
मनरेगा स्कीम में श्रमिकों से काम कराने के बजाय जल्दी से काम निपटाने अथवा पैसा बचाने के लिए मशीनों का उपयोग विकास विभाग के अधिकारियों और पंचायत कर्मियों व पदाधिकारियों से को भारी पड़ सकता है। नीमच (म.प्र.) . की बमोरी पंचायत द्वारा मनरेगा योजना में स्वीकृत सुदूर सड़क निर्माण में जेसीबी व ट्रैक्टर-ट्रॉली का उपयोग किए जाने पर ऐसा ही हुआ है। जिला कलेक्टर द्वारा इस पर संज्ञान लिए जाने पर सीईओ जिला पंचायत ने इस मामले में जनपद सीईओ व पंचायत सचिव व सरपंच से जवाब मांगा है।
बमोरी पंचायत में बमोरी से भीमाखेड़ी तक 2.6 किमी सड़क मनरेगा के तहत सुदूर सड़क में स्वीकृत हुई थी। 32 लाख रुपए के लागत से बन रही इस सड़क के निर्माण में मजदूरों को रोजगार देने की बजाए मशीनों का उपयोग शुरू कर दिया। जिला कलेक्टर जितेंद्रसिंह राजे ने संज्ञान लिया तथा सीईओ भव्या मित्तल से इस मामले की जानकारी ली। सीईओ ने जनपद सीईओ मारिषा शिंदे से जवाब लिया। संबंधित पंचायत के सचिव व सरपंच को नोटिस देकर लिखित जवाब के लिए कहा। साथ ही जेसीबी द्वारा मिट्टी खनन और ट्रैक्टर-ट्रॉली मुरम डलवाने का काम बंद करा दिया गया।
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प्रशासन की लापरवाही पर पंचायत प्रतिनिधियों में गुस्सा
यों तो यह समस्या पूरे उत्तराखंड की है लेकिन इसके विरुद्ध आवाज अल्मोड़ा जिले में उठी है जहां कि कोरोना से लड़ने के लिए सरकारी तौर-तरीकों के खिलाफ पंचायत प्रतिनिधियों में असंतोष पनपने लगा है। जिले के ग्रामीण अंचलों में शहरों से लौट रहे प्रवासियों को संस्थागत क्वारंटाइन किए जाने के बजाय नमूने लेकर सीधे गांव भेज दिया जा रहा है और बाद में गांव में कोरोना पॉजिटिव पाए जाने के बाद संबंधित गांव को सील कर दिया जा रहा। इससे गांवों में संक्रमण की आशंका भी बढ़ गई है।प्रवासियों को सीधे गांव भेजे जाने पर उन्हें होम क्वारंटाइन कराने के बाद प्रधानों का स्वास्थ्य परीक्षण भी नहीं किए जाने के विरुद्ध असंतोष की शुरूआत द्वाराहाट ब्लाॅक के मल्ली बिठोली गांव से हुई है। गांव में अब तक 99 प्रवासी लौटे हैं, अभी कई और आने की सूचना है। प्रवासियों को उनके कोरोना के नमूने लेकर होम क्वारंटाइन कराने संक्रमण की आशंका के चलते गांव के प्रधान जगदीश सिंह बिष्ट ने खुद को ही क्वारंटाइन कर लिया। उनका कहना है कि सरकार ने ग्राम पंधानों को बिना संसाधन व बजट के होम क्वारंटाइन का जिम्मा सौंप दिया है। उन्हें प्रवासियों के साथ लगातार रहना होता है। मगर प्रशासन प्रधानों का ही चेकअप नहीं करा रहा। जब तक उनका टेस्ट नहीं होता, वह प्रवासियों के होम क्वारंटाइन की जिम्मेदारी नहीं लेंगे।
इस बीच, 19 जून को बग्वाली पोखर बाजार में कोरोंटाइन में प्रवासी के कोरोना पाॅजेटिव पाए जाने की खबर से लोग सकते में हैं। कोरोना संक्रमित युवक 5 दिन पहले दिल्ली से लौटा था, और होम कोरोंटाइन में रह रहा था। सरकार की इस लापरवाही के विरोध में और कोरोना संक्रमण रोकने के लिए बग्वाली पोखर के व्यापारियों ने बाजार बंद रखने का निर्णय लिया है।
द्वाराहाट क्षेत्र की इन घटनाओं की पूरे जिले में तीखी प्रतिक्रिया हुई है। लगभग सभी विकास खंडों से ग्राम प्रधानों ने कोरोना से लड़ने के लिए सरकार से अवश्यक संसाधन और बजट दिए जाने की मांग की है साथ ही ग्राम पंचायत स्तर पर सभी स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग उठाई है।
अल्मोड़ा की जिला पंचायत अध्यक्ष उमा सिंह बिष्ट ने प्रवासियों के नमूने लेकर रामभरोसे छोड़ दिए जाने को गंभीर बताया। उन्होंने संस्थागत क्वारंटाइन पर जोर देते हुए प्रशासन की कार्यप्रणाली पर ही सवाल खड़े कर दिए। कहा कि नमूने लेकर सीधे गांव भेजे जाने गांवों में सामुदायिक संक्रमण का खतरा बढ़ गया है। पहाड़ को सुरक्षित रखना है तो प्रवासियों को सीधे गांव में होम क्वारंटाइन के बजाय संस्थागत क्वारंटाइन करना ही होगा। ताकि संक्रमण की गुंजाइश ही न रहे और गांव सुरक्षित रहें।
असल में, यह समस्या केवल द्वाराहाट अथवा अल्मोड़ा की नहीं है। राज्य के सभी जिलों में प्रवासियों की नाममात्र जांच के बाद होम कोरोंटाइन के नाम पर सीधे गांव भेज दिया जा रहा है, जहां कोरोना की जांच तो क्या सामान्य रोगों के उपचार की भी समुचित व्यवस्था का अभाव है। यही नहीं राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में कुछ ब्लाॅक अथवा तहसील मुख्यालयों के निकटवर्ती गांवों को छोड़कर अधिकतर गांवों में यातायात की सुविधा का भी अभाव है।
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