उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में इन दिनों एक नई हवा चल रही है। आप कहीं भी जाइए, एक बात सुनने को मिल जाएगी  कि यदि आप का लड़का किसी सरकारी नौकरी में नहीं है और आपका दिल्ली, देहरादून, हल्द्धानी में अपना मकान नहीं है या तराई में आपकी जमीन या मकान का प्लॉट नहीं है तो उसके लिए लड़की मिलना मुश्किल हैं। पलायन (Migration) की इससे वीभत्स परिणति और क्या हो सकती है किकोई भी सुशिक्षित, सुशील लड़की उच्च शिक्षा प्राप्त और किसी प्राइवेट कंपनी में कार्यरत या निजी व्यवसाय कर रहे युवा से विवाह नहीं करना चाहती।

यही कारण है कि आज, पहाड़ी गांवों के युवा 30-32 साल की उम्र बीत जाने के बाद भी अविवहित हैं। सौ-डेड़ सौ की आबादी वाले गांवों में भी ऐसे 8-10 लड़के ऐसे जरूर मिल जाएंगे। इसका सकरात्मक पक्ष यह है कि इससे जहां समाज में अंतरजातीय और अंतरक्षेत्रीय विवाह को स्वीकार्यता मिलने लगी है, वहीं अब युवतियां स्वयं अपने विवाह का फैसला करने में आगे आ रही हैं। लेकिन सामाजिक सोच में आए इस बदलाव मात्र से इस समस्या के मूल में निहित कारणों - बेकारी और आर्थिक पिछड़ेपन, को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

देश के अन्य राज्यों की स्थिति अलग नहीं है

यह स्थिति अकेले उत्तराखंड की नहीं है। देश के अन्य राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति इससे अलग नहीं है। हो सकता है शिक्षा के स्तर और ऐतिहासिक-सामाजिक कारणों से विवाह योग्य उम्र में अंतर हो, लेकिन सच्चाई यही है कि देशभर में विवाह के लिए हर समझदार लड़की की पहली पसंद सरकारी नौकरी वाला युवा होता है। कोई भी बेरोजगार ग्रामीण युवा से विवाह नहीं करना चाहती, वह चाहे कितना ही पढ़ा-लिखा क्यों न हो!

अक्सर, भौगोलिक रूप से विशाल और विवधितापूर्ण भारत में गांवों को देश की आत्मा कहा जाता है। सभ्यता के विकास में गांवों की केंद्रीय भूमिका ने न केवल संस्कृति और परंपरा आगे बढ़ाया है बल्कि वे सपनों और आकांक्षाओं के जनक भी हैं। गांवों में जो सपने फूटते और जड़ें जमाते हैं, उन्हें युवाओं की गतिशील शक्ति ही भविष्य को आकार देती है। लेकिन गांवों की वर्तमान आर्थिक और सामाजिक सच्चाई युवाओं के भविष्य की तस्वीर धुंधली नज़र आती है।

किस काम की है यह तरक्की?

भारत की आर्थिक तरक्की को लेकर बड़ी-बड़ी बातें कही जा रही हैं। राजनेता, नीति-निर्माता, बुद्धिजीवी और उद्योगपति सभी भारत के आर्थिक महाशक्ति होने की बातें कर रहे है।।वैश्विक मंच पर भी भारत की आर्थिक क्षमता और प्रगति सराहना की जाती रही है। लेकिन देश की बहुत बड़ी आबादी के समक्ष दो वक्त के खाने की चुनोतियां किसी से छिपी नहीं हैं। आखिर यह तरक्की किस काम की है।

इस आर्थिक असमानता को मोटे तौर पर शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच गहरी की गहरी खाई से विभाजित किया जा सकता है। हो सकता है कि शहरी युवा आर्थिक विकास की चमक में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस जैसी सूचना प्रौद्योगिकी नवीनतम आविष्कार में अपना भविष्य सुरक्षित करने को लेकर आश्वस्त हों। लेकिन ग्रामीण युवा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अभाव से रोजगार के अवसरों की कमी तक जूझते हुए देखे जा सकते हैं।

उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों की स्थिति इस संकट को स्पष्ट तौर पर रेखांकित करती है। मुख्यतः सेना और अन्य सरकारी नौकरियों पर निर्भर इस क्षेत्र के लोगों के लिए न केवल सरकारी नौकरियों में चिताजनक कटौती हुई है उद्योगों के अभाव और पर्याप्त संभावनाओं के बावजूद कृषि और ग्रामीण अर्थ व्यवस्था का भी विकास नहीं हुआ है। 

