दलीय राजनीति का अखाड़ा बनती पंचायतें


संविधान में भले ही पंचायती राज संस्थाओं के लिए दलविहीन चुनाव चुनाव प्रणाली का प्रावधान रखा गया है लेकिन पंचायतों पर दबदबा कायम करने की राजनैतिक दलों की होड़ ने पंचायती राज संस्थाओं का चुनावी राजनीति का अखाड़ा बना दिया है।

उत्तर प्रदेश में पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल समाप्त होने को है। आगामी 25 दिसंबर को ग्राम पंचायतों, 13 जनवरी, 2021 को जिला पंचायतों और 17 मार्च, 2021 को क्षेत्र पंचायतों का कार्यकाल समाप्त हो जाएगा। संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार उक्त तिथियों तीनों स्तरों पर नई पंचायतों का गठन हो जाना चाहिए। लेकिन अभी तक यह तय नहीं है कि पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव कब तक हो पाएंगे। अलबत्ता राजनैतिक दलों ने पंचायतों पर अपना दबदबा कायम करने या यों कहंे कि अपने प्रतिनिधियों को चुनाव जिताने के लिए कमर कस ली है। इसकी शुरूआत केंद्र और राज्य में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने की है। 


इधर जब पंजाब और हरियाणा सहित विभिन्न राज्यों के किसान अपनी मांगों को लेकर देश की राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर डटे हुए हैं, जिससे उत्तर प्रदेश के किसान भी अछूते नहीं हैं, तो भाजपा के उत्तर प्रदेश प्रभारी और पूर्व कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह से मुलाकात कर पंचायत चुनाव की रणनीति तैयार करने में जुट गए। प्राप्त जानकारी के अनुसार भाजपा के प्रदेश प्रभारी के निर्देशानुसार पार्टी के सभी पदाधिकारियों का योजनाबद्ध तरीके से प्रवास कार्यक्रम तय किया जाएगा, जो सभी ग्राम पंचायतों की राजनैतिक और सामाजिक स्थितियों का आकलन करेंगे। इस कार्य में पार्टी के सभी मोर्चों और प्रकोष्ठों को भी लगाया जाएगा। 

प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह ने कहा कि पार्टी के सभी कार्यकर्ता पंचायत चुनावों में जीत सुनिश्चित करने के लिए पार्टी की योजना के अनुसार जमीनी स्तर पर अपनी भूमिका का निर्वाह करेंगे। जबकि पार्टी के प्रवक्ता गजेंद्र शर्मा ने दावा किया है कि पंचायत चुनावों से पहले पार्टी राज्य में एक लाख नया नेतृत्व तैयार करेगी। 

राज्य के सभी 75 जिलों में जिला पंचायतें, 821 विकास खंडों में क्षेत्र पंचायतें और 59,162 ग्राम पंचायतें हैं। ग्राम पंचायतों में प्रधान सहित 8,01,431 क्षेत्र पंचायत के 17,576 और जिला पंचायतों के 3,112 सदस्यों का चुनाव जनता द्वारा किया जाता है। यदि ग्राम पंचायत के सदस्यों यानी वार्ड मेंबरों को छोड़़ भी दे ंतो ग्राम प्रधानों और क्षेत्र पंचायतों व जिला पंचायतों के सदस्य को अपने पाले में खड़ा कर कोई भी राजनैतिक पार्टी ग्रामीण क्षेत्रों में कितनी प्रभावी हो सकती है, इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है।

यही कारण है कि भाजपा की देखादेखी लगभग सभी राजनैतिक पार्टियों ने पंचायती राज संस्थाओं के चुनावी शतरंज में अपने प्यादे बिठाना शुरू कर दिया है। राज्य के सभी प्रमुख पार्टिया सपा, बसपा और कांग्रेस तो पहले से ही तीनों स्तरों पर अपने प्रतिनिधियों को चुनाव लड़ाने और उन्हें जिताने के लिए काम करती आई हैं। इधर आम आदमी पार्टी और चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी ने भी राज्य के सभी जिलों में जिला पंचायत सदस्य उतराने की घोषणा की है। स्पष्ट है कि वे ग्राम प्रधान और क्षेत्र पंचायत सदस्य के चुनाव लड़ने के लिए भी अपने कार्यकर्ताओं को प्रेरित करेंगे। ज्ञात हो कि जिला पंचायत के सदस्यों का चुनाव दलगत आधार पर होता है, जिसमें भाग लेने वाली पार्टियां अपने झंडे-डंडे के साथ मैदान में उतरती हैं। इसके पीछे तर्क यह दिया गया है कि जिला पंचायत क्षेत्र बड़ा होने से कोई भी उम्मीदवार व्यक्तिगत आधार पर चुनाव नहीं लड़ सकता है। जबकि पंचायती राज संस्थाओं के लिए दलविहीन चुनाव प्रणाली का प्रावधान के पीछे यह तर्क दिया गया है कि इससे निर्वाचित प्रतिनिधियों पर दलीय अनुशासन और अन्य बाध्यताओं से मुक्त होंगे और अपना ध्यान निर्वाचन क्षेत्र की समस्याओं के समाधान और उसके विकास पर रहेगा।

ऐसा नहीं है कि राजनैतिक पार्टियों ने अब तक पंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी पकड बनाने की कोशिश नहीं की है और न ही उत्तर प्रदेश में ही ऐसा होता आया है। हाल ही राजस्थान में 21 जिलों पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव हुए। तीनों ही स्तरों पर राजनैतिक पार्टियों ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अपने उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे थे। लेकिन चुनाव परिणाम सामने आने पर राजनैतिक पार्टियों ने अपनी-अपनी जीत पर खुशियां मनाई। अन्य राज्यों में भी ऐसा ही होता रहा है। यह भी स्पष्ट है कि पंचायत चुनाव में हार-जीत को केंद्र और राज्य में सत्तारूढ़ और विपक्षी पार्टियों की छवि के रूप में देखा जाता रहा है। लेकिन जिस तरह भाजपा ने उत्तर प्रदेश में पंचायतें में अपना परचम लहराने की खुली घोषणा के साथ तैयारी शुरू की है, ऐसा पहले नहीं हुआ है। यहां तक कि केरल, बंगाल, कर्नाटक, तमिलनाडु आदि राज्यों में ग्राम पंचायतों और क्षेत्र पंचायतों के चुनाव में राजनैतिक पार्टियां अपने आप को लगभग तटस्थ ही रखती हैं, इन राज्यों में पंचायती राज न केवल मजबूत है बल्कि पंचायतें बड़ी होने के साथ उनकी अपने स्रोतों से होने वाली आय भी अच्छी है। 

दलीय आधार पर पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव का सबसे बड़ा नुकसान ग्राम पंचायत स्तर पर सामाजिक सदभाव पर पड़ने वाले नुकसान के रूप में सामने आता है। चुनाव लड़ने वाले लोगों और उनके समर्थकों की पहचान दलीय आधार पर होने लगती है। सीमित निर्वाचन क्षेत्र होने से चुनाव लड़ने वाले लोग हमेशा एक-दूसरे के समक्ष होते हैं। चुनाव के बाद भी उनमें चुनावी गुटबाजी साफ दिखाई देती है। दलीय आधार पर चुनाव होने के कारण यह गुटबाजी स्थायी रूप् ले लेती है और इसका जो नकारात्मक असर योजनाओं और वित्तीय स्वीकृति पर पड़ता है वह अलग है। 


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