अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के संचार सचिव गेरी राइस ने भारत सरकार द्वारा बनाए गए तीन कृषि कानूनों को आर्थिक सुधारों की दिशा में उल्लेखनीय पहल करार दिया है। 15 जनवरी, 2021 को जब भारत की राजधानी नई दिल्ली में तीन कृषि कानूनों के विरोध में आंदोलित किसानों के प्रतिनिधियों और सरकार के बीच 9वें दौर की वार्ता चल रही थी तो उसी दिन संयुक्त राज्य अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन में प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए आईएमएफ प्रवक्ता ने कहा है कि तीन कृषि कानूनों से भारत में कृषि सुधारों को आगे बढ़ाने की उल्लेखनीय पहल का प्रतिनिधित्व करने की क्षमता है। ये कानून किसानों को खरीददारों से सीधा संबंध बनाने का मौका देंगे। इससे विचौलियों की भूमिका कम होगी और दक्षता का विकास होगा और किसानों को अपनी उपजों की बेहतर कीमत हासिल करने में मदद मिलेगी।
संविधान दिवस 26 नवंबर, 2020 से दिल्ली की सीमाओं पर धरना दे रहे किसानों और सरकार के बीच 9वें दौर की वार्ता भी बेनतीजा होने के बाद अगली वार्ता की तारीख मुकर्रर कर दी गई हैं, जिस तरह किसान और सरकार दोनों ही अपनी बातों पर अड़े हैं उससे लगता नहीं कि अगली वार्ता में कोई समाधान निकल पाएगा। लेकिन आईएमएफ प्रवक्ता के इस वक्तव्य के बाद गंभीर प्रश्न यह उठ खड़ा हुआ है कि क्या इसे किसान आंदोलन का हल निकाल पाने में असफल भारत सरकार के लिए राहत माना जा सकता है या इस तारीफ के पीछे आर्थिक सुधारों की गति और तेज करने की चेतावनी है?
असल में गेरी राइस की चिंता निरंतर घाटे का सामना कर रही भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर है, जिसके फलस्वरूप देश पर विदेशी कर्ज का बोझ बढ़ता गया है। 1991 में जब भारत सरकार ने विश्व बैंक और आईएमएफ के दबाव में आकर आर्थिक उदारीकरण की नीति को अपनाया था तो उस समय देश पर करीब 85 अरब डालर विदेशी कर्ज था जो आज (दिसंबर, 2020 के अंत में) बढ़कर 558.5 अरब डालर हो गया है। करीब तीन दशकों के इस दौर में आर्थिक विकास की जो चकाचौंध देश में देखी गई है वह उपभोक्ता वस्तुओं के आयात व व्यापार पर लगने वाले टैक्स और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के निवेश के कारण है। इस बीच देश में उत्पादन और निर्यात में जबर्दस्त कमी आई है। इस तथ्य का खुलासा भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने 2019 में ही कर दिया था।
आंकड़े इस बात की भी तस्दीक करते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था का सबसे बुरा हाल पिछले 6-7 वर्षों में हुआ है। 2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने थे, देश पर लगभग 446 अरब डालर विदेशी कर्ज था जो दिसंबर, 2019 में 564 अरब डालर और दिसंबर, 2020 में 558.5 अरब डालर हो गया। अर्थात मोदी सरकार के साढ़े छः सालों में 112.5 अरब डालर विदेशी कर्ज बढ़ा है। यह विदेशी कर्ज अंतराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं, मित्र राष्ट्रों और अनिवासी भारतीय यानी एनआरआई से लिया गया है।
यह विदेशी कर्ज, भारत सरकार द्वारा लिए गए कुल कर्ज का 20 प्रतिशत है। शेष 80 प्रतिशत कर्ज सरकार आंतरिक स्रोतों से लिया है, जिसमें देश के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंको, रिजर्व बैंक एवं बीमा कंपनियों से लिए जाने वाले कर्जे के अलावा व्यावसायिक व औद्योगिक समूहों, गैर-वित्तीय संस्थाओं, सहकारी बैंकों एवं संस्थाओं आदि से लिया गया है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि वर्तमान समय में भारत सरकार किस कदर कर्ज के दलदल में धंसी हुई है।