उत्तराखंड में, स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत बाद शुरू पलायन के अलग राज्य बन जाने के बाद बढ़ जाने से भी पर्वतीय क्षेत्रों में आर्थिक संकट बढ़ा है। जबकि देश के अन्य राज्यों में यह समस्या मौसमी प्रवासन के रूप में सामने आई है। मुख्यतः हिंदी भाषी राज्यों के ग्रामीण अंचलों से हर साल, बड़ी संख्या में युवा रोजगार की तलाश में शहरों में चले जाते हैं। बेहतर जीवन, बेहतर वेतन और अपने परिवारों के लिए बेहतर भविष्य की आशा के साथ उनकी यह यात्रा बीते कई सालों से चली आ रही है।

ट्रांसफॉर्म रूरल इंडिया फाउंडेशन (Transform Rural India Foundation) के मुातबिक ग्रामीण भारत से हर साल लगभग 50 लाख लोग पलायन करते हैं, जिनमें  लगभग 30 लाख गरीब और पिछड़े राज्यों से आते हैं जो मुख्यतः कृषि प्रधान हैं। ये ग्रामीण युवा शहरी भारत के कंक्रीट के जंगलों में, शोषणकारी श्रम के चक्र में फंस जाते हैं। उनका श्रम निर्माण स्थलों से लेकर ईंट भट्टों तक शहरी विस्तार के क्षितिज को बढ़ावा देता हुआ चित्रित करता है।

शहरी विकास में ग्रामीणों के योगदान को हाशिए पर रखा गया है

यही नहीं, शहरी विकास में उनके योगदान को अक्सर हाशिए पर रखा जाता है, और उनके अधिकारों की मांग को या तो अनदेखा किया जाता है या फिर उनकी आवाज दबा दी जाती हैं। आज शहरों के ्रपति उनके बेहतर जीवन-बेहतर वेतन-भविष्य के सपनेका आकर्षण पूरी तरह फीका पड़ गया है। इससे वे इस हकीकत से रू-ब-रू होने लगे हैं कि शहर की अस्थायी रोजगार के चक्र ने उन्हें उनकी गरिमा से दूर कद दिया है।

वर्ष 2023 रोजगार के लिहाज से अत्यंत निराशजनक रहा है। विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं के अध्ध्ययन के अनुसार जनवरी 2023 में देश में बेरोजगारी दर 7.14 प्रतिशत थी, जो अप्रैल में बढ़कर 8.11 प्रतिशत हो गई थी। साल की शुरुआत से ही बेरोजगारी दर में वृद्धि का रुझान रहा, वह कम या ज्यादा आखिर तक बना रहा।

चिंताजनक तो यह भी है कि राष्ट्रीय स्तर पर 15 से 29 वर्ष की आयु के तीन में से एक युवा भारतीय न तो शिक्षा प्रशिक्षण प्राप्त कर रहा था, न ही रोजगार कर रहा था और नहीं प्रशिक्षण ले रहा था, जिन्हें नीट (NEET) यानी Neither Engaged in Education nor Training  कहा गया है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, नीट युवाओं का वैश्विक औसत  22 प्रतिशत है। भारत में यह औसत लगभग 33 प्रतिशत होता है, ग्रामीण भारत की स्थिति और भी बदतर है।

युवाओं की उपेक्षा कर महाशक्ति नहीं बन सकता भारत

यह स्थिति किसी भी सभ्य समाज के लिए आदर्श नहीं कही जा सकती है। भारत के लिए तो यह अत्यंत निराशाजनक है, क्योंकि देश की दो-तिहाई आबादी आज भी गांवों में रहती है, यही वह आबादी है जो समाज के विभिन्न क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका का निर्वाह करती है। निर्माण-विकास की विभिन्न योजनाओं से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासनिक एवं सैन्य सेवाओं, खेलों आदि मे गामीण युवाओं का औसत आज भी अधिक है। युवाओं के निराशाजनक और हतोत्साहित करने वाले वर्तमान के चलते क्या वास्तव में भारत आर्थिक महाशक्ति अथवा विश्वगुरुबन सकता है? यह एक यक्ष प्रश्न है।

ग्रामीण युवाओं को इस स्थिति से बाहर निकालने के लिए कृषि के आधुनिकीकरण, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के प्रसार, संरचना के विकास और रोजगार के अवसरों में वृद्धि के लिए आवश्यक कदम उठाने होंगे। हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए सरकार ने कई योजनाएं बनाई हैं, पंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से उन्हें शासन में भागीदारी का अवसर भी प्राप्त हुआ है। लेकिन नीतिगत बाधाओं के कारण ये तमाम योजनाएं ग्रामीण जन मानस को उनके उज्ज्वल भविष्य के प्रति आश्वस्त नहीं कर पा रही है।


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