्थव्यवस्था की रीढ़ थे।
गांवों की अपनी शासन व्यवस्था थी,
सामाजिक और आर्थिक जीवन की धुरी थे गांव।
समाज शास्त्र कहता है
भारत की दो-तिहाई आबादी गांवों में बसती है,
आधी आबादी की आजीविका का जरिया आज भी खेती है।
मिलट्री साइंस के मुताबिक
सेना और पुलिस बलों के सौ में नब्बे जवान
गांवों और किसान परिवारों से आते हैं।
अर्थशास्त्र की बातें विरोधाभसी हैं,
देश की औद्योगिक उत्पादन का सत्तर फीसद कृषि क्षेत्र सेे आता है
लेकिन भारत का किसान कर्ज में डूबा रहता है।
राजनीति शास्त्र के विद्वान कहते है
जाति, धर्म और क्षेत्रवाद में बंटा है भारत का मतदाता,
यही विकास की सबसे बड़ी बाधा है।
किताबी ज्ञान की सभी बातें सच हैं,
लेकिन इससे बड़ा सच इन दिनों राजधानी की सीमाओं पर पसरा पड़ा है
देश का किसान अपनी मांगों को लेकर खड़ा है।
तीन कृषि कानूनों किसान वापस लेने के लिए अड़ा है,
जिन्हें सरकार किसानों की खुशहाली का तोहफा कहती है।
सरकार के अपने तर्क हैं,
किसानों को दिल्ली आने से रोकने के लिए सड़कें खोदने से लेकर
किसानों को खालिस्तानी बताकर बदनाम करने
और कानूनों में संशोधन करने करने का आश्वासन देने तक,
कई बार बदली हैं सरकार की चालें।
किसान के अपने सवाल हैं
सरकार कहती है आंदोलन सिर्फ पंजाब और हरियाणा के किसानों का है
किसान पूछता है क्यों पजांब-हरियाणा तक सीमित रही हरित क्रांति?
क्यों बाकी देश वंचित रह गया हरित क्रांति के लाभों से?
क्यों किसान का बेटा नहीं करना चाहता खेती-किसानी?
व्यापारी, उद्यमी और नौकरीपेशा लोगों की तुलना में कितनी बढ़ी है किसान की आमदनी?
क्यों खाली हो रहे हैं देश के गांव?
कहीं यह देश को फिर से कंपनी राज के युग में धकेलने का प्रपंच तो नहीं?
सरकार हर सवाल का जवाब सत्तर साल की दुहाई देकर टाल देना चाहती है।
देश में आज भी सत्तर साल पहले कायम लोकतंत्र है,
इसका गवाह है यह किसान आंदोलन,
जहां न धर्म है न जाति और न ही क्षेत्र की सीमाएं।
लोकतंत्र में पांच साल के लिए बनती हैं सरकारें।
अपने पांच साल के शासन का हिसाब दे दे सरकार।
मान जाएंगे किसान जवान, व्यापारी उद्यमी और साहूकार
सभी नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक की गलतियां
और यकीन कर लेंगे आने वाले खुशहाल दिनों सब्जबागों पर
जो बीते छः सालों में दिखाए हैं।

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