आईएमएफ की चिंता का सबब यह भी है कि जब कोई देश कर्ज में डूबने लगता है कि उसकी विकास दर में निरंतर गिरावट आने लगती है। यदि वह देश की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 77 प्रतिशत के बराबर हो जाए तो उसकी वार्षिक विकास दर 1.7 या इससे भी कम रह जाती है। ऐसी स्थिति में उसके लिए कर्ज की किश्तें और व्याज चुकाना भी मुश्किल हो जाता है। भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार ही इस समय देश पर जीडीपी के 68.6 प्रतिशत के बराबर कर्ज है, 1991 में आर्थिक उदारीकरण की नीति अपनाए जाने के समय 28.7 प्रतिशत था।
विदेशी और घरेलू कर्ज का असर कृषि को छोड़कर सभी क्षेत्रों में देखने को मिलता है। कोरोना संकट के शुरूआती दौर यानी वित्तीय वर्ष 2020-21 की पहली तिमाई (अप्रैल-जून) में यह ऋणात्मक विकास दर के रूप में दर्ज की गई थी, जबकि कंस्ट्रक्शन सेक्टर की विकास दर -57.4 प्रतिशत, मैनोफैक्चरिंग सेक्टर की -37.3 प्रतिशत, माइनिंग सेक्टर की 41.3 प्रतिशत और ट्रांसपोर्ट, होटल व ट्रेड सेक्टर की विकास दर -47.4 प्रतिशत थी, केवल कृषि क्षेत्र की विकास दर धनात्मक (लगभग 3 प्रतिशत) दर्ज की गई थी। इस आधार पर वर्ष 2020-21 की पहली तिमाई में विकास दर -23.9 प्रतिशत रही। पूरे साल की बात करें तो वर्ष 2020-21 में विकास दर -7.7 (यानी गिरावट) रहने का अनुमान है।
प्रश्न यह उठता है कि क्या सरकार कृषि सुधारों के नाम पर लाए गए कृषि कानूनों के जरिए देश को इस आर्थिक संकट से बाहर निकालना चाहती है? तर्क दिया जा रहा है कि इससे कृषि क्षेत्र में निवेश बढ़ेगा और किसानों की आय में वृद्धि होगी। आंदोलनकारी किसानों को डर है कि इससे भारी संख्या में किसान बेरोजगार हो जाएंगे और उनकी जमीनों पर व्यापारियों का कब्जा हो जाएगा। आईएमएफ प्रवक्ता गेरी राइस ने भी इस ओर इशारा करते हुए कहा है कि सरकार को इससे प्रभावित होने वाले लोगों की सुविधाओं का पूरा ख्याल रखना चाहिए। कहीं ऐसा तो नहीं कि कर्ज के दलदल में धंसी भारत सरकार तीन कृषि कानूनों को ही आईएमएफ के दबाव में लाई है?
दरअसल, भारत आर्थिक संकट का सामना कर रहा दुनिया का अकेला देश नहीं है, लगभग सभी देश इस संकट से जूझ रहे हैं। खासकर, दुनिया की सभी आर्थिक महाशक्तियों को विकास दर में गिरावट का सामना करना पड़ रहा है। कोरोना संकट के पहले दौर में जब भारत की जीडीपी में 23.9 प्रतिशत गिरावट आई थी उसी दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका की जीडीपी में 10.6 प्रतिशत, जर्मनी की जीडीपी में 11.9 प्रतिशत, फ्रांस की जीडीपी में 18.9 प्रतिशत, इटली की जीडीपी में 17.1 प्रतिशत, ग्रेट ब्रिटेन जीडीपी में 22.1 प्रतिशत और स्पेन की जीडीपी में 22.7 गिरावट दर्ज की गई थी। सच तो ये है कि आईएमएफ को भारत की नहीं आर्थिक महाशक्तियों की चिंता अधिक है।
भारत में यदि कृषि क्षेत्र को मार्केट के हवाले किया जाता है तो उसमें भारत ही नहीं दुनिया के समृद्ध अथवा विकसित देशों के व्यावसायिक घरानों के लिए भी नए अवसर पैदा होंगे। उन्हें भारत में कृषि क्षेत्र में निवेश और कृषि उपजों के कारोबार के रास्ते खुलेंगे। वे भारत में सीधे किसानों से सस्ते दामों पर कृषि उपजों को खरीद सकेंगे, उनका मनमाना भंडारण कर सकेंगे और बाजार की जरूरतों को देखते हुए (कांटेक्ट फार्मिंग के जरिए) फसल पैदा कर सकेंगे। कृषि कानूनों की वापसी की मांग पर आंदोलनरत किसानों को भी यही डर हैं। लेकिन उनके निशाने में अब तक अंबानी, अडानी जैसे देश के वे व्यावसायिक घराने हैं। गेरी राइस के उक्त वक्तव्य के बाद कोई संदेह नहीं रह जाता है कि मामला सिर्फ भारत के व्यापारिक और औद्योगिक घरानों के हित साधने तक सीमित नहीं है। लिहाजा कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलनरत किसानों को भी इसी आधार पर अपनी रणनीति तैयार करनी चाहिए।

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